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Friday, March 2, 2018

प्रकृति संरक्षण का सौंदर्यपरक माध्यम होली

भी मनुष्‍यों में सद्भावनाएं होती तो हैं, पर वे दबी रहती हैं। उनका सदुपयोग नहीं हो पाता। लेकिन फाल्‍गुन मनुष्‍य की इन सद्भावनाओं को अत्‍यंत विचलित करता है। प्राय: सभी व्‍यक्तियों का व्‍यक्तित्‍व तरह-तरह की भावनाओं का जंजाल बन चुका है। उनकी स्थिर, सद और प्रेमिल भावनाएं भी जंजाल में उलझी हुई हैं। संभवत: यह इस समयकाल और इसके मानवीय जीवन का प्रभाव या दुष्‍प्रभाव है। लोगों के विचारों और भावनाओं में पारस्‍परिक प्रेम, सहयोग नहीं रहा। जो कुछ बचा है, वह बाह्य आकर्षण और तात्‍कालिक लगन। दीर्घकालीन कुछ भी नहीं। बस एक-दो-तीन दिन या अधिक से अधिक एक महीने तक ही मनुष्‍य किसी घटना, दुर्घटना या व्‍यक्ति, प्रकृति से प्रभावित होता है। इसके बाद सब सामान्‍य हो जाता है। सामान्‍य भी नहीं, अनदेखा, अरुचिकर और कुंठा बढ़ानेवाला हो जाता है। जीवन में हम इसी पुरानी स्थिति से न घिरे रहें और हमारा सोचना-समझना पुराना ही न पड़ा रहे, इसके लिए त्रतुएं हमें सचेत करती रहती हैं।

धन्‍य है कि मौसम में परिवर्तन अनेक सुंदर माध्‍यमों से होता है। फाल्‍गुन, बसंत और होली ऐसे ही माध्‍यम हैं। जलवायु में यह नवप्रर्वतन जीवन को जीवंत कर देता है। पिछले मौसमों द्वारा दी गई मानसिक-शारीरिक व्‍याधियां इस समय दर्द में होते हुए भी आनंदकारी परिवर्तन से गुजर रही होती हैं। आत्मिक और मानसिक रूप से इस दुनिया से विलग कई लोग, केवल और केवल फाल्गुन के कारण इस दुनिया से वापस जुड़ जाते हैं। अन्‍यथा सामाजिक, मानवीय रूप में यह जगत अत्‍यंत असहज और प्रतिकूल हो चुका है। पिछले एक-डेढ़ दशक में मानवों का मशीनों से बढ़ा अति लगाव उन्‍हें कृत्रिम मानव बना चुका है। मानव जीवन का प्राकृतिक, ग्रामीण और सामाजिक स्‍वभाव तिरोहित हो चुका है। मानवीय जीवन में मानव के लिए जो कुछ बचा है, वह धन-संसाधन संपन्‍न होने की उत्‍कट इच्‍छा ही है। हमारा उद्धार इसी इच्‍छा के सहारे तो नहीं हो सकता।  
इतना होने के बाद भी व्‍यक्ति का जो मूल स्‍वरूप है, वह उसे यह सोचने के लिए अवश्‍य विवश करता है कि उसका जीवन वास्‍तव में वह नहीं, जैसा वह भौतिक दुनिया के कर्ताधर्ताओं के लिए बन रहा है या बन चुका है। जीवन का यह सत्‍याभास मानव को तब होता है, जब वह प्राकृतिक बातों, घटनाओं और परिवर्तनों का आत्‍मसाक्षात्‍कार करता है। होली का उत्‍सव इन त्रतु परिवर्तनों में से एक अद्भुत परिवर्तन है। हो‍ली त्‍योहार पौराणिक घटना के संदर्भ में भले ही मनाया जाता है, लेकिन यदि हम पौराणिक संदर्भ छोड़ केवल और केवल मौसम के बदलते सौंदर्य के अनुसार इस त्‍योहार को अनुभव करें, तो हमें एक से बढ़ कर एक उत्‍ताल अनुभूतियां होंगी। और यह सब होता है प्रकृति के सौंदर्य के आकर्षण के कारण।
प्रकृति इन दिनों कितने विविध सौंदर्य रूपकों से सजी-संवरी रहती है। सूर्योदय से लेकर सूर्योस्‍त तक सूर्यप्रकाश में समस्‍त प्राकृतिक घटक कितने भोले सौंदर्य से चमक रहे होते हैं। जहां देखो, वहां प्रकृति का नवप्रवर्तन हो रहा होता है। वृक्ष, वृक्षों की शाखाएं, लताएं, नभ, क्षितिज, रंग-‍रंगीले पुष्‍प, पृथ्‍वी की संपूर्ण हरियाली, मानव और पशु-पक्षी सभी इस त्रतु में विचित्र, मनमोहक बन जाते हैं। सूर्योदय के समय संपूर्ण धरा जिस सौंदर्य का बोध कराती है, वह निश्चित रूप में मानवीय जीवन के लिए अमृत होता है। दिन-दोपहर के बढ़ते रहने से प्रकृति की छटा जो रूप, वेश, सौंदर्य, रंग बदलती है उससे मानव का ह्रदय क्‍लेश मुक्‍त हो जाता है। संध्‍या समय बासंती मौसम का प्रौढ़ रूप ढलते सूर्य की किरणों के साथ जगमग-जगमग करता हुआ मनुष्‍य के समस्‍त आत्मिक-मानसिक विकार हर लेता है। होलिका दहन की रात को पूर्णिमा का चन्‍द्र और इसका प्रकाश दिनभर के बासंती सौंदर्य को अत्‍यधिक मादक बना देते हैं। ऐसी त्रतु में कृत्रिम मदिरा पान की आवश्‍यकता ही क्‍या, जब मनुष्‍य प्रकृति के मादक रूप से मदन बन चहुं ओर रंग-रगीला हो कर बिखर जाता है।
वर्षभर हमारे जीवन में देश-दुनिया की जिन-जिन घटनाओं ने बुरा प्रभाव डाला, इन घटनाओं की विसंगतियों के कारण हमारे भीतर जो भी कलुष एकत्र हुआ और जिस कारण हमारी मानसिक-शारीरिक अवस्‍था कुंठित हुई, बसंत के फाल्‍गुन मास में होली के रंगों में वह सब धूल-धू‍सरित होकर धुल जाता है। हमारा तन-मन नई चेतना, नव ऊर्जा और नवोमंग से भर कर जीवन से नवीन लगन लगाता है। इस प्रकार मनुष्‍य जीवन को प्राकृतिक, बासंती अपनत्‍व प्राप्‍त होता है।
 भक्‍त प्रह्लाद की हरि-लगन वास्‍तव में प्राकृतिक नियमों के प्रति संस्थिर लगन ही थी। हिन्‍दू वैदिक ज्ञान बताता है कि देवी-देवता किसी न किसी रूप में प्राकृतिक घटकों में संजीवित हैं। अ‍त: यदि हम प्रकृति और इसके बासंती, होलिका से संपूर्ण रूपों की उपासना करते हैं, तो यह देवी-देवताओं की उपासना के ही समान है। प्रह्लाद की प्राकृतिक लगन कितनी महान थी कि हिरण्‍यकश्‍यप की भेजी गई दुष्‍ट दूता हो‍लिका, अग्नि का साक्षात रूप होकर भी प्रह्लाद को जला न सकी। होलिका भी प्रकृति का अग्नि तत्‍व थी, लेकिन चूंकि उसका उद्देश्‍य अपने प्राकृतिक तत्‍व का दुरुपयोग करना था, इसलिए वह भक्‍त प्रह्लाद की विष्‍णु भक्ति के प्रभाव में अपने उद्देश्‍य में सफल न हो सकी। प्रकृति के हरि रूप ने प्रह्लाद की सार्थक भक्ति का संरक्षण किया। वास्‍तव में देवताओं का यह संरक्षण प्रकृति के सच्‍चे उपासकों को भी अवश्‍य प्राप्‍त होता है। जो मनुष्‍य आत्मिक-आध्‍यात्मिक रूप में प्रकृति के विभिन्‍न रूपों-स्‍वरूपों, रंगों-अंगों के प्रति सच्‍ची निष्‍ठा रखता है वह अवश्‍य ही चमत्‍कारिक प्राकृतिक उन्‍नति करता है।
इस दुनिया में उन्‍नति की महत्‍ता प्राकृतिक रूप में ही है। भौतिक उन्‍नति को प्राकृतिक उन्‍नति के समक्ष नहीं रखा जा सकता। आधुनिकता का अत्‍यधिक आनंद प्राप्‍त कर लेने के बाद भी देश-दुनिया के अधिकांश विद्वानों को प्रकृति के संबंध में जो कटु अनुभव हुए या हो रहे हैं, उनका निष्‍कर्ष यही है कि हमें पुरातन प्राकृतिक मानवीय जीवन ही आधुनिकता की नृशंस आपदाओं से बचा सकता है। इसलिए प्रकृति के संरक्षण की दिशा में क्रांतिकारी कार्य किए जाने की तत्‍काल आवश्‍यकता है। इसके अभाव या विलंब में दुनिया दिन-प्रतिदिन मारक जलवायु परिवर्तन से गुजरती रहेगी। 

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