Sunday, January 29, 2017

उसे न जाने क्या हो गया

स समय उसे यह तक याद नहीं कि वह एक जीव है। दो या तीन वर्ष से उसे अपने मनुष्‍य होने पर भी संदेह हो आया। पिछले दस महीने तो उसके जीवन को पत्‍थर बनाने में लगे रहे। अब भी यही स्थिति है। वह मनुष्‍य होने की सामान्‍य भावनाओं से भी अलग हो गया। उसके भीतर प्रेम, संवेदना और जिज्ञासाओं के तंतु सूख चुके हैं। जो कुछ भी उसके सोच-विचार में बचा हुआ है वह केवल इतना भर कि उसे यह याद आ जाता कि वह भी कैसे वैसा ही बन चुका है, जैसे दुनिया के अधिकांश लोग उसे दिखाई देते थे।
वह सोचता था कि उसके हृदय में ममत्‍व का ताप है। वह अपनी लोक कल्‍याणकारी और प्रेमिल संभावनाओं के बल पर स्‍वयं से लगाव रखता था। पर अब उसके हृदय में ऐसी संभावनाएं नहीं रहीं। वह अज्ञानतावश कठोर भावनाओं के मार्ग पर बढ़ चला है। वह अपने व्‍यक्तित्‍व के इस विघ्‍नकारी परिवर्तन से स्‍वयं के लिए चिंतित नहीं है। बल्कि उसे चिंता है कि परिवार, समाज और मित्रों के होते हुए वह ऐसे बन गया।
यदि वह किसी एकांत स्‍थान में होता और तब उसके व्‍यक्तित्‍व में ऐसा बदलाव होता तो उसे अपने इस नैसर्गिक प्रत्‍यावर्तन से निराशा न होती। लेकिन उसके जैसे अयोग्‍य, अपरिश्रमी, अकर्मण्‍य और निराश व्‍यक्ति को जब उसकी पत्‍नी जीवन की विशाल अभिलाषाओं के लिए देखती है तो उसकी खिन्‍नता उसे अंधेरा कोना पकड़ने को उकसाती। उसकी बिटिया रानी जब ऐसे पिता से बाल्‍य-कल्‍पनाओं के अनुसार खेल-खिलौनों और दूसरी सुख-सुविधाओं की आशा रखती तो उसकी आत्‍मलज्‍जा उसे उन परिस्थितियों में और धकेल ले जाती, जिनके कारण वह अकर्मण्‍य और निराश है।
माता-पिता की अनेक सांसारिक-भौतिक इच्‍छाओं को पूरा न कर पाने के कारण भी उसकी शारीरिक-मानसिक स्थिति अत्‍यंत वैरागी हो चुकी है। उसे लगता है कि उसके परिश्रम में खोट नहीं। शायद यह उन प्रबंधकों की अयोग्‍ता थी, जो उसके परिश्रम को पहचान न पाए। संभवत: उसे इस कपटी दु‍निया में केवल परिश्रम करना ही आता है। जबकि प्रबंधकों को तो उसके परिश्रम के साथ-साथ अपने हर अच्‍छे-बुरे प्रबंधकीय निर्णय के लिए उसकी सहमति भी चाहिए।
 इन दिनों लगता है वह एक ऐसे भू-स्‍थल पर रह रहा है, जो मनुष्‍यों में केवल हत्‍यारी महत्‍वाकांक्षाओं को पाल रहा है। कोई भी नहीं दिखता जो अपने मनुष्‍य स्‍वरूप में रहते हुए सही सोच-विचार करता हो। चारों ओर भौतिक इच्‍छाओं की विषैली लताएं फैल रही हैं। हरेक मनुष्‍य के विचारों में कुंठा की विषबेलें गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। मनुष्‍य केवल दुर्भावनाओं के आधुनिक प्रतीक के रूप में उपस्थित है। मनुष्‍य जीवन की सहजता-सरलता समाप्‍त हो चुकी है। अच्‍छाई और गुणों का ज्ञान मात्र शब्‍दों, परिभाषाओं, भाषणों और पुस्‍तकों तक सिमट गया।    
पिछले दस महीनों में उसने प्रकृति से भी संबंध विच्‍छेद कर लिया। क्‍योंकि सूरज, चांद-सितारे, पेड़-पौधे, धरती-आकाश जैसे प्राकृतिक उत्‍स भी उसकी दृष्टि में नहीं ठहरते। दृष्टि में तो तब ठहरेंगे जब वे उसे स्‍मरण होंगे। वे तो उसकी संस्‍मृतियों में भी नहीं हैं। अब इन प्रकृतियों के प्रति वह आकर्षित नहीं होता। इनसे स्‍वाभाविक अपनत्‍व नहीं बना पाता। उसके विचारों में भी इनके लिए स्‍थान शेष न रहा। उसे न जाने क्‍या हो गया है।
जो व्‍यक्ति ऐसा हो जाएगा भला उसके मुख के भावों को पढ़ना भी कैसे संभव हो सकता है। इसीलिए कोई उसकी दुखी अवस्‍था देखकर भी आश्‍वस्‍त नहीं होता कि वह मानव है और दुखी है। अपने-पराए सभी लोगों की दृष्टि में उसका विचार होता भी होगा या नहीं, इस बात की भी सुध उसे नहीं रहती। वह स्‍वयं में स्‍वयं के लिए जो भी हो परंतु सामान्‍य सोच रखनेवाला कोई भी व्‍यक्ति उसे देख यही सोचेगा कि उसकी अपनी बुद्धि, विवेक और मस्‍तिष्‍क सब खो चुका है।

उसकी स्थिति के बारे में सोचकर लगता कि यदि वह वन में अकेला होता तो अपनी इस स्थिति पर प्रसन्‍न हो रहता। उसे सांत्‍वना के लिए दूसरों से कोई अपेक्षा तो नहीं होती। साथ के लिए किसी मनुष्‍य की इच्‍छा तो न होती। परंतु वह अकेला नहीं। वह जनसागर में डूब रहा है। लोगों की भीड़ और चल-अचल वस्‍तुओं से पटे पड़े संसार, इसकी कठोरता-खोखलाहट के बारे में विचार कर वह त्रस्‍त है। इस स्थिति में उसे अपनी बुद्धि-विवेक-मानस खोने का आनंद नहीं मिलता बल्कि निरंतर घड़घड़ाहट करता भय सताता है। उसका अपने बारे में आजकल संपूर्ण आकलन यही है कि वह एक अवसादग्रस्‍त जीवन के कारा में बंद बुरी तरह छटपटा रहा है। 

Tuesday, January 17, 2017

विरोधियों की राजनीति पर भारी केंद्र की राजनीतिक शुचिता

पनी अनेक अवैध गतिविधियों के माध्‍यम से अर्थव्‍यवस्‍था को अवैध मुद्रा संभावित क्षेत्र यानी भ्रष्‍टाचार में तब्‍दील कर कांग्रेस ने देश को आर्थिक ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक-सामरिक रूप से भी खोखला कर दिया था। लगातार दस वर्षों तक गठबंधन सरकार की सर्वेसर्वा होने के नाते उसने केंद्र में खुद के और राज्‍यों में क्षेत्रीय दलों के घपलों-घोटालों-अवैध कारोबार को एक तरह से वैध स्‍वरूप प्रदान करना शुरू कर दिया था।
आज पश्चिम बंगाल में रोजवैली और शारदा चिटफंड घोटाले में यदि त्रृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के नेता पकड़े जा रहे हैं, तथाकथित सबसे ईमानदार राजनीतिक पार्टी का तबका धारण करने को अतिआतुर आप के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के हवाला कारोबार के गणित साक्ष्‍य सहित उद्घाटित हो रहे हैं तथा कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दलों के राजनेताओं द्वारा की गई अवैध लेन-देन की गतिविधियों के बारे में जांच एजेंसियां आए दिन कोई न कोई खुलासा कर रही हों, ऐसे में केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति सजग भारतीय नागरिक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।
मुद्राबंदी से क्‍या लाभ होंगे या हो सकते हैं इसके लिए क्षेत्रीय दलों की घटिया राजनीतिक सोच-समझ से मुद्राबंदी को नहीं देखा जा सकता है। किसी भी देश में अर्थव्‍यवस्‍था एक ऐसा विषय है, जो अर्थव्‍यवस्‍था के प्रकट व गुप्‍त घटकों का संपूर्ण फ्लोचार्ट बनाए बिना कदापि नहीं समझा जा सकता। और भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में इसके सामान्‍य व्‍यवहार के समानांतर जो अवैध आर्थिक व्‍यवहार वर्षों से देश में हो रहा था उसको समझने के लिए तो फ्लोचार्ट को और भी व्‍यापक बनाने की जरूरत है।
ऐसी परिस्थितियों में बड़े मूल्‍य की मुद्रा को बंद करके ही देशभर में फैले अवैध कारोबार को नियंत्रित किया जा सकता था। यदि इस प्रक्रिया में बैंक अधिकारियों ने अवैध धन को वैध बनाने का दुष्‍प्रयास किया तो इस बारे में मुद्राबंदी कार्यक्रम को विफल बताना अनुचित है। वास्‍तव में बैंक अधिकारियों के सहयोग से कालाधन का वैधीकरण भी उन राजनीतिक विरोधियों के कारण ही हो सका है, जो मुद्राबंदी नहीं होने देना चाहते थे। दिल्‍ली में आप, पश्चिम बंगाल में त्रृणमूल, यूपी में सपा जैसे राजनीतिक दलों का अस्तित्‍व जिस कांग्रेस की बदौलत है, उसने इनको केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति इस शर्त पर एक करने की कोशिश करी कि शायद भविष्‍य में सत्‍तारूढ़ होने में अगर कभी गठबंधन के सहारे की जरूरत हो तो क्‍यों न अभी से मामला फि‍ट कर लिया जाए। इसके अलावा मुद्राबंदी का विरोध करनेवाले राजनीतिक दलों का मकसद और कुछ भी नहीं था।
अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को बड़े मूल्‍य की मुद्रा बंद होने पर इसलिए तकलीफ हो रही है क्‍योंकि इनका वोटबैंक का सारा तंत्र अवैध नकदीकरण के आधार पर ही तय होता रहा है। रोकड़रहित लेन-देन के बारे में भले ही साइबर सुर‍क्षा की कमी का हवाला मुद्राबंदी के समर्थकों को भी सोचने पर विवश करता हो परंतु इतना तो है कि देश में जो राजनीतिक दल चुनावों में अवैध मतों से लेकर अवैध मुद्रा और अन्‍य अवैधानिक कामों में बुरी तरह लिप्‍त थे, अब उनका काल उनके सिर पर नाच रहा है। उनके अवैध कारनामों के दिन लदने वाले हैं।
अनेक राज्‍यों में स्‍थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिला बहुमत पूरे राजनीतिक परिवेश को समझने के लिए पर्याप्‍त है। और आनेवाले दिनों में इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि पांच राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी पंजाब व मणिपुर में गठबंधन के रूप में तथा यूपी, उत्‍तराखंड और गोवा में पूर्ण ही नहीं अपितु प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। गठबंधन की स्थिति में भी भाजपा का मत प्रतिशत पंजाब व मणिपुर में बढ़ेगा ही बढ़ेगा।
कुछ मीडिया संस्‍थान अपने पत्रों और दूरदर्शनीय प्रसारण माध्‍यमों में पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों का सर्वेक्षण दिखा रहे हैं। उनका सर्वेक्षण कुछ उसी तरह का है जैसे कोई थलचर जीव चारों ओर से दूसरे हिंसक जीवों से घिर जाने के बाद जमीन में अपना सिर यह सोच कर गाड़ लेता है कि किसी ने उसको नहीं देखा इसलिए उसकी जान बच जाएगी। मीडिया संस्‍थानों के तथाकथित सर्वेक्षण भी भाजपा के बढ़ते जनाधार की अनदेखी कर रहे हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार भाजपा पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्‍त करेगी। जबकि वस्‍तुस्थिति इससे बिलकुल विपरीत है। जैसे कि वे कह रहे हैं कि उत्‍तर प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा। जबकि यह लेखक ठोक-बजा कर यह बात रेखांकित करता है कि यदि उप्र में चुनाव साफ-सुथरे संपन्‍न हुए तो बहुमत पाने के लिए भाजपा की आंधी लोकसभा 2014 से भी अधिक तीव्र होगी। पांच राज्‍यों का यह चुनाव इस कोण से भी बड़ा उदाहरण बनने जा रहा है कि कांग्रेस सहित क्षेत्रीय दल केवल इसी बार नहीं बल्कि सदैव के लिए राजनीति की पृ‍ष्‍ठभूमि में पहुंचने वाले हैं। विशेषकर उत्‍तर प्रदेश, गोवा और उत्‍तराखंड में।  
आज देश का केंद्रीय शासन देश पर शासन करने के लिए यदि कुछ पीड़ादायक निर्णय ले भी रहा है तो वह शासन-व्‍यवस्‍था की विवशता है, जिसकी जड़ बहुत गहरे पिछली सरकारों के कार्यकलापों के कारण जमी हुई है। भाजपा नेतृत्‍व वाली ढाई वर्षीय केंद्र सरकार के बारे में छोटे-मोटे कितने भी लांछन भले ही लग रहे हों किंतु दो बातें इस सरकार के बारे में विरोधियों और उनके अंध-समर्थकों को अवश्‍य याद होनी चाहिए। एक, घोटालों की सरकार का रिकार्ड बना चुकी संप्रग सरकार की तुलना में राजग में अब तक एक भी घोटाला नहीं हुआ। और दो, देश के भीतर पिछले ढाई वर्ष में एक भी आतंकी दुर्घटना नहीं हुई। और यह सब उपलब्धि उस दौर में और उन परिस्थितियों में मिली जब यूरोप के विकसित देश तक आतंक के दंश से मुक्‍त नहीं रहे। इसके अलावा जन-गण-मन के लिए वर्तमान सरकार द्वारा एक अल्‍पाव‍धि में ही कम से कम उतनी योजनाएं तो लागू कर ही दी गई हैं, जितने कि कांग्रेसी राज में घोटाले भी नहीं हुए। और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी योजनाओं का सुचारू क्रियान्‍वयन भी सुनिश्चित हो रहा है।
मोदी सरकार के बेहतर होने के पक्ष में इतने तार्किक आधार हैं कि वर्तमान सरकार चाहे तो विशाल जन भावनाओं का प्रतिनिधित्‍व करते हुए उन्‍हें चुनावी लाभ के लिए सीधे-सीधे अपने पक्ष में मोड़ सकती है। परंतु इन लाभकारी राजनीतिक परिस्थितियों में भी मोदी सरकार ने राजनीतिक मर्यादा और शासकीय शुचिता के आदर्श स्‍थापित किए हैं। यदि ऐसा न होता तो सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह की श्रृंखला में अनेक कांग्रसियों सहित क्षेत्रीय दलों के न जाने कितने नेता राजनीनिक प्रतिद्वंदिता का शिकार हो कारागार में पड़े रहते। घपलों-घोटालों के आरोप में फंसे नेता और अफसर यदि अभी तक कठोर दंड नहीं पा सके हैं और इसके लिए वर्तमान सरकार को कोसा जा रहा है तो कोसने वालों को इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि दंड का निर्धारण न्‍यायपालिका करेगी न कि कार्यपालिका। और कार्यपालिका व विधायिका को लोकसभा व राज्‍यसभा के माध्‍यम से बीते संसद सत्र में निरंतर कुंद ही किया जाता रहा।
विकेश कुमार बडोला