Monday, September 11, 2017

निजता का अधिकार -- विरोधाभासों से भरा निर्णय

--विकेश कुमार बडोला
चौबीस अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। उनके अनुसार निजता संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार का अंग है और इसका हनन करनेवाले कानून गलत हैं। इस निर्णय के बाद अब व्यक्ति की निजता भी मौलिक अधिकारों में से एक होगी। अब संविधान प्रदत्त छह अन्य अधिकारों के साथ यह भी सातवें के रूप में जुड़ गया है। लेकिन विचार किया जाए तो इस नए निर्णय में एक विरोधाभास प्रकट होता है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट के ही दो पूर्व निर्णयों में आठ न्यायाधीशों छह न्यायाधीशों की पीठ कह चुकी है कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। इस संबंध में यह सोचे बिना भी रहना संभव नहीं कि पूर्व की सर्वोच्च न्यायालयी पीठों ने निजता के संबंध में अपने तत्कालीन निर्णय किन्हीं राजनीतिक शक्तियों के दबाव या समर्थन में तो नहीं लिए थे। तब की एकमात्र राजनीतिक शक्ति कांग्रेस ही थी। और आज देश के बदले राजनीतिक नेतृत्व के कारण इसी सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने निजता के संबंध में संवैधानिक परिभाषाओं का फिर से राजनीतिकरण कर दिया हो। इस संबंध में अचर यह है कि आधार पहचान की अवधारणा जिस कांग्रेसी राज में अस्तित्व में आई वही कांग्रेस और इसके नेता आधार-योजना को व्यक्ति की निजता के विरुद्ध बतानेवाले जनहित याचिकाकर्ताओं के समर्थन में राजनीतिक प्रतिनधि बने हुए हैं वर्तमान सरकार यदि आधार कार्ड को व्यक्ति की निजी, सार्वजनिक, वित्तीय, सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय पहचान के रूप में डिजिटली एकीकृत करने का कार्य कर रही थी, तो इसमें व्यक्ति की निजता का उल्लंघन भला किस आधार पर हो रहा है। और यहां किस निजता की बात हो रही है। संविधान के मौलिक नागरिक अधिकार ही पिछले 70 वर्षों से लेकर अभी तक एक-एक व्यक्ति के लिए सुनिश्चित नहीं हो सके हैं, तो भला निजता का अधिकार कैसे होगा। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए ही भूखे-नंगे घूम रहे अधिकांश भारतीय नागरिकों के लिए प्रथम कार्य संविधान के छह मौलिक अधिकारों की अनुपालना सुनिश्चित किए जाने का होना चाहिए। निजता तो ऐसे नागरिकों के लिए विलासिता आधारित अधिकार ही हो सकता है।
हालांकि अभी न्यायालय के निर्णय में यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि उसका इस निर्णय का आधार पहचान योजना से कोई संबंध है या नहीं। न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने सिर्फ यह कहा कि निजता मौलिक अधिकार है। उन्होंने यह नहीं कहा कि आधार इसमें उल्लंघन का माध्यम बन रहा है अथवा नहीं। आधार कार्ड की वैधानिकता को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर पांच न्यायाधीशों की पीठ अलग से सुनवाई करेगी।
यदि हम किसी व्यक्ति के निजी जीवन की व्याख्या करते हैं तो वह इस तथ्य पर आधारित होगी कि वह अपने घर के भीतर जो भी पारिवारिक, लैंगिक या व्यक्तिगत कर्म करता है वह निजी है। इसके अतिरिक्त किसी व्यक्ति के शरीर सहित उसकी सामाजिक, व्यक्तिगत जीवन की किन-किन गतिविधियों को निजी माना जाए, यह सामान्य जीवनचर्या के अनुसार तो तय हो नहीं सकता। हां, व्यक्ति के साथ हुई असामान्य घटना के बाद इसका निर्धारण किया सकता है। तो क्या ऐसी परिकल्पना हमारे न्यायाधीशों ने पहले ही कर ली है कि भविष्य में सवा सौ करोड़ नागरिकों का जीवन किन-किन असामान्य घटनाओं में व्यतीत होगा, जो उन्होंने उनकी निजता को मौलिक अधिकार में ला खड़ा किया।
संविधान के निर्धारित अनुच्छेद में वर्णित जिस व्याख्या का उल्लेख सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश निजता के मौलिक अधिकार की संरक्षा हेतु कर रहे हैं, वास्तव में उसका सरकार के डिजिटल इंडिया के उद्देश्य से कोई सरोकार नहीं है। सरकार द्वारा प्रत्येक नागरिक के बायोमीट्रिक आंकड़ों अथवा सूचनाओं या शरीर-चिह्न (आंखों की पुतलियां, अंगुलियों और हाथ के निशान) एकत्र करना तार्किक रूप से कहीं भी उसके निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
वैश्विक ग्राम में बदलने के बाद सूचना क्रांति के स्वर्ण काल में चल रही दुनिया में लोग यदि बायोमीट्रिक आंकड़ों को निजता मानते हैं तो यह बड़ी हास्यास्पद बात लगती है। भला घर से बाहर निकलने पर इस दौर में हमारा निजी रह क्या जाता है। मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल उपकरणों, टेलीविजन प्रसारण और सबसे बढ़कर सामान्य संचार के लिए भी इंटरनेट पर निर्भर होने के बाद हमसे संबंधित कौन सा आंकड़ा किस प्रकार निजी रह सकता है। आधुनिक युग में मनुष्य के पैदा होने से लेकर उसके मरने तक का सारा आंकड़ा किसी किसी माध्यम से निजी सरकारी सम्पत्ति होता रहता है और सूचना प्रौद्योगिकी के चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुकी दुनिया में तो व्यक्ति से संबंधित ऐसे आंकड़ों का दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक सुगमतापूर्वक आदान-प्रदान हो सकता है। ऐेसे में व्यक्ति की कौन सी निजता की बात सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से तथाकथित याचिकाकर्ता कहना चाहते हैं, समझ से परे है। यह संदेह आधारहीन नहीं कि तथाकथित याचिकाकर्ताओं को विपक्षी राजनीतिक दलों, विशेषकर हिन्दू विरोधी दलों ने न्यायालय में ऐसी याचिका लगवाने के लिए उकसाया हो। उन्हें भय था कि वर्तमान सरकार बांग्लादेश, म्यांमार आदि देशों से भारत में घुसपैठ कर आनेवाली करोड़ों की मुसलिम आबादी की पहचान आधार बायोमीट्रिक के आधार पर आसानी से कर लेगी और उन्हें देश से निकाल बाहर करेगी। यह एक कटु सत्य है कि कांग्रेस सहित क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने ऐसी अवैध आबादी को अपने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने से कभी संकोच नहीं हुआ। यह भी कड़वा सच है कि कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दल पूर्व में ऐसी आबादी के वोटों से सत्तासीन होते रहे हैं। राष्ट्रद्रोह के इस कर्म के लिए ऐसे दलों को कभी क्षमा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यदि कोई सरकार ऐसी अवैध आबादी की सुगम पहचान के लिए आधार पहचान का प्रयोग केंद्रक अस्त्र के रूप में करती है तो न्यायालय उसे प्रोत्साहित करना चाहिए  कि आधार को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई कर हतोत्साहित।
वर्तमान सरकार तो आधार के आंकड़ों को लोगों के हित के लिए ही एकीकृत और संग्रहीत कर रही है। इस उपक्रम में सरकार के प्रयासों को जनहित के नाम पर चुनौती देना अपने आप में देशद्रोह जैसा कदम है। हो हो यह काम सरकार विरोधी लोगों का ही है। लगता तो यह भी है कि सर्वोच्च न्यायालय में एक व्यर्थ जनहित याचिका पर सुनवाई के कारण राष्ट्र के समय की बर्बादी देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के केंद्र सरकार के प्रयासों की अवहेलना हो रही है।
आधार को व्यक्तिगत पहचान का मूल पत्र बनाने की योजना चाहे जिस के मस्तिष्क की भी उपज रही हो, लेकिन सरकारें यदि इस पहचान पत्र को व्यक्ति के वित्तीय, रोजगार, सामाजिक, आर्थिक और हर क्षेत्र से जोड़ती हैं तो इससे देश में प्रत्येक व्यक्ति की नागरिक परिस्थिति ज्ञात हो जाती है। वैध-अवैध नागरिकों की पहचान सुगम होती है। रोजगार करनेवालों और बेरोजगारों का आंकड़ा ज्ञात होता है। समाज के हर वर्ग के लोगों के लिए आधार लिंक योजना अत्यंत कल्याणकारी हो सकती है। साथ ही इससे देश के सामने चुनौती के रूप में खड़ी समस्याएं जैसे आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अवैध मुद्रा लेन-देन, बेनामी सम्पत्तियों से अवैध अर्थचक्र का परिचालन आदि की पहचान निगरानी भी सुनिश्चित होती है। यदि इन समस्याओं से मुक्ति के लिए आधार पहचान निजता का उल्लंघन करता भी प्रतीत होता है, तो यह अप्रत्यक्ष कष्ट लोगों को कुछ दिनों के लिए सहना चाहिए। लेकिन ऐसा है नहीं। आधार लिंक योजना से निजता प्रकट होने से वे डर रहे हैं, जो देश में अवैध धंधों में लिप्त हैं। एक सज्जन को आधार लिंक योजना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि यह उसके लिए कई अर्थों में लाभदायी ही है। 
           इस पूरे प्रकरण में यह भी तो संभव है कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों की व्याख्या समय-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन की मांग करती हो। संविधान की रचना के दौरान देश-दुनिया का संचालन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक रूप से भिन्न तरीके से हो रहा था। और आज जब नित नए वैज्ञानिक आविष्कारों और आविष्कारजनित उपकरणों के कारण मानव का जीवन ही मशीन सरीख बन चुका है, तब मौलिक अधिकारों के नाम पर निजता ढूंढना और उसके लिए भी सरकार की जनहितैषी आधार लिंक योजना को दोषी ठहराना, व्यावहारिक दृष्टिकोण से यह बिलकुल उचित नहीं है।
            उम्मीद की जानी चाहिए कि आधार की वैधानिकता के संबंध में होनेवाली न्यायिक समीक्षा के समय इन व्यावहारिक बातों पर न्यायाधीशों द्वारा अवश्य ही विचार किया जाएगा। वर्तमान केंद्र सरकार को कितने ही षड्यंत्रों के तहत उसके जनहितैषी कार्यों के लिए कितना ही घेरने की कोशिश भले ही कोई किसी के इशारों पर करता रहे, लेकिन अंततः देश के लोगों के सामने सच्चाई तो आएगी ही आएगी। लोग इस बात को भलीभांति समझ रहे हैं कि वर्तमान सरकार वाकई देश के लोगों के समग्र, सतत विकास के लिए संकल्पबद्ध है। देश के सम्मुख उभरी अनेक प्राकृतिक आपदाओं तथा अन्य समस्याओं की तुलना में निजता के मौलिक अधिकार की समस्या नगण्य है। यह व्यावहारिक तो नहीं हां एक कल्पनातीत समस्या अवश्य हो सकती है। इस हेतु न्यायालय से लेकर मीडिया जगत में होनेवाली हलचल पर गहन क्षोभ होता है।

4 comments:

  1. जिस देश में ८० प्रतिशत आबादी दो जून की रोटी के लिए रोज़ संघर्ष करती है वहां निजता जैसे हाई फाई क़ानून को इतनी ज्यादा महत्ता प्रदान की जाये ... एक हास्यपद बात ही है ... कुछ लोग जो इसकी पैरवी कर रहे हैं और जो इसे कानूनी जमा पहनना चाहते हैं कितने कटे हुए हैं आज देश की वास्तविकता से ...ये क़ानून यही दर्शाता है ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-09-2017) को गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर :चर्चामंच 2725 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. क्या निजता, कैसी निजता ? कोई बंद कमरे में क्या कर रहा है ? कोई किसी के बारे में क्या सौच रहा है ? निजता तो वह है, जिससे आप जो सौच रहें है,उसके बारे में पता लगा कर सार्वजनिक करना । आपका लेख अच्छी व्याख्या करता है, लेकिन मानननिय न्यायालय को कौन समझायें ।

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  4. समसामयिक, विचारणीय और सारगर्भित पोस्ट..

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