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Sunday, April 8, 2018

प्रकृति को बचाने के लिए


वैसे तो मनुष्‍य जीवन अलग-अलग समय में अनेक परिवर्तनों से गुजरा, लेकिन दुनिया का पिछले पन्‍द्रह वर्ष का परिवर्तन अत्‍यंत विचित्र है। ''दुनिया का परिवर्तन'' से तात्‍पर्य व्‍यक्ति, परिवार, गांव, शहर, रिश्‍ते-नाते, दोस्‍ती-यारी, पर्व-त्‍योहार मनाने के उत्‍साह-उमंग में परिवर्तन से है।
विकेश कुमार बडोला

पिछले 15 सालों में आदमी का जीवन, आदमी के मूल जीवन जैसा नहीं रहा। जो कुछ है, जैसा है, सब रफ्तार के हवाले है। लोगों को वाकई सांस लेने की फुर्सत भी नहीं। किसी से अपनापन, प्‍यार-प्रेम और संवेदना मिलने की उम्‍मीद तो अब बेमानी लगती है। धरती के एक छोर पर रह रहा आज का मनुष्‍य धरती के दूसरे कोने पर अपने दोस्‍त और रिश्‍तेदारों से आसानी से संपर्क कर सकता है। हर समय संपर्क कर सकता है। इसके लिए उसके पास बहुत से संचार साधन मौजूद हैं। मोबाइल फोन, मोबाइल फोन पर वीडियो कॉल, सोशल मीडिया के कई प्‍लेटफॉर्म्‍स के माध्‍यम से सीधे संपर्क में रहने की सुविधाएं मौजूद हैं। पैसा है, सुविधाएं हैं, ऐश और आराम है। सब कुछ है। लेकिन फि‍र भी एक बेचैनी है। एक विचित्र अस्थिरता है। स्‍वयं की भावनाओं को संभालने का कड़वे अनुभवों का संघर्ष है।
यह सब कुछ व्‍यक्ति को दूसरे व्‍यक्ति के साथ आत्‍मीयता से संवाद नहीं करने दे रहा। न चाहते हुए भी लोग ऐसे अंधेरी-संकरी गुफा में घुसते जा रहे हैं, जहां से एक आदर्श मानव के रूप में वापस आना उनके लिए असंभव हो चुका है। चारों ओर हम वही होता देख रहे हैं, जो मनुष्‍य को नहीं करना चाहिए।
मनुष्‍य का दंभ इतना अधिक है कि वह अमर प्राकृतिक प्रतीकों-सूरज, चांद, सितारों, पृथ्‍वी और इसके वन-वनस्‍पतियों के प्रति भी नतमस्‍तक नहीं है। अपने होने, सांस लेने, जीवन में मौजूद होने और जिंदा रहने के इन प्राकृतिक कारकों के लिए मनुष्‍य के मन में मान-सम्‍मान नहीं। जहां उसका आधा जीवन इन प्राकृतिक घटकों की सुंदरता, विचित्रता, विडंबना पर विचार करते हुए व्‍यतीत होना चाहिए था, वहां उसका जीवन कीड़ों से भी बदतर स्थिति में रेंग रहा है।
आखिर जीवन किस तरह आधुनिक हो रहा है। क्‍या आधुनिकता यही है कि तरह-बेतरह की चीजों का उपभोग करके धरती को प्‍लास्टिक कूड़े के ढेर में बदल दो। उचित निपटान न होने पर उस कूड़े पर आग लगा दो। और आग से उठने वाले भारी, सड़े, तमाम दुर्गंधों से दम घोट रहे धुंए में जीवन को घुटते हुए देखो।
दो कौड़ी की राजनीति, मूर्ख राजनेताओं, भ्रष्‍ट-दुष्‍ट सरकारी कर्मचारियों और विचारशून्‍य लोगों वाले किसी देश-समाज में जीवन भला ठीक हो भी कैसे सकता है। ऐसे वातावरण में अच्‍छा सोचने व अच्‍छा काम करने वाले हैं ही कितने, जो उनकी प्रेरणा से सब ठीक हो जाएगा। जिधर देखो, उधर लालची नजरें पसरी हुई हैं। किसी को शांति, संतुष्टि नहीं चाहिए। सभी को भागना है। यहां से वहां। वहां से यहां। अंतिम उद्देश्‍य क्‍या है, यह जाने बिना, बस भागना है। इसलिए सब भागे जा रहे हैं।
हमें स्‍वयं को देखना होगा। अपना आत्‍मपरीक्षण करें। अपने मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में सोचें। क्‍या हम खतरनाक तरीके से कुंठित व अव्‍यवस्थित नहीं हो चुके हैं? हमारी सोचने की शक्तियां बिलकुल नहीं बचीं। कुछ सोचने से पहले ही हम गुस्‍से में बोलने लगते हैं। अपना बोला गया हमें भी याद नहीं रहता। यह प्रतिदिनि का एक अभ्‍यास हो गया है कि हमें गुस्‍से में कुछ बोलना है। दुनिया-समाज की बुराइयों से पीड़ित खुद के दुख को गुस्‍से में कुछ भी बड़बड़ाते हुए या मन में गलत-नकारात्‍मक-हीन विचारों को सोचते हुए बड़ा करते जाना है।
यह सब क्‍यों हो रहा है? क्‍या कभी हमने इस बारे में सोचा है? यह सब इसलिए हो रहा है क्‍योंकि हमने अपने प्राकृतिक जीवन को आधुनिक रंग में रंग लिया है। मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन के व्‍यर्थ नाटकों से खुद को चिपका दिया है। आधुनिक जीवन का दुरुपयोग दो देशों के बीच परमाणु युद्ध होने और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में तो बाद में होगा पर मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट के आगे खुद को समर्पित कर देने के रूप में यह आठ-दस वर्षों से खतरनाक तरीके से हो ही रहा है।
हमारा मनोविज्ञान फेसबुक की लाइक्‍स की गिनती, फ्रेंड्स लिस्‍ट की बढ़ोतरी, कौन हमें इग्‍नोर कर रहा है या कौन क्‍या लिख रहा है, आदि निरर्थक बातों तक सिमट गया है। हमें इन निरर्थक बातों के लिए केवल दो बातें याद रहती हैं। एक, मोबाइल फोन हमेशा साथ हो। दूसरा, मोबाइल हर समय चार्ज रहे। इसके अलावा हम मानव के रूप में अपनी ही नजर से ओझल हो चुके हैं। गांव, देश, धर्म तो छोड़ दीजिए। धीरे-धीरे हम अपना, माता-पिता का नाम भी भूलने लगेंगे। सोशल मीडिया पर अपने ही पैसे खर्च करके, हम प्राकृतिक रूप में मरने से पूर्व ही, अपनी बुरी तरह मरने की व्‍यवस्‍था कर रहे हैं। और मरते-मरते हम अपने दिल-दिमाग को इतना सुन्‍न, सुप्‍त और भ्रमलीन कर देंगे कि मरने के बाद हमारे शरीर से बाहर निकलने वाला हमारा आखिरी सहारा, हमारी आत्‍मा भी विलुप्‍त हो चुकी होगी।
अभी भी समय है। एक उपाय है। जिससे हमारा जीवन सरल, शांत और प्राकृतिक तरीके से बचा रह सकता है। हमें आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर निर्भर रहने की अपनी आदतें धीरे-धीरे कम करते हुए एक दिन पूरी तरह खत्‍म करनी होंगी। इसके लिए हमारा मार्गदर्शन देश, नेता, पूंजीपति, व्‍यवसायी, संस्‍थान, विद्यालय या हमारे महत्‍वाकांक्षी माता-पिता नहीं करेंगे। ये लोग इसलिए मार्गदर्शन नहीं करेंगे क्‍योंकि आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर हमारे निर्भर रहने से इनके आर्थिक-सामाजिक स्‍वार्थ जुड़े हैं।
जो कुछ करना है हमें खुद करना है। जिन लोगों की मजबूरी है उनका तो समझ आता है, पर जिन्‍हें मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, इंटरनेट आदि वस्‍तुओं-सेवाओं से कोई काम नहीं वे क्‍यों इन्‍हें अपने गले की फांस बना रहे हैं और जो लोग अपने रोजगार, काम-धंधे के लिए भी इन चीजों-सुविधाओं से जुड़े हुए हैं, उनका भी इनसे बुरी तरह मोहभंग हो चुका है। मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, इंटरनेट आदि चीजों से दूर रहकर हम न केवल अपने लिए अच्‍छा जीवन तैयार करेंगे बल्कि प्रकृति को बचाने में भी अपना सहयोग देंगे। सरकारें, नेता या कोई और हमारे लिए प्रकृति को नहीं बचाएगा। प्रकृति को बचाने का तरीका हमारे ही पास है। हम आधुनिक गैजेटों, वस्‍तुओं, सेवाओं और चीजों से दूर होते जाएंगे तो इन्‍हें बनानेवाले पूंजीपति, कारखाने भी बंद हो जाएंगे। और इन चीजों के लिए होनेवाला प्रकृति का दोहन भी बंद हो जाएगा।

4 comments:

  1. सच आधुनिक गैजेट फायदे कम नुकसानदेह ज्यादा हैं, यह बात एक दिन सबकी समझ में आ जाय तो फिर क्या कहने! सब अच्छा ही अच्छा होगा
    बहुत अच्छी जागरूक प्रस्तुति

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  2. अपने dambh ... अपने सुख आधुनिक उपकरण काम करें ... पर ये कहाँ सम्भव है वी भी इस तेज़ प्रतियोगी युग में ...

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  3. बहुत सटीक...
    गैजेट्स का अन्धानुकरण भी प्रकृति के दोहन का जिम्मेदार है..

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  4. उखड़े हुए पेड़ भला प्रकृति को क्यों सोचे ? पहले अपना जड़ तो संभाले । लेकिन स्थिति हद से बहुत आगे निकल गई है जहाँ से लौटना आसान नहीं है ।

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