महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, June 7, 2018

सेना और राष्ट्र का गौरव खंडित हुआ कश्मीर में सीज फॉयर से

म्मू-कश्मीर को भारत देश के लिए सबसे बड़ा आत्मदंश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत सरकार ने जब-तब भारतीय सेना के हाथ बांधकर उसकी जो दुर्गति कश्मीर में करवाई है, उससे बड़ी दुखद विडंबना इस देश की कुछ और नहीं। रमजान-रोजा के कारण जम्मू-कश्मीर में सेना को पत्थरबाजों पर सैन्य कार्रवाई करने से रोकने का आदेश भारत सरकार ने दिया हुआ है। यह आदेश भारत सरकार ने तब दिया, जब प्रधानमंत्री द्वारा जम्मू में सुरंग-सह-मार्ग संरचना का लोकार्पण किए जाने के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया। रोजा-रमजान में आतंक और पत्थरबाजी की घटनाओं पर सेना द्वारा प्रतिक्रिया नहीं करने के लिए आधिकारिक आदेश पारित करना भारत सरकार का पूरी तरह गलत निर्णय था। यदि मुसलिम त्योहार के कारण कश्मीर के स्थानीय नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से रहते अथवा आतंक व पत्थरबाजी नहीं करते तो सेना स्वयं ही शांत रहती और कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करती। लेकिन पत्थरबाजों ने शांत नहीं रहना था। उन्हें तो सरकार द्वारा सैनिकों के हाथ बांध दिए जाने के बाद जैसे पत्थरबाजी से अराजकता फैलाने का स्वतंत्र मौका मिल गया। भारत सरकार द्वारा सेना को रमजान के दौरान सीज फॉयर के आदेश दिए जाने के बाद भारत-पाक सीमा सहित जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं पहले से ज्यादा और उग्र हो गई हैं।
ऐसी ही घटनाओं की निगरानी कर रहे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक सैनिक को पत्थरबाजों ने उसकी जीप सहित घेर लिया। पत्थरबाज अकेले गश्त कर रहे सैनिक की जीप पर चढ़ गए। जीप सहित सैनिक को कुचलने के लिए पत्थरबाजों ने हर संभव कोशिश की। अंत में सैनिक पत्थरबाजों की भीड़ से बचने के लिए अपने वाहन की गति बढ़ाता है और इस प्रयास में एक पत्थरबाज जीप के नीचे आकर कुचला और मारा जाता है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस केरिपुब पर एफआईआर दर्ज कर देती है। क्या यह सब होने देने के लिए ही राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने रमजान में सीज फायर आदेश सेना को दिया था? क्या  जम्मू-कश्मीर जैसे अशांत भारतीय राज्य में किसी भी दृष्टिकोण (राजनीतिक, सामरिक, सामाजिक, आर्थिक) से ऐसा आदेश पारित करने का कोई औचित्य है? क्या ऐसे आदेश देश की सेना के बलिदान, शौर्य और पराक्रम का अपमान नहीं? और सबसे चिंताजनक बात यह कि क्या ऐसे आदेश उस अधिसंख्य भारतीय जनता का अपमान नहीं, जिसने भाजपा के नेतृत्ववाली राजग सरकार को उन कार्यों को करने के लिए बहुमत से सत्तारूढ़ किया, जिनमें से सबसे प्रमुख कार्य जम्मू-कश्मीर में पाक-प्रयोजित और स्थानीय आतंक को सैनिकों द्वारा स्वतंत्रतापूर्वक खत्म करने का कार्य है।
लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। भाजपा को समर्थन देनेवाली अधिसंख्य जनता इससे क्षुब्ध है। देश के सम्मुख कश्मीर एक समस्याग्रस्त प्रदेश बन कर रह गया है। राज्य की सरकार में हिस्सेदार पीडीपी और भाजपा जैसे दल न जाने क्या सोचकर इस बेमेल गठबंधन को बनाए रख पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करने पर लगे हुए हैं। राज्य की गठबंधन सरकार में शामिल भाजपा केंद्र में भी बहुमत के साथ सत्तारूढ़ है। तब भी कश्मीर में आतंक और पत्थर का खूनी खेल जारी है। सीमा पार से आतंक का पोषण और प्रयोग करने के लिए जम्मू-कश्मीर में आज भी सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियां ज्यों की त्यों हैं।
हालांकि पिछले चार वर्षों में अनेक आतंकियों के मारे जाने, आतंक का राजनीतिक संरक्षण करनेवाले हुर्रियत सहित दूसरे समूहों के नेताओं के पकड़े जाने और केंद्र-राज्य सरकार के समन्वय से स्थानीय लोगों, विशेषकर युवाओं को समावेशी विकास का अंग बनाने के अनेक प्रयासों के बाद भी, आतंक का मनोविज्ञान कश्मीर के लोगों और युवाओं में गहरे जड़ें जमाए हुए है। बहुत संभव है कि यह मनोविज्ञान केंद्र सरकार द्वारा संचालित विकास तथा सहयोग की भावना से कभी नहीं मिटनेवाला। प्रधानमंत्री मोदी और धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहक भले ही कितनी आशावादिता के साथ वक्तव्य देते रहें कि कश्मीर के युवाओं को मुख्य्धारा में लौटना चाहिए या उन्हें आतंकवाद और पत्थरबाजी जैसी देशविरोधी गतिविधियां त्याग देनी चाहिए, परंतु युवाओं-युवतियों और हर आयु वर्ग के लोगों द्वारा आतंक फैलाने का दुस्साहस पहले से ज्यादा बढ़ चुका है।
वास्तव में रमजान के लिए सीज फॉयर करवाने के पीछे मुफ्ती सरकार के आतंकवाद हितैषी नेताओं, स्थानीय जनता और पाकिस्तान के आंतकवादियों का मकसद भारतीय सेना से लड़ने के लिए अस्त्र-शस्त्र और नए आतंकवादियों का बैकअप तैयार करना है। सेनाधिकारी और सैन्यकर्मी केंद्र सरकार के इस निर्णय से बहुत निराश थे कि सीज फॉयर क्यों किया गया। पिछले चार वर्षों में केंद्र सरकार की स्पष्ट व निष्ठापूर्ण सैन्य नीति के चलते कश्मीर में आतंकरोधी अभियान में सेना बहुत आगे बढ़ चुकी है। सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक और अन्य सेना कार्रवाईयों के बाद सेना को आतंक पर नियंत्रण करने के लिए बहुत अधिक सफलता मिल चुकी है। लगभग रोज ही सेना एक-एक, दो-दो करके प्रमुख आतंकियों को ढेर कर रही है। इन परिस्थितियों में सैनिकों तथा देश के अधिसंख्य लोगों का आत्मसम्मान और आत्मविश्वास कश्मीर के संदर्भ में बहुत अधिक बढ़ा हुआ है। ऐसे में सीज फॉयर करवाने से सेना और देश के लोगों का आत्मविश्वास डगमगा गया है।
सेना के सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि सैनिक भी सीज फॉयर से अप्रसन्न हैं। सेना अपने विशेष अभियानों, निगरानियों और कार्रवाईयों से आतंकियों को खत्म  करने की दिशा में बहुत आगे बढ़ चुके हैं। ऐसे में एक महीने की लंबी अवधि तक सीज फॉयर होना मतलब आतंकियों के विरुद्ध सेना के अभियान की निरंतरता में बाधा उत्पन्न करना। कुछ सेना अधिकारी तो कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के सीज फॉयर वाले आदेश से सेना आतंकरोधी अपने अभियान में बुरी तरह पिछड़ गई है। यह ऐसा ही है जैसे आतंकियों के विरुद्ध एक वर्ष पहले शुरू हुई कार्रवाई से पुनः शुरुआत करना। सीज फॉयर से आतंकी समूह लाभ की स्थिति में आ गए हैं। उन्हें फिर से अपनी आतंकी व्यवस्थाएं बनाने, इसके लिए वित्तपोषण करने और देशी-विदेशी राजनीति व कूटनति करने का भरपूर समय मिल गया है।
फिर राज्य सरकार भी कश्मीर के लोगों के धार्मिक-राजनीतिक और अराजकतावादी हितों का ध्यान रखते हुए येन-केन-प्रकारेण उसी दिशा में शासन चला रही है, जैसे आतंक और पत्थरबाजी के अनुकूल माहौल हो। लेकिन राज्य सरकार से ज्यादा अचरज केंद्र की भाजपानीत सरकार पर हो रहा है कि आखिर वह किस उद्देश्य के लिए जम्मू में गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी हुई है। केंद्र सरकार, पीडीपी से समर्थन वापस लेकर कश्मीर में राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगाती? यह अत्यंत विचारणीय प्रश्न है। इसके अलावे धारा 370 का विषय है। 2014 में चुनावी घोषणापत्र में भाजपा की यह घोषणा प्रमुख घोषणाओं में से एक थी कि वह सत्तारूढ़ होने पर कश्मीर से धारा 370 हटा देगी। लेकिन राजग सरकार के चार वर्ष पूर्ण होने पर भी 370 पर संशयग्रस्तता पहले जैसे बनी हुई है। 
आखिर कश्मीर का देश के कुल सकल घरेलू उत्पादन में कितना प्रतिशत है, जो ऐसे राज्य को 370 का संरक्षण दिए जाने और आतंक लिप्त होने के बाद भी भाजपा द्वारा गठबंधन सरकार का अंग बनकर झेला जा रहा है। धारा 370 के अंतर्गत उपलब्ध स्वायत्त शासन का उपयोग कश्मीर के लोग क्या आतंक, अराजकता और भारतीय गणराज्य के पूर्ण विरोध के लिए ही करते रहेंगे? सुविधाएं और सेवाएं कश्मीरियों को भारतीय गणराज्य द्वारा ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। विभिन्न मौसमीय आपदाओं में कश्मीर के लोगों को मानवीयता के नाते सबसे ज्यादा सुरक्षा सेना के जवान ही प्रदान करते हैं। सरकारी स्तर पर भी कश्मीरियों हेतु जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं और सेवाएं सस्ती और सुलभ हैं। इतना होने पर भी कश्मीर के संबंध में स्थायी समाधान की युक्ति नहीं निकल पाना अत्यंत दुर्भाग्यशाली है। अधिसंख्य लोगों को भाजपा से आशा थी कि वह इस दिशा में पूर्व की सरकारों से अलग और त्वरित निर्णय लेगी, परंतु भाजपा भी अब तक कश्मीर के संदर्भ में संशयग्रस्त ही है तथा देश के लोग कश्मीर में सेना के विरुद्ध होनेवाली स्थानीय और विदेशी अराजकता से बुरी तरह दुखी हैं।

4 comments:

  1. टीवी पर देख देखकर खून खौलता रहता है . वास्तव में जो उम्मीद मोदी से थी ( कि कश्मीर-विवाद और पाकिस्तान दोनों को होश ठिकाने लगा देंगे ) वह पूरी होना तो दूर ,पाक के और पाक समर्थन करने वालों के हौसले बुलन्द हो गए हैं . जनता तिलमिला रही है पर नेताओं की नींद नहीं टूट रही . बहुत सारगर्भित लेख .

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सपने हैं ... सपनो का क्या - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. कश्मीर समस्या किसी तरह भी सुलझती नजर नहीं आ रही, सरकार और सेना हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं, अब तो वहाँ की जनता को ही समझदारी से काम लेना होगा

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards