Sunday, July 16, 2017

जागरूक और विवेकवान बनें बिहारवासी

पिछले कुछ दिनों से बिहार राज्य के उप मुख्यमंत्री के परिवार पर अवैध धन और घोटालों के कई आरोपों के चलते कानूनी कार्रवाईयां चल रही हैं। आय कर, प्रवर्तन निदेशालय और केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की समेकित छापेमारी में यादव परिवार के विरुद्ध अनेक प्रमाण मिले हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि यह परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तासीन होने के लिए क्या-क्या कर सकता है या कितना नीचे गिर सकता है।
केन्द्रीय जांच एजेंसियों की यादव परिवार के खिलाफ की जा रही कार्रवाईयों की आंच राज्य के गठबंधन सरकार के मुखिया पर पड़नी भी स्वाभाविक है, क्योंकि वे राजद के सहयोग से ही जदयू की ओर से मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। नीतीश कुमार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बड़ी हैं। वे राज्य की गठबंधन सरकार में शामिल राजद के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने सिद्ध होने के बाद किसी भी कीमत पर खुद को इस जंजाल से मुक्त करना चाहेंगे। लेकिन पार्टी में इस मामले में केवल उनकी ही नहीं सुनी जाएगी। जदयू के शरद यादव सहित अनेक प्रमुख नेताओं ने जिस तरह यादव परिवार के खिलाफ केन्द्रीय जांच एजेंसियों की कानूनी जांच को राजनीति से प्रेरित बताया और यादव परिवार के पक्ष में खड़े रहने के संकेत दिए हैं, उस परिस्थिति में मुख्यमंत्री नीतीश राजनीतिक विवशता में घिर गए हैं।
नीतीश कुमार की दो इच्छाएं हैं। एक, राज्य की गठबंधन सरकार को खींचे रख मुख्यमंत्री बने रहना। भले ही गठबंधन सरकार के राजद धड़े के नेताओं पर कितने ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहें। दोभाजपा की ओर से राजग में शामिल होने के न्योते की प्रतीक्षा करना।
          जिस प्रकार भाजपा को देशभर में जनता का समर्थन मिल रहा है, उस स्थिति में उसे उन विपक्षी नेताओं को राजग में कतई शामिल नहीं करना चाहिए, जो एक समय भाजपा के उन मूल्यों की ही तीखे आलोचक थे, जिनके अनुयायी बहुसंख्यकों ने भाजपा को सिर-आंखों पर बिठाया है। नीतीश कोई इतनी बड़ी राजनीतिक हस्ती नहीं कि भाजपा उनको राजग में शामिल करने की कीमत पर अपना बहुसंख्यक आधार दरकाए। ऐसे नेताओं के लिए खुद भाजपा के पहली पंक्ति के नेताओं और भाजपा के समर्थकों में कोई लगाव बिलकुल नहीं होना चाहिए। अन्यथा किसी राजनीतिक दल के मूल्यों का महत्व ही नहीं रह जाएगा। और भाजपा की ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं कि उसे नीतीश का राजग में स्वागत करना ही करना है।
जिस राजनीतिक सफलता को भाजपा केन्द्र और अनेक राज्यों में पारदर्शी विकास के रूप में परिवर्तित कर रही है, उस स्थिति में उसे किसी भी समुदाय के मतों के लिए राजनीतिक चेहरों की नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है। इसलिए नीतीश जैसों के लिए अपने बने-बनाए राजनीतिक स्तर को गिराना भाजपा को तत्काल तो नहीं परंतु दीर्घावधि में सैद्धांतिक रूप से अवश्य पिछड़ा सिद्ध कर देगा।
          बिहार के साथ-साथ देश का दुर्भाग्य देखिए कि जो मुख्यमंत्री अपनी गठबंधन सरकार के सहयोगियों को परिवार सहित भ्रष्टाचार अवैध लेन-देन में फंसे होने के बाद भी उनसे नैतिक आधार पर पद त्याग के लिए नहीं कह सकता या उन्हें सरकार से बाहर नहीं निकाल सकता, वह देश के प्रधानमंत्री होने का स्वप्न पाले हुए है। मीडिया में भी विपक्षी गठबंधन के बनने के बाद नीतीश को 2019 के विपक्ष के प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने के जैसे समाचार दिए जा रहे हैं, वे अत्यंत हास्यास्पद ही प्रतीत होते हैं। यहां मीडिया जगत को सोचना चाहिए कि केवल बड़े राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने से ही कोई मुख्यमंत्री या विपक्ष का प्रधान नेता प्रधानमंत्री के रूप में संपूर्ण देश की जनता को स्वीकार नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकतंत्र का विशाल बहुमत होने के बावजूद यहां की विगत कुछ दशकों की राजनीतिक समझ अत्यंत खोखली और देशविरोधी रही है। ऐसे में राज्यों के व्यापक लोकतांत्रिक परिसीमन को ध्यान में रखकर देश का प्रधानमंत्री होने का राजनीतिक विश्लेषण आज पूर्णतः अप्रासंगिक हो चुका है।
यादव परिवार पर केंद्रीय एजेंसियों की जांच कार्रवाई बहुत पहले शुरू हो चुकी थी, परंतु अभी तक मुख्यमंत्री नीतीश सत्ता में सहयोगी यादव परिवार के लोगों को पार्टी छोड़ने के लिए राजी नहीं कर सके। इस परिस्थिति में नीतीश के सम्मुख सच में महान बनने का अवसर था। अगर वे नैतिक आधार पर सिद्धदोषी भ्रष्ट सहयोगियों का मुख्यमंत्री बने रहना अस्वीकार कर देते या नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री पद का त्याग कर देते, तो जनता उनकी ईमानदार छवि से प्रेरित होती। लेकिन यह भी कैसे संभव होता क्योंकि जिन सहयोगियों की मदद से नीतीश मुख्यमंत्री बने, वे तो वर्षों से राजनीतिक भ्रष्टाचरण में अव्वल रहे हैं और नीतीश सहित देश के सभी लोग इस बात से भलीभांति अवगत भी हैं। नीतीश के पक्ष में बात बन सकती थी। अगर वे केंद्रीय जांच एजेंसियों के अभिपुष्ट आरोपों के आधार पर सत्ता में सहयोगी यादव परिवार के सदस्यों पर मुख्यमंत्री के रूप में कार्रवाई करने का साहस दिखाते। या सहयोगियों की पद त्याग करने की जिद के बाद स्वयं मुख्यमंत्री पद का त्याग कर देते।
          जिस राज्य में इस बरसात के मौसम में बिजली गिरने से 32 लोगों की मौत हुई हो, वहां निरर्थक राजनीतिक बहस को केन्द्रीय मुद्दा बनते देखना राजनीतिक ही नहीं अपितु सामाजिक दृष्टिकोण से भी कितना लज्जाजनक है। बिहार ही नहीं बल्कि देश को भी अवश्य यह ज्ञात होना चाहिए कि विगत रविवार को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में आसमानी बिजली गिरने से 32 लोग काल-कवलित हो गए। क्या यह इतनी छोटी घटना है, जो इसे व्यर्थ राजनीतिक उठापटक के परिदृश्य में भुला दिया जाए। राज्य की प्रबुद्ध जनता को सरकार से पूछना चाहिए कि वह राज्य में मूसलाधार वर्षा और बिजली गिरने जैसी समस्याओं के समाधान के लिए क्या दूरगामी और जीवन रक्षक कदम उठा रही हैं। ऐसी घटनाएं बिहार में लगभग प्रतिवर्ष ही घटित होती हैं। वर्षा जनित समस्याएं तात्कालिक ही नहीं होतीं। बिजली गिरने या मूसलाधार बारिश की चपेट में आने से जितने लोग मरे, प्राकृतिक आपदा का कहर यहीं तक नहीं रुकता। इसके बाद स्थान-स्थान पर एकत्रित वर्षा जल उचित संरक्षण के अभाव में बीमारियों और कीटाणुओं को पनपाने का माध्यम बनता है। हजारों लोग अतिवृष्टि के बाद की परिस्थितियों और सरकारी उदासीनता का शिकार होते हैं। स्थानीय चिकित्सालयों में रोगियों की संख्या बढ़ने से वहां की पहले ही चरमरा हुई चिकित्सालयी व्यवस्था और दुरूह, दुखद हो जाती है। राज्य शासन-प्रशासन हमेशा की तरह सत्ता की जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया राज्य की मूलभूत और अतिवृष्टि जनित समस्याओं पर ध्यान देने के बजाए कुंठित-प्रताड़ित करती राजनीति के चुटकुलों तक सीमित रहता है। जनता में भी वर्षों की कलुषित राज्य स्तरीय राजनीति के कारण विद्वेष अधिक होने से लोगों को एक-दूसरे का सहयोग नहीं मिल पाता। इन परिस्थितियों से बाहर निकलने के लिए बिहार की जनता को परस्पर सहयोग से आगे आना होगा।
बिहार के लोगों स्वयं को मतदाता के रूप में भी विवेकवान बनाना होगा ताकि वे राज्य के चहुंमुखी विश्वसनीय विकास के लिए एक अच्छी सरकार को चुन सकें। बिहारी लोग एक अलग प्रकार के जीवन कौशल से परिचित हैं। इस आधार पर आज वे देशभर के हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष श्रम-योगदान करने से लेकर आधिकारिक, बौद्धिक कार्यों में भी संलग्न है। जिस राज्य में इतना विशाल और विविध मानवीय योग्यताओं से भरपूर जनबल हो, वह यादव परिवार की निम्न स्तरीय राजनीति तक सिमट कर रह जाए, यह बिहार की माटी के साथ घोर अन्याय होगा। 
          बिहार में शिक्षा के सरकारी स्तर की गणना करना भी अपने आप में लज्जास्पद है। जहां विद्यालयी शिक्षा की परीक्षाओं में नकल कर उत्तीर्ण होने की मानसिकता से आम और खास दोनों ही पीड़ित हों, वहां राज्य में राजनीति से लेकर सामाजिक विकास सह-कारिता केंद्रित कैसे हो सकता है। शिक्षा ही नहीं, स्वास्थ्य तथा अन्य मूलभूत सुविधाओं नागरिक अधिकारों के लिए बिहार की जनता दशकों से सरकार की ओर ताक रही है, पर सत्तारूढ़ लोग सत्ता पर किसी कबीले के सरदार की तरह विराजे हुए हैं। उन्हें भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक मान्यताएं पद और गोपनीयता की शपथ लेने तक विवशतापूर्वक सुनाई देती हैं। इसके बाद उनकी अपनी मर्जी होती है कि वे राज्य को कैसे हांकें। 
          राज्य के लोगों को यादव परिवार सहित वहां के तमाम पतित नेताओं उनकी राजनीतिक नासमझी के लिए विनोदी भाव रखना बंद कर गंभीरतापूर्वक नए और योजनाबद्ध ढंग से काम करने वाली सरकार चुनने पर अपना ध्यान लगाना होगा। अन्यथा राज्य का राजनीतिक, आर्थिक और सबसे बढ़कर सामाजिक विकास एक दिवास्वप्न ही बना रहेगा।
          यह अच्छी बात है कि यादव परिवार पर कानूनी शिंकजा कसता जा रहा है। लेकिन इस विधिक कार्रवाई को सुखद और जनता के साथ न्याय तब माना जाएगा, जब इसकी परिणति दोषी यादव परिवार को समुचित दंड के रूप में सम्मुख होगी। सोच कर ही विचित्र लगता है कि ऐसे लोग सत्ताधारक बन जाते हैं और इनके भ्रष्टाचार से बाधित अपने जीवन के कष्टों को भुलाने के लिए लोग इनकी ही नौटंकीनुमा हरकतों पर हास्य-विनोद करते हैं।
विकेश कुमार बडोला

2 comments:

  1. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १७५० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "१७५० वीं बुलेटिन - मेरी बकबक बेतरतीब: ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. जहाँ जात-पात सर्वोपरि हो वहाँ विवेक का क्या काम ? बाकी सब ऐसे घोर अन्याय के मूक दर्शक हैं ।

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