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सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

स्तरहीन राजनीति से अप्रासंगिक होती कांग्रेस

दो प्रदेशों में विधानसभा चुनाव से पूर्व देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप अत्यंत निम्न स्तर तक पहुंच चुका है। कांग्रेसी नेताओं में हताशा, निराशा कुंठा होना स्वाभाविक है। पिछले तीन वर्षों के दौरान विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक में कांग्रेस को जनता ने नकारा ही नकारा है। दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारने के बाद भी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं में आत्ममंथन की चेतना नहीं उभर पा रही तो यह उनकी इसी मानसिकता का द्योतक समझा जाएगा कि वे इस देश पर शासन करने को अपना एकाधिकार मान चुके हैं।
   विकेश कुमार बडोला  

कांग्रेसी यदि वर्तमान केन्द्र सरकार के प्रधान नरेन्द्र मोदी का केवल विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं और हर छोटे-बड़े चुनाव से पूर्व भाजपा की केन्द्र राज्य सरकारों के काम-काज पर अनावश्यक टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, तो ऐसा विरोध ऐसी टीकाएं वे केवल विरोधी भाजपा के लिए ही नहीं कर रहे होते। जिस बहुसंख्यक जनता ने भाजपा को सत्तारूढ़ किया है, ऐसा विरोध उस जनता का भी होता है। कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं को इस राजनीतिक स्थिति पर गंभीरतापूर्वक मनन करना होगा। वैसे अब कांग्रेस कुछ भी कर ले, यह लेखक दावे के साथ कह रहा है कि वह भविष्य में कभी भी देश पर एकाधिकारवादी शासन नहीं कर पाएगी। एकाधिकारवाद ही क्यों वह तो जिन राज्यों में अभी सत्तारूढ़ है, भविष्य में वहां से भी बुरी तरह सत्ताच्युत होगी।
गुजरात में आजकल कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए स्थानीय छुटभैये नेताओं से राजनीतिक गठबंधन कर खुद को सुरक्षित मानने का दिवास्वप्न देख रही है। छुटभैये नेताओं की चुनावी सभाओं या किसी अन्य सभा में एकत्र भीड़ को देखकर कांग्रेस कांग्रेसी सर्व हितैषियों द्वारा जो राजनीतिक लाछंन दो दशक से राज्य में शासन कर रही भाजपा पर लगाए जा रहे हैं, वे भीड़ को मनोवैज्ञानिक रूप से भाजपा विरोधी बनाने के लिए अपर्याप्त हैं।
आंदोलनों या चुनावी सभाओं में जमा होनेवाली अधिसंख्य जनता स्थानीय चुनावों के राजनीतिक हितों से अपरिचित होती है। गुजरात में छुटभैये नेताओं की सभाओं में एकत्र भीड़ चुनावी तैयारियों को ध्यान में रखकर सभाओं में नहीं आई है। पूरे राज्य के पिछड़ी जाति के लोगों मुसलमानों को किसी तरह एक सभा में इकट्ठा करने के लिए छुटभैये नेताओं को कितना पसीना बहाना पड़ता है, यह नेताओं को ही पता है। कांग्रेस के साथ छुटभैये नेताओं के राजनीतिक दलों का गठबंधन अत्यंत गिरी हुई राजनीति का परिणाम है। चुनाव के बाद ऐसे गठबंधन ऐतिहासिक गणना में भी नहीं पाते। इनका बुरा हश्र होना तय है। ऐसा हम उत्तर प्रदेश के बीते चुनाव में भी देख चुके हैं।
कांग्रेस की निरंतर खराब हो रही राजनीतिक स्थिति के बारे में चर्चा कर कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस के पक्ष में हर चुनाव में नकली हवा भरने का काम करते हैं। इसका परिणाम हर चुनाव के बाद एक जैसा ही होता है। मीडिया चैनलों के चुनावी सर्वेक्षणों में भाजपा द्वारा दोनों राज्य में अधिकांश सीटों पर जीत प्राप्त करने का समाचार आने के बाद कांग्रेस और इसके सहयोगियों का उत्साह कुछ हद तक कम हुआ है। चुनावी सर्वेक्षणों को भी किसी किसी विधि से कांग्रेस के समर्थन में परोसा जाता है, जबकि वास्तविक परिणाम चुनावी सर्वेक्षणों के उलट भाजपा के पक्ष में ही आते हैं।
जब से कांग्रेस अनेक राज्यों में सत्ताहीन हुई है, तब से इसके समर्थक मीडिया विश्लेषकों की नजर में चुनाव आयोग भी संदेहास्पद बन चुका है। जब तक कांग्रेस चुनावों में जीतती रही, तब तक चुनाव आयोग, उसके समस्त कार्यक्रम, उसकी अधिसूचनाएं और आचार संहिता सहित उसके अनेक चुनाव संबंधी निर्णय ठीक रहे। इन पर तब कभी उंगली नहीं उठी। लेकिन जब से भाजपा केंद्र सहित अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ हुई तब से चुनाव आयोग भाजपा विरोधियों को सत्ता के प्रभाव में काम करता हुआ नजर आने लगा है। गुजरात में चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पूर्व कतिपय कांग्रेसियों, इसके समर्थकों और लेखकों ने आयोग को भाजपा के प्रभाव में काम करने वाला संस्थान घोषित कर दिया। वे अधिसूचना जारी होने से पूर्व तक भाजपा पर यही आरोप लगाते रहे कि अपने प्रमुख प्रभावशाली नेताओं की चुनावी सभाओं, रैलियों जनसभाओं के दृष्टिगत जानबूझकर केंद्र सरकार के दबाव में चुनाव आयोग गुजरात हिमाचल में विधानसभा चुनावों की तिथियां घोषित नहीं कर रहा। ऐसे अनर्गल आरोपण करनेवाली कांग्रेस इसके समर्थकों को देखते हुए तो यही लगता है कि खुद के सत्तारूढ़ होने के दौरान संभवतः इन लोगों के हिसाब से ही चुनाव आयोग परिचालित होता हुआ आया है।
आज कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में दिन-प्रतिदिन अप्रासंगिक होती जा रही है। मीडिया संस्थान हों या सोशल मीडिया अथवा देश के प्रधानमंत्री भाजपा के नेतागण, यदि ये सभी अपने-अपने स्तर पर कांग्रेस के बारे में नकारात्मक और निराश वक्तव्य दे रहे हैं, तो अपनी मर्जी से नहीं दे रहे। कांग्रेस की देश विरोधी राजनीति के प्रति उनहत्तर वर्षों के दौरान बहुलांश हिन्दुस्तानी जनता के भीतर जो विरोध की अग्नि जल रही थी, यह सब उसी की राजनीतिक स्वीकार्य प्रतिक्रिया का हिस्सा है। कांग्रेस प्रदत्त अंतहीन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी जनता को उसका विरोध करने के लिए किसी मोदी, भाजपा, मीडिया या सोशल मीडिया का कंधा नहीं चाहिए था। ये सब जैविक और अजैविक कारक तो सहसा उसके लिए कांग्रेस के तटस्थ विरोध में उतरने हेतु एक पुल का कार्य कर गए।
कांग्रेस को यदि अपनी राजनीतिक साख बचानी है तो उसे एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने के लिए तैयार रहना होगा। वह कम से कम ऐसे मुद्दों को तो राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के लिए बिलकुल उछाले, जो उसे हंसी का पात्र बनाएं और जनता को उसके प्रति स्थायी रूप में वैर भाव बनाए रखने के लिए दुष्प्रेरित करे। वर्ममान में कांग्रेस का राजनीतिक चरित्र देखकर तो यही प्रतीत होता है कि वह शीघ्र ही अपनी स्तरहीन राजनीतिक गतिविधियों से उन लोगों का विश्वास भी खो देगी, जो अब तक भावनात्मक रूप में उससे जुड़े हुए हैं। क्योंकि रचनात्मक और विकासपरक राजनीति के अभाव में उसके बचे-खुचे समर्थक भी उसे कब तक यूं निरर्थक ढोते रहेंगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. दरअसल अब सब मिडिया घरों को भी पता है कांग्रेस किस बात से खुश होती है ... इसलिए सभी चाटुकारिता करते हैं ... अपना उल्लू सीधा करते हैं ... और ज्यादातर कांग्रेस के लोग भी ऐसा करते हैं ... स्तर की अपेक्षा तो हो ही नहीं सकती इससे ...

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  2. अब तो कांग्रेस का मतलब ही विद्रुप हँसी है ।

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