महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, June 15, 2018

धुंध में उजड़ता जीवन

हुत कुछ कहना है। कहने की आदत नहीं इसलिए लिख रहा हूं। आज तीसरा दिन है, जब पूरा पहाड़ी वातावरण धुंधीला हो रखा है। दो दिन से शाम के वक्त तेज हवा और बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश हो रही है। पिछले चार महीनों का सूखा कुछ दिनों के लिए टल गया है।
एक प्रकार से मेरे पहाड़ी गांव-घर और परिवेश के लिए बरसात शुरू हो चुकी है। लेकिन मैदानी इलाकों में केवल लाल-काली धुंध की परत बिछी हुई है। उत्तर भारत में लाल-काली धुंध से निकलकर जो सूर्यप्रकाश रहा है, वह लोगों के शरीर से पानी निकाल रहा है।
पूरे उत्तर भारत का जीवन नर्क जैसा हो रखा है। पहाड़ों पर भी बरसात जैसा मौसम होने के बाद सफेद बादल नहीं घूम रहे, केवल धुंए जैसी धुंध फैली हुई है।
जलवायु स्थिर है। बरसात से जलवायु ठंडी जरूर है, लेकिन स्वच्छ हवा तब भी नहीं चल रही। हवा बरसात के साथ ही चलती है। बरसात के बाद थम जाती है। पहाड़ों में भी बदली का घाम और धुंध फैली हुई है। आंखों के लिए ये दृश्य बोझिल हैं। मन-मस्तिष्क दोनों अवसादग्रस्त हैं।
एक सामान्य व्यक्ति का परिवार, गांव, समाज और स्वयं से सामान्य मानवीय संबंध खत्म हुआ। एक-दूसरे पर अविश्वास बढ़ चुका है। एक-दूसरे से अकारण ही एक भय रहता है सभी को। शहर-गांव सभी जगह सार्वजनिक जीवन अत्यंत कुरूप और अव्यवस्थित हो चला है।
मैं भी गांव में आकर अत्यंत असहज हो उठा हूं। ढाई दिन पहले पानी की समस्या दैनिक जीवन और पारिवारिक-सामाजिक संबंधों को उजाड़ रही थी। और अब ढाई दिन से बरसात जैसा मौसम होने पर, पर्याप्त पानी उपलब्ध होने पर, गदेरों के कल-कल बहते रहने और गांव के प्राकृतिक जलस्रोतों के भर जाने के बाद भी चहुं ओर व्याप्त धुंध बेचैन कर रही है।
मैं यह बरसाती परिदृश्य पहली बार देख रहा हूं। धुंध ने मेरा सब कुछ थाम लिया है। औरों का पता नहीं, परंतु मेरा मनोविज्ञान आजकल की धुंध से पतित हो चुका है। मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता। सीमेंट टाइट घरों के भीतर उमस से दम निकल रहा है तो बाहर धुंध की परत में मेरी मानवीय भावनाएं कठोर बनी हुई हैं।
पेड़-पौधे बरसात के बाद भी मुरझाए प्रतीत होते हैं। दोपहर में कुछ चिड़ियाओं की चहचहाहट से लगा कि शायद मौसम खिल गया होगा। लेकिन बाहर झांका तो प्राकृतिक कलुष पहले की भांति व्याप्त था। दूर के गांव, पहाड़ों की चोटियां, चोटियों पर लदे हरे-भरे वृक्ष, आसमान कुछ भी नजर नहीं रहा। नजर रही है तो केवल विषैली, कसैली और दिल-दिमाग को उन्मादी बनाती बेरंगी धुंध।
नारकीय मौसम के कारण किसी को ईर्ष्या से देखूं, किसी के सामने अपना गंभीर कठोर मुख लाऊं, किसी को कुछ बुरा बोल दूं और मेरे खराब बर्ताव द्वारा किसी से संबंध बिगड़ जाएं-यह सोचकर जितना अकेले में आंखें बंद कर बैठ सकता हूं, बैठ रहा हूं।
मौसम इतना कुरूप है कि निश्छल और प्यारे बच्चों के साथ भी किसी तरह प्यार-मनुहार-पुचकार कर रहा हूं। जबकि मन में खटास और खुंदक भरी हुई है। इस समय देश, लोकतंत्र, राजनीति, शासन के सारे कर्म मुझे खटकर्म प्रतीत हो रहे हैं। चाहता हूं कि इनके बारे में कोई मुझसे कुछ कहे। मुझ जैसे व्यक्ति को दुनिया की सभी कठिनाइयों में संभालने के लिए जो प्रकृति अपने स्वभाव से चमकती-दमकती रहती थी, आजकल वह भी दुनिया और इसकी कठिनाइयों जैसी कठोर बनी हुई हैतो इन स्थितियों में संवेदनशील व्यक्ति कहां जाए, क्या करे।
ऐसे में आंखें बंद कर दुनिया बनानेवाले के बारे में ही सोचा जा सकता है कि आखिर उसने यह दुनिया क्यों बनाई। बाहर से यह जो दुनिया हमें कई बार अच्छी, सुंदर और प्रेरक दिखाई देती है, प्राकृतिक असुंदरता से उत्पन्न जीवन-दर्शन में यही दुनिया व्यर्थ-निरर्थ लगती है..............................................................................

2 comments:

  1. ऊपर बनाने वाले ने ये नहि सोचा होगा की इंसान उसकी दुनिया का नाश करने में इतना आतुर होगा की अपना भला भी नहीं देख पाएगा ...
    मौसम का बदलाव मन में भी बदलाव लाता रहता है ...

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  2. आखिर में प्रकृति इंसान को उसकी उदंडता के लिए दण्डित जरूर करती हैं , लेकिन इंसान फिर भी कहाँ समझता है

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