Saturday, June 10, 2017

ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी

ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा का चन्‍द्रमा कितनी भव्‍यता से चमक रहा है! पहाड़ों पर वर्षा के बाद आज का खुला नभ स्‍थल कितनी नीलिमा के साथ दमक रहा है! तारों का अस्तित् पहले कई बार देखे गए उनके अस्तित् से आज कितना अलग लगता है! पश्चिम आकाश पर स्वर्णिम रंग के मेघांश जैसे अपने में समेट लेने को व्‍याकुल करते रहे। चारों ओर व्‍याप्‍त चांद के अद्भुत प्रकाश का सौंदर्य मुझे भौतिक दुनिया से दूर ले गया।
पहाड़ों की घाटी पर बसा ये शहर इस समय चांदनी में कितना आत्‍ममोह उत्‍पन्‍न कर रहा है। शहर के सबसे निचले तल से दूर ऊपर वर्षा धुली घाटियों पर कहीं-कहीं रोशनियां टिम-टिम कर रही हैं। इस शशि उज्‍ज्‍वला रात्रि में दूर दिखती ये रोशनी की टिमटिमाहटें जैसे प्रेमपूर्वक कह रही हैं कि आ जाओ हमारे आलिंगन में। जानता हूं कि ये टिम-टिम करते रोशनी के अंश घरों के बाहर लगे बिजली के बल्ब हैं। पर शशि के ओज में वे पारलौकिक आकर्षण लगते हैं! गहरे लगता है कि उनके पास जा कर इस चांदनी रात को सबसे अच्छे तरीके से जिया जा सकता है। सूर्य प्रकाश में हरीतिमा बिखेरते वृक्ष इस समय नील नभ पर चमकते इंदु की रोशनी में काले दिखाई देते हैं। इनकी शांत झूम अपने काले सायों के साथ कितनी मनहर है! इन विशाल वृक्षों के पीछे नील नभ का असीमित विस्तार और उस पर सुशोभित चन्द्रमा जैसे मुझे प्रेम में हवा का अंश बना रहा है। मैं अपने शरीर के भौतिक भार सहित कहीं दब जाता हूं।
मैं चांदनी के उजाले के एक कण के रूप में उभरता हूं। अपना नव रूप देख आश्‍चर्य नहीं होता। लगता जैसे संसार में मेरी नियति यही होने के लिए है। मैं इसी प्राकृतिक योग्‍यता से किसी को निस्‍वार्थ प्रेम कर सकता हूँ। किसी को अधिकार के बिना अनभुव कर सकता हूँ। किसी की दुखी भावनाओं को संभालने का उत्‍तरदायित्‍व ले सकता हूँ। इस चन्‍द्र निशा में घर की छत पर देर तक घूमते-घूमते मेरी टांगों की अकड़ ने मुझे सचेत किया। तब पता चला मैं भौतिक दुनिया की प्रयोगशाला में खपने वाला एक स्‍वार्थी मानव हूँ। जिसे अपने उस मित्र की दुखी भावनाओं की चिंता कभी नहीं रही, जो अपने दुखों को सहने के दौरान मुझ से सांत्‍वना की उम्‍मीद लगाए बैठा था। पर मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाया
जब आज मित्र के मुख से उसकी वर्षों पुरानी दुखपूर्ण कहानी सुनी तो लगा कि दुनिया में दुर्भाग्‍य फूलों जैसे सुंदर प्राणियों के लिए नहीं होना चाहिए था। उनका प्रारब्‍ध अच्‍छा ही होना चाहिए था। लेकिन मशीन बनती दुनिया के समाज और इसके लोगों में यह समझने की योग्‍यता नहीं कि किस मनुष्‍य का मूल्‍य क्‍या है। मेरे इतने सुंदर, सुशील और मन के स्‍वच्‍छ मित्र के साथ ऐसी दुर्घटना नहीं होनी चाहिए थी। चांद की तरफ देख कर मित्र के अशांत मन को सर्वशांत करने के उपाय ढूंढता हूँ। पर मित्र का दर्द मेरी सहानुभूतियों से भी बढ़ा है। इसलिए वह मेरी सद्भावनाओं और प्रेमपूर्ण शब्‍दों को सुन कर आज के लिए उन्‍हें भूल गया। मेरे साथ अपना दुख बांट कर फि‍र से तनाव में घिर गया। क्‍योंकि रात को पता चला कि उसका सिरदर्द कर रहा है।
 वह सुदूर किसी नगर में है। उसके दर्द को यहां से अनुभव कर प्राकृतिक चांदनी का अदृश्‍य लेप अपनी उंगलियों में लगा उसके माथे पर लगाता हूँ। भले ही यह काल्‍पनिक लगे पर मुझे विश्‍वास है सुबह उसका सिर शांत-प्रशांत होगा। वह ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी रात का मेरे शहर से मेरे द्वारा भेजा गया अमृत पीकर स्‍वस्‍थ हो उठेगा। ईश्‍वर करे नया सवेरा उसके जीवन को नए मार्ग पर ले जाए। वह अपने पीड़ाजनक समय को भूले। उन प्रेमिल भावनाओं को महसूस करे, जो किसी ने बड़े प्रयास से उसके लिए संजोई हैं।
अगर मैं रातभर ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी में घर से बाहर रहा तो निश्चित है मैं प्रेम बन कर प्रकृति कणों में अदृश्‍य हो जाऊंगा। इतना संप्रभाव है चांदनी रात का! लेकिन मैं अभी भौतिक शरीर के साथ ही अपने मित्र का प्रेम सहायक बनना चाहता हूँ। मित्र से हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि मुझे मेरे गंभीर मुख की मुद्राओं से नहीं बल्कि मेरे हृदय के वात्‍सल्‍य से पहचाने। सच में मेरा हृदय इस कठोर मशीनी युग में भी गुप्‍त स्रोत से निकलते जल के समान है। शीतल, निर्मल, निश्‍छल, प्रेमिल और प्राकृतिक।
विकेश कुमार बडोला 

2 comments:

  1. bahut badhiya aalekh. kabhi mere blog par bhi aayen-https://lokrang-india.blogspot.in/

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards