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Monday, November 6, 2017

हिन्दू आतंक का वक्तव्य निराधार है

भारत बड़ा विचित्र राष्‍ट्र है। पौराणिक तथा ऐतिहासिक रूप में हिन्‍दू राष्‍ट्र होने के बावजूद यहां हिन्‍दुओं के समर्थन में विद्यमान सनातनी तथा सांस्‍कृतिक विचारों, उत्‍सवों और अन्‍य उपक्रमों को अपराध की नजर से देखा जाता है। मात्र उनहत्‍तर वर्ष पूर्व अस्तित्‍व में आए विरोधाभासी संविधान के माध्‍यम से भारत को बलात धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र बनाने की कोशिश की गई। स्‍वतंत्र रूप में विचार करने पर किसी भी संवेदनशील व्‍यक्ति को सहज ही ज्ञात हो जाता है कि धर्मनिरपेक्ष की अवधारणा विधिसम्‍मत ढंग से जनता पर थोपी नहीं जा सकती। हिन्‍दू धर्म के प्रादुर्भाव की गणना तो अभी तक नहीं हो पाई कि यह कितना पुरातन धर्म है। जबकि धर्म के नाम पर अस्तित्‍व में आई अन्‍य जीवन-पद्वतियों की काल गणना आसानी से उपलब्‍ध है। जीवन-पद्वतियों को राजनीतिक महत्‍तवाकांक्षाओं के लिए धर्म की श्रेणी में रखना नई बात नहीं है। भारत में यह अभ्‍यास हिन्‍दू धर्म को चुनौती देने के लिए हजारों वर्षों से चला आ रहा है। आज भी इसमें कमी नहीं आई। किसी न किसी प्रकार से हिन्‍दुओं के अस्तित्‍व को मिटाने के षड्यंत्र आज भी जारी हैं। तीन वर्ष पूर्व संप्रग 2 सरकार ने मुसलिम वोटों के लालच में लोकसभा में हिन्‍दू विरोधी विधेयक प्रस्‍तुत किया था। तत्‍कालीन सरकार के गृहमंत्री से लेकर अनेक प्रमुख नेताओं ने हिन्‍दू आतंक का हौवा बनाकर अल्‍पसंख्‍यकों के संरक्षण के नाम पर हिन्‍दुओं के मौलिक अधिकारों को दबाने का असफल प्रयास किया था। इसका परिणाम यह रहा कि कांग्रेस 2014 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार गई। लेकिन आज भी हिन्‍दू विरोधी कांग्रेसी नीति के समर्थक नेता, अभिनेता और अन्‍य लोग हिन्‍दू आतंकवाद पर वक्‍तव्‍य देने से बाज नहीं आ रहे।
विकेश कुमार बडोला
इसी संदर्भ में दक्षिण भारतीय फि‍ल्‍मों के चर्चित अभिनेता कमल हासन ने किसी पत्र के लिए लिखे गए अपने आलेख में भारत में बढ़ते हिन्‍दू आतंक को लेकर अपना रोष प्रकट किया है। कमल जैसे अभिनेता, जो अपनी विभिन्‍न फि‍ल्‍मों में बुराई के परिहार हेतु उग्र हिंसा का सहारा लेकर अच्‍छाई स्‍थापित करने का संदेश देते रहे हैं, समझ नहीं आता कि वैश्विक स्‍तर पर आतंक फैलाने के लिए सिद्धदोषी मुसलिम आतंकी समूहों, इन समूहों के सरगना मुसलिम आतंकियों को आतंकी न कहकर, वे हिन्‍दुओं को किस आतंक के लिए आतंकी कह रहे हैं। भारत में मुसलिमों द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद का दमन करने के लिए हिन्‍दुओं ने ऐसी आतंकी गतिविधियों पर पिछले तीन वर्षों में राजनीतिक, सामाजिक व व्‍यक्तिगत रूप में अत्‍यधिक साहसी प्रतिक्रिया दिखाई है, तो इसमें गलत क्‍या है। क्‍या भारत के नागरिक आत्‍मरक्षा तथा राष्‍ट्रीय गौरव के सम्‍मान हेतु वैश्विक स्‍तर पर दोषी मुसलिम आतंकवादियों का विरोध भी न करें। क्‍या हिन्‍दुओं द्वारा किया जानेवाला ऐसा विरोध हिन्‍दू आतंक कहलाएगा? क्‍या कमल हासन या कोई भी व्‍यक्ति अपनी जान की रक्षा के लिए प्रतिहिंसा नहीं करता? हिन्‍दू भी आत्‍मरक्षा में प्रतिहिंसा ही कर रहा है। ऐसा करना विरोधाभासी निर्णयों के लिए ख्‍यात राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय कानून में भले ही अपराध आंका जाता हो, लेकिन न्‍याय के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुरूप आत्‍मरक्षा हेतु यही एकमात्र उपाय है।
आजकल पूरी दुनिया आतंकी हमले झेल रही है। विकसित देश अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, स्‍पेन, ब्रिटेन में भी पिछले वर्षों में अनेक आतंकी हमले हो चुके हैं। इनमें कई निर्दोष लोगों के प्राण चले गए। आतंकी हमले करनेवाले सभी आतंकी मुसलिम समुदाय से संबंधित होते हैं। कानूनी रूप से कमजोर दुनिया के अविकसित देशों में आतंकी समूहों ने अपने आतंक के अड्डे बना रखे हैं। लगभग सभी ऐसे देश मुसलिम देश हैं। आतंकी समूहों को इन देशों की सरकार व जनता का भी समर्थन मिल रहा है। आतंक से पीडि़त भारत के वर्षों के अनुभव के बाद मोदी सरकार किसी तरह दुनिया के शक्तिशाली राष्‍ट्रों को आतंक की परिभाषा, धर्म और उद्देश्‍य समझाने में सफल हुई है। पूरे विश्‍व के प्रभावशाली देश भले ही आधिकारिक रूप में यह घोषणा नहीं करते, लेकिन वे मान चुके हैं और पूर्णत: संतुष्‍ट हैं कि वैश्विक आतंक के पीछे का खेला विश्‍व में मुसलिम धर्म की स्‍थापना ही है।
मुसलिम धर्म के नाम पर यहां-वहां जितनी भी निकृष्‍ट गतिविधियां परिचालित हो रही हैं, उन्‍हें देखकर तो कोई अपरिपक्‍व किशोर भी समझ सकता है कि धर्म के नाम पर यह कितना घिनौना काम चल रहा है। तो क्‍या कमल हासन ऐसे घिनौने सामाजिक स्‍वरूप में खुद को ज्‍यादा सुरक्षित व संपन्‍न मानेंगे, जो वे आदर्श व सभ्‍य हिन्‍दुओं को अनावश्‍यक ही आतंक की परिधि में लाने की कुचेष्‍टा कर रहे हैं। कमल हासन जैसे लोगों की मंशा ऐसे ओछे वक्‍तव्‍यों की आड़ लेकर राजनीतिक लीक पर चलने की ही है। उन्‍हें लगता है‍ कि भाजपा विरोधी राजनीतिक दल कांग्रेस में राजनीतिक संरक्षण पाने के लिए यही सर्वोपरि तरीका है। चूंकि अभिनेता के रूप में अब उनका भविष्‍य चुक गया है, इसलिए वे नेता के रूप में कहीं न कहीं स्‍थापित होने के लिए कोई न कोई रास्‍ता तो ढूंढेंगे ही। लेकिन राजनीति में आने का उनका यह रास्‍ता दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से अत्‍यंत घिनौना है। एक अभिनेता के रूप में जन-जन में उन्‍होंने जो ख्‍याति अर्जित की थी, हिन्‍दुओं को आतंकवादी कहने की उनकी प्रवृत्ति ने उस पर तुषारापात कर दिया है। एक प्रतिष्ठित व्‍यक्ति की इतनी न्‍यून सामाजिक समझ पर कुढ़न तो होती ही है, साथ ही साथ यह भी लगता है कि धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र की व्‍यर्थ कल्‍पना को संवैधानिक स्‍वरूप प्रदान कर भारत देश के बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के साथ कितना बड़ा विश्‍वासघात किया गया।
इस संबंध में अब प्रत्‍येक मंच पर खुलकर वार्ता किए जाने की आवश्‍यकता है कि जब एक परिवार के दो लोगों के बीच भोजन के स्‍वाद को लेकर मतभेद उभर सकते हैं, तो धर्म के नाम पर बंटे अनेक समुदायों के बीच राष्‍ट्रीय एकता कैसे संभव है। और जब यह संभव नहीं तो धर्मनिरपेक्ष शब्‍द ही अपने आप में पूरी तरह व्‍यर्थ है। कम से कम हिन्‍दुओं के पौराणिक हितों और सामाजिक अधिकारों की कीमत पर मुसलिम धार्मिक विकृति को बिलकुल स्‍वीकार नहीं किया जा सकता। और ऐसी विकृति के समर्थक कमल हासन जैसे लोगों के हिन्‍दू विरोधी बयान तो और भी ज्‍यादा अस्‍वीकार्य हैं।   

4 comments:

  1. दिनांक 07/11/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (07-11-2017) को
    समस्यायें सुनाते भक्त दुखड़ा रोज गाते हैं-; 2781
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. यह राजनीति से प्रेरित है। चर्चा में आने से प्रेरित है। गोया जैसे इनके संवेदनशील मन को बहुत आघात पहुंचता हो। व्यवसायिक हित के लिये चारित्रिक शुचिता को परे रख किसी भी तरह की फिल्में करने वाले अब देश की विसंगतियों पर चर्चा कर रहे है।

    हाईलाइट में आने का शुरुआत करने का तात्कालिक लाभ लेने के उद्देश्य से इसी प्रकार के बयान देने का बद-चलन भारतीय राजनीति में आम है।

    अकाट्य तथ्यों और दलीलों से सज़्ज़ित बहुत उपयोगी लेख आपका।

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  4. दरअसल हिन्दुओं में शायद इतना दम नहीं रहा इसलिए हर कोई आ के गरिया जाता है ... जो मर्जी कह जाता है ... और जो मर्जी ही क्यों ... हम खुद भी खुद को गाली निकाल जाते हैं ... गरिया जाते हैं ... फिर कहते हैं तो क्या हुआ कहने की स्वतंत्रता है ... हमें क्या लेना देना ... हम क्यों दूसरों की तरह बने (अपना विरोध न सुन सकने वालों जैसे) ...
    इन जैसों का इतना विरोध होना चाहिए की आगे कुछ कहने वाले सोच न सकें ऐसा करने का ...

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