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Sunday, October 8, 2017

बहुत हुआ, अब शीघ्र स्पष्ट हो आतंक की परिभाषा

तंकी घटनाओं की चपेट में आए लोगों की पीड़ा कितनी मर्माहत करनेवाली होती होगी, यह घटनास्‍थल से दूरस्‍थ लोगों के लिए समझना असंभव है। ऐसी घटनाओं में प्राण गंवानेवाले अपनी अंतिम सांसों के साथ दुनिया को किस रूप में देखते होंगे तथा प्राण गंवा चुके लोगों के संबंधी जीवनभर किस संताप से गुजर कर खुद को संभालते होंगे, लगता है दुनिया के कर्ताधर्ता यह समझने की शक्ति गंवा चुके हैं। यदि उनमें पीड़ितों का दर्द समझने की संवेदना होती, तो निश्चित रूप से अभी तक आतंक के जड़मूल सफाए के लिए एक वैश्विक समाधान खोज लिया जाता। लेकिन दुर्भाग्‍य से ऐसा हो नहीं पा रहा और मानवजाति का आतंकजनित दमनचक्र निरंतर चल रहा है, जिसके सम्‍मुख पूरी दुनिया असहाय सी प्रतीत होती है।
विकेश कुमार बडोला
विगत एक-दो दिन में एक नहीं बल्कि पूरे तीन देशों में आतंक के नाम पर वीभत्‍स खूनी खेल खेला गया। अमेरिका के लॉस वेगास स्थित एक कॅसीनो में म्‍यूजिक कंसर्ट के दौरान अज्ञात हमलावरों द्वारा की गई गोलीबारी में 58 लोगों की मौत हो गई व 515 से ज्‍यादा लोग हताहत हो गए। पुलिस द्वारा एक हमलावर को तो तुरंत मार गिराया गया पर दूसरा लोगों की भगदड़ का फायदा उठाकर भाग गया। मारे गए हमलावर की पहचान 64 वर्षीय स्टीफन पैडेक के रूप में हुई तो है, लेकिन उसके बारे में यह भी पता चला है कि उसने कुछ समय पूर्व इसलाम स्‍वीकार कर लिया था। वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर 2011 में हुए हमले के बाद यह अमेरिका में पहला बड़ा आतंकी हमला है। ट्रंप शासन के लिए यह विकट चुनौती का समय है।
विगत वर्ष नवंबर माह में राष्‍ट्रपति के रूप में सत्‍तारूढ़ रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका में इस तरह की यह पहली घटना है। भले ही आइएस जैसे आतंकी समूह इस घटना के पीछे खुद की भूमिका बता रहे हैं, पर अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञ इसे नकार रहे हैं। अभी तक हमलावरों का आतंकी जुड़ाव तो स्‍पष्‍ट नहीं हो सका है, लेकिन हो न हो यह घटना किसी न किसी रूप में आतंक से जुड़ी हुई ही प्रतीत होती है। क्‍योंकि जिस तरह ट्रंप ने आतंकियों के संरक्षक देशों के नागरिकों का अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगाया था और आतंक पर प्रतिबंध के उद्देश्‍य हेतु मुसलिमों पर नजर रखने के लिए अनेक निगरानी तंत्र बनाए थे, उन परिस्थितियों में आतंकवादी निश्चित ही अमेरिका पर भी हमला करने का अवसर ढूंढ रहे होंगे।
अमेरिका में पूर्व में कई अवसरों पर मानसिक रूप से असंतुलित व कुंठित कुछ स्‍थानीय नागरिक भी ऐसे ही हमलों में प्रत्‍यक्ष लिप्‍त रहे हैं, जिनका आतंकी गिराहों से कोई जुड़ाव कभी नहीं रहा। वैसे सच्‍चाई तो घटना की विस्‍तृत जांच के बाद ही ज्ञात हो पाएगी कि यह आतंकी घटना आतंकी समूहों के मार्गदर्शन में हुई है या कुंठाग्रस्‍त व्‍यक्तियों के भावावेश के कारण।
इससे पूर्व फ्रांस स्थित मार्शेली शहर के मुख्‍य रेलवे स्‍टेशन पर दो स्त्रियों को चाकू मारकर उनकी हत्‍या कर दी गई। प्रत्‍यक्षदर्शियों के अनुसार हमला करनेवाले ने अल्‍लाह हो अकबर चिल्‍लाते हुए यह वीभत्‍स कांड किया। सैन्‍यकर्मियों ने हमलावर को तुरंत गोली मार दी। पिछले दो वर्षों में फ्रांस में कई आतंकी हमले होने के बाद हालांकि यह राष्‍ट्र आतंकवाद को देखते हुए पहले से ही सचेतक स्थित में था, परंतु तब भी आतंकी घटनाएं रोके से भी नहीं रुक रहीं। फ्रांस में आतंक की बड़ी घटना तब हुई थी जब जनवरी 2015 में साप्‍ताहिक पत्रिका शार्ली एब्‍दो के कार्यालय में आतंकियों ने 12 लोगों की हत्‍या कर दी थी। फ्रांस ही नहीं, इसी समयावधि में कनाडा में एक कार सवार ने पुलिस अधिकारी को टक्‍कर मारने के बाद उसे चाकू मार दिया। इस घटना के कुछ घंटे बाद एक वैन ने अनेक पथिकों को रौंद दिया, जिसमें चार लोग बुरी तरह घायल हो गए।
आतंक के नाम पर इस तरह की घटनाओं पर रोक के लिए पीड़ित देश शून्‍य सहनशीलता का मानदंड क्‍यों नहीं बना रहे और इस हेतु सैन्‍य व गुप्‍तचर सक्रियता क्‍यों नहीं बढ़ा रहे, यह समझ से परे है। अपने विकसित होने की गर्वानुभूति में ऐसे देश यह कदापि न भूलें कि वैश्विक आतंक का धर्म भले ही आधिकारिक रूप में परिभाषित न हो सका हो या इसे परिभाषित करने की राजनीतिक-सामरिक-कूटनीतिक विवशताएं हों, परंतु व्‍यावहारिक रूप में लगभग प्रत्‍येक आतंक पीड़ित देश यह मान चुका है कि आतंक का धर्म भी है और उद्देश्‍य भी है। इसलिए अब इन देशों को अपनी सभी विवशताओं को किनारे रख केवल और केवल आतंक का समूल नाश करने के लिए वैश्विक स्‍तर पर एकत्र होना आरंभ कर देना चाहिए।
यह लेखक आतंकी घटनाओं पर आधारित अपने अनेक लेखों में बारंबार आतंक के धार्मिक उद्देश्‍यों की ओर ध्‍यानाकर्षण करवाता रहा है। परंतु अभी तक आतंक के उद्देश्‍य और धर्म पर न तो राष्‍ट्रीय और न ही वैश्विक स्‍तर पर सर्वसम्‍मति से कोई आधिकारिक वक्‍तव्‍य निकाला जा सका है। यह अत्‍यंत दुर्भाग्‍यशाली और आतंक के सम्‍मुख घुटने टेकने जैसी मानसिकता है। जितनी जल्‍दी हो, विश्‍व को इस मानसिकता से उबरना होगा।
विश्‍व के वामपंथियों द्वारा गढ़ी गई धर्मनिरपेक्षता की धारणा आज मुसलिम आतंकवाद के रूप में अत्‍यंत आत्‍मघाती हो चुकी है। अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रधान प्रतिनिधित्‍व में विगत पांच-छह दशक से संचालित संयुक्‍त राष्‍ट्र के अनेक संगठनों ने आतंकवाद के संबंध में आरंभ में जो द़ृष्टिकोण अपनाया, उनके निराधार तर्कों को विश्‍व के आतंक पीड़ित और आतंक से बचे दोनों तरह के देश आज भी ढो रहे हैं। इन तर्कों के आधार पर आतंक की परिभाषा किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या देश के परिप्रेक्ष्‍य में निर्धारित नहीं हो सकती। आतंक का विध्‍वंशकारी वातावरण उत्‍पन्‍न करने के बाद भी धर्म के नाम पर मुसलिम और देश के नाम पर पाकिस्‍तान आज तक इसीलिए संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की दृष्टि से बचते रहे या उन्‍हें संयुक्‍त राष्‍ट्र के किन्‍हीं खास देशों की व्‍यापारिक व सामरिक महत्‍वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बचाया जाता रहा। जो भी हो, पर आज संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में प्रधान की पदवी के रूप में सम्मिलित कुछ देशों में भी आतंकवाद बुरी तरह व्‍याप्‍त हो चुका है। इन देशों को आतंक के संबंध में सर्वथा एक कठोर नीति बनानी होगी ताकि ये खुद को आतंक के दंश से मुक्‍त कर सकें।
भारत में दक्षिणपंथी सरकार के तीन वर्षों के कार्यकाल में आतंक के प्रति शून्‍य सहनशीलता का परिणाम अत्‍यंत सकारात्‍मक रहा। जिस समय पूरा विश्‍व आतंकवाद से बुरी तरह ग्रस्‍त हो, उसी समयावधि में भारत देश के भीतर आतंकी घटनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध होना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस मामले में भारत निश्चित रूप में बाकी देशों के लिए अनुकरणीय बन चुका है। इसके अलावा विश्‍व में प्रभावशाली देशों की सरकारों में दक्षिणपंथी विचारकों के जनप्रतिनिधि के रूप में चुने जाने और अमेरिका में दक्षिणपंथी ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने के बाद दुनिया के सम्‍मुख धीरे-धीरे आतंक का धर्म व उद्देश्‍य दोनों स्‍पष्‍ट होने लगे। ब्रिटेन से लेकर हाल ही में जर्मनी तक के चुनावों में दक्षिणपंथी नेताओं का बढ़े हुए मत प्रतिशत सहित जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाना, आतंकवाद के प्रति ऐसे देशों की पूर्व की सरकारों के तटस्‍थ दृष्टिकोण के प्रति स्‍थानीय लोगों का आक्रोश ही है। लोग वामपंथ की आत्‍मघाती राजनीति से ऊबने लगे हैं। वामपंथियों ने राजनीति करने के लिए मुसलिमों की आतंकवादी घटनाओं, धर्म आधारित उनकी निकृष्‍ट गतिविधियों और शरणार्थियों के रूप में उनकी बढ़ती आबादी से देशों पर मंडरानेवाले खतरों की जिस तरह पूर्ण अनदेखी की है, स्‍थानीय निवासी उसके दुष्‍प्रभावों से उकता चुके थे। विभिन्‍न देशों में स्‍थानीय नागरिकों में बढ़ती ऐसी जागरूकता की प्रतिक्रिया में आतंकवाद अत्‍यधिक भड़क रहा है। इसी भड़ास व कुंठा में चाकूबाजी करने, वैन से लोगों को कुचलने, ट्रेनों में बम विस्‍फोटक रखने और अल्‍लाह हो अकबर चिल्‍लाकर लोगों पर खूनी हमले करने जैसी आतंकी घटनाएं नियिमत अंतराल पर हो रही हैं।
दुनिया के विकसित देशों से लेकर अविकसित देशों में 'अल्‍लाह हो अकबर' चिल्‍लाते हुए खूनी खेल के कई किस्‍से होने के बावजूद भी संयुक्‍त राष्‍ट्र के वैश्विक सरोकारों से जुड़े तथा मानवाधिकारों के संरक्षक संगठनों को अभी तक आतंकवाद का धर्म, परिभाषा और उद्देश्‍य समझ नहीं आया है, तो यह स्थिति अत्‍यंत असहज करती है। अब समय आ गया है कि आतंकवाद पीड़ित देशों को खुद को ऐसे संगठनों के संरक्षण से अलग कर लेना चाहिए तथा आतंकवाद से निपटने के लिए पृथक राष्‍ट्र के रूप में उनकी जो स्‍वायत्‍तताएं हैं, उन्‍हें उसी आधार पर अपने निर्णय लेने चाहिए। भारत जैसे देश ऐसा निर्णय ले भी रहे हैं। यह अच्‍छा संकेत है। लेकिन इस समय आतंकवाद की छोटी-बड़ी घटनाएं उन देशों में भी हो रही हैं, जिनके विशाल प्रतिनिधित्‍व से वैश्विक संस्‍था संयुक्‍त राष्‍ट्र खड़ी है। तो क्‍या अब भी संयुक्‍त राष्‍ट्र आतंक की परिभाषा, धर्म और उद्देश्‍य का वर्णन करने के लिए अपना मौन नहीं तोड़ेगा? या वह ऐसे ही अपने सदस्‍य देशों में आतंकी घटनाओं व गतिविधियों का नंगा नाच देखता रहेगा?

1 comment:

  1. विचारणीय और चिंतनीय विषय है ये आतंकवाद ।

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