Sunday, August 13, 2017

जीवन में दुख

हुत दिन हुए कुछ भी संवेदित होकर नहीं लिखा उसने। शासन की राजनीति और उससे दुष्प्रभावित सामाजिक-पारिवारिक जीवन के जाल में गहरे फंसा हुआ है वह। इस लिए उससे संवेदनापूर्ण संस्मरण नहीं लिखे जा रहे। जीवन सम्बन्धी कितने ही सुन्दर, सुभाषित तथा आह्लादित कर सकनेवाले अनुभव उसके हृदय में संजीवित हैं, परन्तु उनकी रचना अत्यन्त इच्छा होते हुए भी नहीं हो पा रही।
          व्यतीत समय और उसमें बना-बिगड़ा जीवन आज के व्यक्ति के लिए जल्दी-जल्दी भूला-बिसरा होता जा रहा है। वह भी इस भुलावे से पीड़ित है। भ्रम की विचित्र मनःस्थितियों में फंसा हुआ है। हालांकि चाहता बहुत है कि अपने सुन्दर-स्वप्निल जीवन को भ्रमपूर्ण परिस्थितियों के स्पर्श से बचाए रखे और जीवन के प्राकृतिक माधुर्य को सदैव आत्मसात करे। लेकिन उसका भौतिक जीवन सिर्फ उसका ही कहां है। परिवेश और परिस्थितियों के अवगुण उसके जीवन पर भी पड़ रहे हैं। इस कारण वह मधुर, सरस, सुमनीय और रंगीले जीवन को आत्मिक रूप में सुसज्जित करके भी उसे व्यावहारिक रूप में जी नहीं पा रहा। इस व्यवधान से उसे बहुत पीड़ा होती है। वह अत्यन्त असन्तुलित है। 
दुनिया में अधिकांश लोगों की सोच अजीब है। आजकल वे किसी को दुखी होकर भी दुखी नहीं देखना चाहते। वे चाहते हैं कि नितान्त दुखी आदमी भी बलात आशा सकारात्मकता ओढ़े रहे। चाहे आशा सकारात्मकता के मूल्यांकन की योग्यता ही देश समाज के पास हो, पर तब भी इन्हें अपना दुख ढकने के लिए ओढे़ रहो। चाहे आशा सकारात्मकता जैसे शब्द, भाव या विचार कितने ही खोखले क्यों हो गए हैं या ऐसे शाब्दिक भाव-विचारों ने देश-समाज में आर्थिक शोषण करने के लिए कितनी ही कृत्रिमता क्यों अपना ली हो, तब भी इन्हें पकड़े रहो।
उसने सोचा वह इस तरह मूर्ख नहीं बन सकता। यदि उसे दुख है तो वह अपना दुख प्रकट करेगा। उसे लिखेगा। और उसका दुख केवल सामान्य दुख नहीं बल्कि एक विकट त्रासदी है, जिसे वही समझ सकता है जो उसके जैसा जीवन जीने को विवश हो। उसने कई लोगों को अपना दुखड़ा सुनाया। उसने सोचा, वे उसकी भौतिक-आर्थिक सहायता भी करें पर उसे भावनात्मक संबल तो अवश्य देंगे। उसे सांत्वना और पीठ पर अपनत्व की थपकियां तो जरूर देंगे।
लेकिन यह नहीं हुआ। उसका दुख सुनने के बाद कुछ तो मौन हो गए। कुछ उसे भूल गए। कुछ क्रूरतापूर्वक तटस्थ हो गए और कुछ तो इन स्थितियों से भी अधिक घातक हो गए। भौतिक या भाविक सहायता करने के बदले वे उसे डांटने-डपटने लगे कि वह अपना दुखड़ा सुना ही क्यों रहा है।
एक दिन उसके एक दोस्त ने उससे कहा, "तू अपने दुख का इतना रोना क्यों रोता है! तू क्या समझता है, एक तू ही है जिसे दुनिया में दुख-तकलीफें हैं! और फिर दुखों पर रोने से और उनका वर्णन करने से होगा क्या! कोई नहीं है जो तेरी मदद करेगा। प्रेक्टिकल बनो भाई। ऐसे काम नहीं चलेगा।"
दोस्त के इस वक्तव्य पर वह अपना मौन मुखर किसी प्रकार का संवाद कर सका। वास्तव में ऐसे लोग दुख दुखी व्यक्ति के सम्बन्ध में जो धारणा रखते हैं, वह यह कि यदि कोई दुखी है तो दुखी दिख क्यों नहीं रहा। इतना साफ-सुथरा क्यों हैं। भीख क्यों नहीं मांगता। वैचारिक रूप से सन्तुलित क्यों है। आदर्श बातें क्यों कहता है। दुखी है तो इसे पागल हो जाना चाहिए था। तब हम पागलखाने में भर्ती कराने में इसकी सहायता करते या इसे पागल समझ कर भोजन कराते।
          ऐसे लोगों ने अपने जीवन में जीवन के लिए आधारभूत आवश्यकताओं का अभाव कभी नहीं देखा होता। इन्हें सब कुछ सहजता सरलता से उपलब्ध होता है। इसलिए इन्हें दुखी, निर्धन के रूप में दुख, निर्धनता के नंग प्रतीक ही चाहिए। इनकी दृष्टि में दुख, पीड़ा, अभाव निर्धनता तभी है जब ये दुखी, पीड़ित, अभावित निर्धन को बीच राह में नंग-भिखमंग देखेंगे। इन्हें व्यक्ति के मान-सम्मान-स्वाभिमान तथा उसके मनोवैज्ञानिक दुख से कोई सरोकार नहीं होता।
          उसका यह अनुभव दिन-प्रतिदिन अत्यन्त प्रगाढ़ होता जा रहा है, क्योंकि जिसे भी वह देखता है वह दोगुणा गति से असंवेदनशील और परदुख के प्रति कुटिल तटस्थता से ग्रसित है। वह जाए तो जाए कहां। अच्छाइयों का कृत्रिम व्यवहार और संवेदनाओं का संहार क्षण-क्षणांश समाज में बढ़ता ही जा रहा है। उसका मनोविज्ञान सिद्ध कर चुका है कि देश-दुनिया और इसके नगर-ग्राम संवेदनशील व्यक्ति के लिए अत्यन्त अयोग्य हो चुके हैं।
इसलिए उस जैसा संवेदनशील व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों की उपासना कर रहा है। उन्हें अपने जीवन का संग बना रहा है। आधुनिक समाज और इसके लोगों से इतना त्रस्त होने पर भी वह आत्मघाती नहीं हुआ। उसने आत्महत्या नहीं की। वह अपनी भौतिक निर्धनता के होते हुए भी, सामाजिक उपेक्षाओं को झेलते हुए भी प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक धनी होने की ओर अग्रसर है।
विकेश कुमार बडोला

1 comment:

  1. एकदम सटीक.....
    दुखी होते हुए भी किसी को दुखी नहीं देखना चाहते.....
    हमेशा खुश और सकारात्मक रहें चाहे अन्तर्मन में कितना भी दुख क्यों न हो....
    संवेदना खत्म सी हो गयी है...फिर सहानुभूति की उम्मीद किससे करें...
    बहुत ही सुन्दर ...

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