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Wednesday, April 11, 2018

महिला असुरक्षा की व्यापकता

हाल ही में दिल्‍ली के गोविंद पुरी में भीड़भरे साप्‍ताहिक बाजार में एक महिला को चाकुओं से गोद कर मार दिया गया। दस वर्ष से कम आयु के चार बच्‍चों की मां सुमन दूबे से पहले तो बदमाशों ने अश्‍लील व्‍यवहार किया और फि‍र उसके पति सहित भीड़ द्वारा बदमाशों का विरोध किए जाने, उन्‍हें पीटने पर उन्‍होंने चाकू से सुमन पर कई वार कर दिए। बेचारी सुमन ने चिकित्‍सालय पहुंचने से पहले ही प्राण त्‍याग दिए। इस तरह अप्रत्‍याशित रूप में एक हंसता-खेलता गरीब परिवार दो गुंडों के अश्‍लील, अभद्र व्‍यवहार तथा हिंसक हमले के कारण बुरी तरह बिखर गया। इन गुंडों के बारे में ज्ञात हुआ कि ये कुछ दिन पूर्व ही जेल से सजा पूरी कर छूटे थे। हालांकि इसके बाद लोगों ने बदमाशों को बुरी तरह पीटकर पुलिस के हवाले कर दिया।
विकेश कुमार बडोला 
लेकिन पुलिस या कानून की अभिरक्षा में रहते हुए बदमाशों को उनके दुस्‍साहस, अपराध के लिए त्‍वरित और समयबद्ध दंड मिल पाएगा, इसमें संदेह ही संदेह है। क्‍योंकि हमारे सामने साढ़े चार वर्ष पूर्व दिल्‍ली के ही वसंत विहार में हुए दुष्‍कर्म व लोमहर्षक हत्‍या कांड के बाद अपराधियों को सजा नहीं होने का कड़वा अनुभव अभी भी पसरा हुआ है। उस घटना की पीड़िता दामिनी का बलात्‍कार कर जितने नृशंस तरीके से उसे मारा-पीटा गया था और उसके बाद इस घटना के विरोध में देश-विदेश में पन्‍द्रह-बीस दिनों तक सरकार विरोधी जैसा जनांदोलन हुआ था, उसकी परिणति आखिर में क्‍या हुई। आज तक दामिनी के बलात्‍कारियों व हत्‍यारों को सजा नहीं हो पाई है। यहां तक कि उस घटना का जो सबसे क्रूर व हिंसक अपराधी था, उस पर किशोर न्‍याय बोर्ड में मुकदमा चलाकर उसका पुनर्वास भी कर दिया गया है। यदि देश की राजधानी दिल्‍ली महिलाओं की सुरक्षा इस तरह करेगी और पीड़ित-असुरक्षित होने पर उन्‍हें ऐसा न्‍याय दिलवाएगी, तो बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ जैसे सरकारी अभियान की सात्विकता समाज में कैसे सिद्ध होगी। लोग अमेरिकी बंदूक संस्‍कृति के विरोध में देश-विदेश में मार्च निकालते हैं लेकिन अपराध रोकने के लिए मात्र बंदूक के लाइसेंस बंद करने से काम नहीं चलनेवाला। अपराध नियंत्रण व उन्‍मूलन के लिए इसका वास्‍तविक चरित्र पहचान कर उसे खत्‍म करना होगा।
सुमन दूबे और दामिनी जैसी महिलाएं अकेली नहीं है, जो लैंगिक अश्‍लीलता तथा अभद्रता और इसके परिणामस्‍वरूप हत्‍या, तेजाब हमला आदि हिंसक व्‍यवहार का कोप झेल रही हैं। लगभग प्रतिदिन ही महानगरों से लेकर सुदूर गांवों में अनेक महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्‍यवहार हो रहा है। महिलाओं के विरुद्ध घटनेवाली जिन घटनाओं के अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं या भाग जाते हैं, उनके लिए तो कह सकते हैं कि न्‍यायिक धारणाएं या दंड निर्धारित नहीं हो सकते। लेकिन कितने आश्‍चर्य की बात है कि दामिनी और सुमन दूबे के हत्‍यारे पकड़े जाने के बाद भी निचली अदालतों से लेकर उच्‍च व सर्वोच्‍च अदालतों में मात्र विधि विवेचना का माध्‍यम बने रहते हैं। वर्षों बीत जाने तथा आरोप सिद्ध व पुष्‍ट हो जाने के बाद भी इन्‍हें इनके किए का उचित दंड नहीं मिल पाता।
          अगर सुमन की हत्‍या के प्रकरण में कानूनी कार्रवाई के लिए आवश्‍यक उपलब्‍ध साक्ष्‍य का प्रश्‍न उठता है तो क्‍या सुमन का पति, उसके चार बच्‍चे तथा सैंकड़ों की संख्‍या में एकत्र लोगों की भीड़ पर्याप्‍त प्रत्‍यक्ष साक्षीगण नहीं हैं? क्‍या इनके द्वारा घटना का आंखों देखा वर्णन किए जाने के आधार पर न्‍यायाधीश सीधे अपराधियों को मृत्‍यु दंड नहीं सुना सकते। जब हमने निर्दोष दामिनी व सुमन को अपराधियों के हिंसक हमले के बाद तड़पते हुए मरते देख लिया है, तब अपराधियों को मौत का दंड देने के लिए कानून व इसके संरक्षकों, न्‍यायाधीशों के सम्‍मुख मानवीयता का संदर्भ क्‍योंकर प्रकट होता है? यह न्‍याय के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार नहीं चलने का अभ्‍यास है, जो उस जनता के मन में कानून व विधि तंत्र के प्रति अविश्‍वास जगाता है, जिसके प्रतिनिधित्‍व वाले लोकतंत्र में ऐसे विधिक तंत्र की स्‍थापना होती है।
          देर से न्‍याय मिलने तथा जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के चलते बड़ी संख्‍या में अपराधी देश की जेलों में भरे पड़े हैं। और जिस प्रकार जेलों में बंद न्‍यायाधीन, विचाराधीन अपराधियों की संख्‍या बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में हमारे जेल तंत्र तथा उसके शासन-प्रशासन की कार्यपालक शक्तियां, सुविधाएं और अपराधियों का दंड सुनिश्चित करने का त्‍वरित प्रशासनिक ढांचा तैयार नहीं हो पा रहा। चलो यह मान भी लिया जाए कि कुछ अपराधों में गलत साक्ष्‍यों तथा अनुचित पुलिस निरीक्षण के कारण निर्दोष लोगों को सजा के तौर पर जेलों में रखा गया है और उन पर कानूनी कार्रवाई शीघ्रता में होनी भी नहीं चाहिए क्‍योंकि ऐसे में निर्दोष लोगों को दंड मिलने पर कानून खुद ही सवालों के घेरे में आ जाएगा। लेकिन जिन आपराधिक घटनाओं के प्रत्‍यक्ष साक्षीगण घटनाओं का स्‍पष्‍ट विवरण दे चुके होते हैं और साथ ही साक्षीगणों के विवरणों से मिलते-जुलते वैज्ञानिक-प्रामाणिक साक्ष्‍य भी एकत्र किए जा चुके होते हैं, उन पर न्‍याय में देरी होने से लोगों में न्‍याय-व्‍यवस्‍था के प्रति अविश्‍वास ही उत्‍पन्‍न होता है। 
      लोकतांत्रिक विधि व्‍यवस्‍था के साथ-साथ सामान्‍य प्राकृतिक मानवीय जीवन को हानि पहुंचानेवाले जो भी अपराध, अवैध कार्य और लोक विरोधी कर्म होंगे उनके लिए त्‍वरित दंड की व्‍यवस्‍था तो होनी ही चाहिए। लेकिन हम देखते आए हैं कि न केवल आम जनता में से दामिनी और सुमन के हत्‍यारों को कोई समयोचित कानूनी दंड मिल पाता है और न ही देश के बड़े राजनीतिक अपराधियों को उनके शासन-कर्म संबंधी अपराधों के लिए कड़ा दंड मिलता है। राजनीतिक अपराधियों को दंड मिलता भी है तो कारागार भी उनके लिए राजनीतिक कार्यालय बना रहता है और विभिन्‍न अपराधों में दंड मिलने के बाद भी स्‍वास्‍थ्‍य-जांच के लिए उन्‍हें देश के सबसे बड़े आयुर्विज्ञान संस्‍थान में भर्ती होने में भी कोई समस्‍या नहीं होती। यह कैसी विडंबनाजनित सच्‍चाई है कि अपराधी को कठोर कारावास या मृत्‍युदंड देने के बदले उन्‍हें जेल में सामान्‍य जीवन जीने की सुख-सुविधाएं मिलती हैं और स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के लिए एम्‍स जैसे संस्‍थानों में भी भर्ती करवाया जाता है। और ऐसे अपराधियों द्वारा अनेक तरह से पीड़ित हुए लोग और उनकी भावी पीढ़ी अपराध किए बिना ही जेल जैसे कठोर करावास पाते हैं और जीवनभर घुट-घुट कर जीते रहते हैं।

3 comments:

  1. जिस देश में न्याय व्यवस्था इतनी लचर हो उस देश की सामाजिक स्थिति ऐसी ही हो सकती है जैसी अपने द्देश की है ... एक के बाद एक वो भी अलग पार्टी की सरकारें भी आती जाती रहेंगी पर इस तरफ कोई कुछ कर पायेगा ऐसा नहीं लगता ... न्याय देने वाले ही नहीं चाहते और उन्होंने अपना गैंग बना लिया है राजनितिज्ञो के प्राशय में ... १२५ करोर लोगों की आबादी में क़ानून जानने वाले नहीं हैं ऐसा नहीं हो सकता पर उन्हें भरती नहीं करेंगे और न करने देंगे ...

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  2. http://bulletinofblog.blogspot.in/2018/04/blog-post_19.html

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  3. इसी लचर व्यवस्था के कारण ही अविश्वास का माहौल है । जो धैर्य को चुनौती दे रहा है ।

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