Saturday, July 29, 2017

जीवन जैसे जीवन की ढूंढ

से लगता
जैसे रचनात्मक जीवन
समाप्त हुआ
जगव्यापी सभ्य समाज की
असहनीय असभ्यता से
मैं रक्तिम
विद्रोही हुआ
कुछ रचने को
मन नहीं
बस जीवन-निर्वाह में
रत-विरत
क्षत-विक्षत
स्वयं की
प्राकृतिक पहचान
क्षीण हुई
जो हूं जैसा हूं
उसमें दुनिया के
अनेकानेक अंतर्विरोध
परस्पर टकरा रहे हैं
मुझे अत्यंत
विचलित बना रहे हैं
जीवन की आशा
सकारात्मकता के लिए
वास्तव में
इस कृत्रिम जीवन में
कुछ नहीं बचा
तब भी ढूंढ रहा
भीतर बाहर
किसी को
जीवन जैसे
जीवन के लिए
उसमें संवेदन मग्न हो
आनंद गमन के लिए

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर.....
    जगव्यापी सभ्य समाज की
    असहनीय असभ्यता से
    मैं रक्तिम
    विद्रोही हुआ
    वाह!!!!

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  3. आज के इंसान के मानसिक संघर्ष का प्रभावी चित्रण...बहुत सुन्दर

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  4. विचलन के बीच भी थिर रहना है
    विचलन को ही फिर - फिर कहना है ।

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