महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, October 13, 2017

दुखदायी विमान दुर्घटनाएं

वायु सेना दिवस से पहले वायु सेना के ही एमआइ-17 हेलिकॉप्‍टर का दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाना अत्‍यंत दुखदायी है। यह हेलिकॉप्‍टर अरुणाचल प्रदेश के तवांग के निकट किसी अज्ञात तकनीकी बाधा के कारण उड़ने में विफल हुआ और धरती पर गिरकर इसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। इस दुर्घटना में हेलिकॉप्‍टर में बैठे सभी सात सैन्‍यकर्मियों की मृत्‍यु हो गई, जिनमें वायु सेना के दो पायलट और दो सैनिक भी शामिल हैं। यह हेलिकॉप्‍टर चीन सीमा पर सेना की किसी अग्रिम चौकी पर तैनात सैनिकों के लिए आवश्‍यक सामग्री लेकर उड़ा ही था कि कुछ देर में अनियंत्रित होकर नीचे आ गिरा। एमआइ-17 रूस में निर्मित सैन्‍य परिवहन हेलिकॉप्‍टर है। हालांकि दुर्घटना के कारणों की जांच हेतु कोर्ट ऑफ इन्‍क्‍वायरी का आदेश दे दिया गया है, पर शांतिकाल में हुई इस प्रकार की मानवीय क्षति अत्‍यंत चिंताजनक है। यह बात वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने भी स्‍वीकार की है। साथ ही दुर्घटना से व्‍याप्‍त दुख और असहजता को कम करने के लिए उन्‍होंने ऐसी दुर्घटनाओं को न्‍यूनतम करने और वायु सेना से संबंधित संपत्तियों के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास किए जाने का संकल्‍प भी दोहराया।
विकेश कुमार बडोला 
जिस उत्‍साह से धनोआ ने वायु सेना दिवस से पूर्व एक प्रेस सभा को संबोधित कर वायु सेना के सशक्‍त और दृढ़ अस्तित्‍व पर गर्व करते हुए उसे युद्ध की परिस्थिति के लिए समुचित बताया तथा चीन व पाक से एक साथ युद्ध होने की स्थिति में वायु सेना को पूर्णत: समर्थ बताया था, वह उत्‍साह वायु सेना हेलिकॉप्‍टर के दुर्घटनाग्रस्‍त होने के बाद अवश्‍य ही कम हुआ होगा। अब इसे वायु सेना के अभियांत्रिकी विभाग की लापरवाही मानें या हेलिकॉप्‍टर परिचालन प्रभारी तंत्र की निष्क्रियता, जो विश्‍व की चौथी श्रेष्‍ठ वायु सेना होने के बाद भी इसके वायुयान तकनीकी कमियों के कारण दुर्घटनाग्रस्‍त हो रहे हैं। सैन्‍य‍कर्मियों, वायुयान, वायु यान संबंधी संसाधनों तथा अन्‍य वायु सेना आवश्‍यकताओं के स्‍तर पर यदि हमारी वायु सेना दुनिया की चौथी श्रेष्‍ठ सेना है भी, पर वायु यान से संबंधित परिचालन, क्रियान्‍वयन तथा अन्‍य तकनीकी दायित्‍वों के प्रति हमारे वायुसैनिकों की लगन व निष्‍ठा का स्‍तर क्‍या है, यह भी अत्‍यंत विचारणीय बिन्‍दु है। कहीं न कहीं अपने कर्तव्‍यों के प्रति यह हमारे वायुसैनिकों की निष्‍ठा की कमी ही थी, जो दुर्घटनाग्रस्‍त हेलिकॉप्‍टर की तकनीकी चूक को उड़ान से पहले पकड़ा नहीं जा सका। वायु सेना का सेवा क्षेत्र कोई सामान्‍य सेवा क्षेत्र नहीं कि यहां वायुयानों या इनसे सम्‍बद्ध उपकरणों के परिचालन, अनुरक्षण तथा नियमित निरीक्षण में की जानेवाली लापरवाही से होनेवाली हानि तत्‍काल बड़ी प्रतीत नहीं होगी। हेलिकॉप्‍टर हों या अन्‍य वायुयान, वे सतह से हवा में उड़ान भरने, हवा में उड़ने तथा हवा से सतह पर आने के दौरान तकनीकी रूप में पूरी तरह ठीक होने चाहिए। उनके कलपुर्जों में हुई या होनेवाली छोटी से भी कमी उन्‍हें बड़ी से बड़ी दुर्घटना में परिवर्तित कर सकती है।  
हालांकि स्‍वचालित तकनीक से चलने वाली मशीनों पर पूरा भरोसा भी नहीं‍ किया जा सकता। तकनीकी विफलताएं कितनी ही सावधानियां अपनाने के बाद भी उभर ही आती हैं। दुर्घटनाएं बहुधा बिना किसी तकनीकी गड़बड़ी या मशीनों के योग्‍य परिचालकों द्वारा परिचालन के दौरान निभाई गई उनकी पूर्ण निष्‍ठा, कार्य-योग्‍यता तथा तकनीकी विशेषज्ञता के बाद भी हो जाती हैं। फि‍र वायु सेना हेलिकॉप्‍टर के दुर्घटनाग्रस्‍त होने की यह पहली व एकमात्र घटना भी नहीं।
पिछले वर्ष 22 जुलाई को भी वायु सेना का मालवाहक एएन-32 विमान बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गायब हो गया था। वह विमान चेन्‍न्‍ई के निकट से 29 लोगों को लेकर पोर्ट ब्‍लेयर के लिए चला था और उड़ान भरने के 13 मिनट बाद ही बंगाल की खाड़ी के ऊपर बाईं ओर झुककर लापता हो गया। विमान को ढूंढने के लिए महीनों तक उस समुद्री क्षेत्र को खंगाला गया था, जहां से वह अदृश्‍य हुआ था। वायु-थल-नौ सेना सहित तटरक्षक बलों और विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से चले उस खोजी अभियान को अंतत: बिना किसी सफलता के बंद करना पड़ा। 
निस्‍संदेह यह भी एक दुर्घटना थी, परंतु यह तो ज्ञात होना ही चाहिए था कि आखिर विमान और उस में सवार 29 लोग गए तो गए कहां। उस दुखद घटना ने विज्ञान जनित प्रयोगों, आधुनिक दुनिया व इसके कट्टर समर्थकों हेतु यह विषादजनित कौतूहल तो उत्‍पन्‍न कर ही दिया कि संचार क्रांति, आधुनिकतम प्रौद्योगिकी और सामरिक क्षेत्र में अग्रणी होने की अभिपुष्टि करनेवाला भारत एक अदृश्‍य विमान को ढूंढने में पूरी तरह असफल क्‍यों रहा। भारत हो या कोई भी अन्‍य राष्‍ट्र, जो अपनी वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों पर गर्व करता है, उसे लापता विमान और उसमें सवार लोगों का अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों के बाद भी कोई सूत्र नहीं मिलना यही दर्शाता है कि विज्ञानजनित उपलब्धियां ही अपने आप में पूर्ण नहीं हैं। विज्ञान को सचेत और समुचित संचालन के लिए अध्‍यात्‍म की भी आवश्‍यकता है। अन्‍यथा एकल रूप में विज्ञान अभिशाप के सिवाय कुछ भी प्रतीत नहीं होगा।  
हालांकि तवांग के निकट हुई हेलिकॉप्‍टर दुर्घटना में सात सैनिकों के क्षत-विक्षत शव मिल तो गए, पर यह हमारे लिए संतुष्टि का आधार नहीं हो सकता। इस संपूर्ण प्रकरण में महत्‍तवपूर्ण तथा विचारणीय प्रश्‍न यही है कि  ऐसी दुर्घटनाओं के लिए विडंबना और भाग्‍य को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। और न ही विज्ञान की विसंगतियों पर ही दोषारोपण कर हम अपने कार्यों व दायित्‍वों के समुचित निर्वहन की भावना से मुंह मोड़ सकते हैं। यह और इस जैसी अन्‍य दुर्घटनाएं कहीं न कहीं हमारे सैन्‍य बलों के तकनीकी परिचालन तंत्र की कार्यकुशलता पर संदेह तो उत्‍पन्‍न करती ही हैं और फि‍र हमें गहरे कचोटती हैं कि आखिर हम बिना युद्ध के ही विमान हादसों में अपने जवानों को क्‍यों खो रहे हैं।
      देश-विदेशी उच्‍च क्षमताधारी अनुसंधान उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की सामर्थ्‍य-शक्ति रखनेवाला यह राष्‍ट्र अंततोगत्‍वा विगत वर्ष के लापता विमान में सवार अपने सैनिकों, लोगों को ढूंढने तथा इस वर्ष वायु सेना दिवस से ठीक पहले हेलिकॉप्‍टर दुर्घटना में मारे गए अपने सैनिकों को बचाने में असहाय ही दिखा है। विमान के साथ लापता लोगों व सैनिकों के परिजन हों या विमान दुर्घटना में मारे गए सैनिकों के निकट संबंधी, उनकी दृष्टि में राष्‍ट्र का तकनीकी विकास सार्थक कैसे हो सकता है।  

1 comment:

  1. ऐसी क्षति अत्यंत चिंतनीय है ।

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards