Saturday, April 15, 2017

राजनीतिक विरोधाभास हैं र्इवीएम में गड़बड़ी के आरोप

वीएम में छेड़छाड़ की आशंका को लेकर विपक्ष बुरी तरह बौखलाया हुआ है। यूपी और उत्‍तराखंड में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्‍तासीन क्‍या हुई विपक्षियों ने अपनी पराजय का सारा दोष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ियों पर डाल दिया। सबसे पहले बसपा की मायावती ने ईवीएम से छेड़छाड़ की बात उठाई। उल्‍लेखनीय है कि बसपा सहित तमाम अन्‍य राजनीतिक दल यूपी में बुरी तरह परास्‍त हुए हैं। इसकी खीझ वे ईवीएम मशीनों पर निकाल रहे हैं।
इसके बाद दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री केजरीवाल ने ईवीएम मशीनों में खराबी होने का आरोप लगाया। वे तो राज्‍य निर्वाचन आयोग से दिल्‍ली में आगामी नगर निगम चुनावों में ईवीएम मशीनों के स्‍थान पर बैलेट पेपर का इस्‍तेमाल करने की सिफारिश तक कर चुके हैं। अब कांग्रेस सहित सारा विपक्ष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी को लेकर मुखर है तथा उसका तेरह सदस्‍यीय प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में राष्‍ट्रपति से भी अपनी शिकायत कर चुका है।
यूपी और उत्‍तराखंड में यदि भाजपा ने सत्‍ता प्राप्‍त की तो पंजाब में कांग्रेस सत्‍तारूढ़ हुई। इसी तरह गोवा और मणिपुर में कांग्रेस को ज्‍यादा विधानसभा सीटें मिलीं। पंजाब, गोवा व मणिपुर के संदर्भ में तो विपक्षियों को ईवीएम का दोष दिखाई नहीं देता। देखा जाए तो ईवीएम मशीनों पर अपनी राजनीतिक पराजय का ठीकरा फोड़ना अलग-अलग राजनीतिक दलों की निजी कुंठा ही प्रदर्शित करता है क्‍योंकि विपक्ष ने किसी उचित कारणवश एक होकर ईवीएम मशीनों में समस्‍या की शिकायत नहीं की।
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पूर्व ही अपनी सरकार बनाने के दावे कर दिए थे। हारने पर उसके मुखिया केजरीवाल को ईवीएम में खराबी दिखने लगी। इसी प्रकार यूपी में चुनाव पूर्व केवल राजनीतिक अवसर झपटने के लिए बना सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा की करारी हार से इनके नेताओं को किसी न किसी रूप में अपनी भड़ास निकालनी थी। इसलिए इन्‍होंने ईवीएम मशीनों की खराबी के जरिए अपनी भड़ास निकाली। ज‍बकि पंजाब के नवनिर्वाचित कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री अमरिंदर जीत सिंह ने ईवीएम मशीनों में खराबी के आरोप के बाबत कहा कि यदि मशीनों में खराबी होती तो वे बहुमत कैसे प्राप्‍त करते। कहने का तात्‍पर्य यही है कि ईवीएम में दोष का विपक्षी एजेंडा भी राजनीतिक विरोधाभासों से भरा हुआ है, जो जनता को केवल हास्‍यास्‍पद ही नजर आता है।
विगत संसद सत्र में विपक्षियों ने गैर-भाजपाई राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों और नेताओं के विरुद्ध सीबीआई तथा ईडी द्वारा प्रस्‍तुत आरोप पत्रों को लेकर जमकर हंगामा खड़ा किया। चूंकि भारत में केंद्र की मोदी सरकार का आगमन कांग्रेसजनित भ्रष्‍टाचार से ऊब का ही परिणाम था इसलिए सरकार की जनता के प्रति अहम जिम्‍मेदारी थी कि वह कांग्रेसियों के भ्रष्‍टाचार व घोटालों के सिद्ध दोषियों को कानूनी ढंग से सजा दिलवाए। परंतु मोदी सरकार के तीन वर्ष व्‍यतीत होने के उपरांत भी अभी तक किसी घोटालेबाज को कोई सजा नहीं दी जा सकी है।
सीबीआई व प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेसी सरकार में हुए अवैध लेन-देन, घपलों-घोटालों के संबंध में अनेक मामलों में आरोप पत्र तो कई बार प्रस्‍तुत किए पर अभी तक किसी बड़े राजनेता या उसके करीबी कारोबारी को कठोर कानूनी दंड के दायरे में नहीं लाया जा सका है। मोदी सरकार पर इस बात की बड़ी जवाबदेही है। इसलिए उसने केंद्रीय जांच एजेंसियों को अपराधियों की धरपकड़ के  लिए विशेषाधिकार और समन्‍वयक सुविधाएं प्रदान की हैं। इसी के परिणामस्‍वरूप कांग्रेसी राज्‍यों के वर्तमान व पूर्व मुख्‍यमंत्रियों, नेताओं व इनके करीबी कारोबारियों पर जांच एजेंसियों का शिंकजा गहराता जा रहा है। चूंकि विपक्ष को पूरी आशंका है कि उनके घपले-घोटाले व भ्रष्‍टाचार को मोदी सरकार एक न एक दिन साबित कर देगी इसलिए उन्‍होंने सरकार का ध्‍यान बांटने के लिए संसद व संसद से बाहर ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का नया शिगूफा उछाला है।
इस मामले में उन्‍हें न्‍यायालयों में दाखिल इस आशय की जनहित याचिकाओं का सहारा भी मिला। जिनमें न्‍यायाधीशों ने टिप्‍पणी करी कि जब ईवीएम में दोष की आशंका इतने बड़े पैमाने पर उभरी है तो चुनाव आयोग उनकी आशंका का समाधान करे। चुनाव आयोग पर पिछले एक माह से ईवीएम मशीनों को त्रुटिहीन सिद्ध करने का दबाव पड़ रहा था। अंतत: आयोग ने राजनीतिक दलों और मशीनों की गड़बड़ी पकड़ सकनेवाले विशेषज्ञों को ईवीएम मशीनों के परीक्षण-निरीक्षण करने का मौका उपलब्‍ध करा ही दिया है।
इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ठीक न होने का प्रश्‍न उठानेवाले राजनेताओं और मशीन विशेषज्ञों को आयोग ने खुली चुनौती दे दी है। आयोग ने कहा है कि मई के प्रथम सप्‍ताह में ऐसे लोग मशीन को हैक करके या उसमें किसी किस्‍म की गड़बड़ी करके दिखाएं। आयोग इसके लिए एक हफ्ते या दस दिन का समय देगा। संभवत: उत्‍तर प्रदेश चुनाव में इस्‍तेमाल की गई मशीनों से ही राजनीतिक दलों व इनके विशेषज्ञों से छेड़छाड़ अथवा हैक करने को कहा जाए। वैसे नियम यह है कि ईवीएम मशीनों को चुनाव परिणाम के बाद 40 दिन से पूर्व स्ट्रांग रूम से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। यह अवधि माह के आखिर में खत्‍म हो रही है। नियम का अनुपालन सुनिश्चित हो सके इसीलिए मशीनों के निरीक्षण के लिए मई का पहला सप्‍ताह नियत किया गया है।
ईवीएम मशीनों में छेड़खानी का आरोप लगानेवाले नेता कितने जमीनी हैं अथवा वे जनता के कितने सेवक हैं यह उनके निराधार आरोपों से तय हो चुका है। इतने वर्षों से सत्‍तासीन इन नेताओं में जनता का राजनीतिक दृष्टिकोण परखने की योग्‍यता नहीं। देश का जनमानस कैसी राजनीति चाहता है, इस दिशा में सोचकर खुद को नए सिरे से नई सकारात्‍मक राजनीति के लिए तैयार करने के बजाय वे जनता के बहुमत की अवहेलना कर रहे हैं। क्‍या इस संबंध में संविधान या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन करने का दोषारोपण ऐसे नेताओं पर नहीं लगना चाहिए। क्‍या किसी के द्वारा इस प्रकरण में जनहित याचिकाएं दाखिल नहीं की जानी चाहिए। न्‍यायालयों का स्‍वयं संज्ञान क्‍या इस संदर्भ में नहीं जागना चाहिए।
इस तरह तो लोकतांत्रिक अवधारणा विरोधाभासों से घिरती जाएगी। ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर भाजपा की केंद्र सरकार की ओर से मजबूत प्रत्‍यारोप नहीं आना भी उचित नहीं कहा जा सकता। वह कम से कम अपने संसाधनों का उपयोग कर न्‍यायालयों में इस बाबत एक जनहित याचिका तो डाल ही सकती है। बेशक उसे अपनी राजनीतिक मंशा साफ, पारदर्शी लगे परंतु उसे जनता के उस बहुमत का आदर तो करना ही चाहिए, जिसके बलबूते वह सत्‍तारूढ़ हुई है। इसी आधार पर वह चुनाव आयोग या न्‍यायालयों के समक्ष जनता के बहुमत का हवाला देकर ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी के आरोपों को निराधार सिद्ध कर सकती है।
विकेश कुमार बडोला

4 comments:

  1. शंका उठी है तो उसका समाधान करना जरुरी है

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  2. सही कहा आपने ......राजनीतिक विरोधाभास ही है यह.......

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  3. चाहे कोई भी आरोप हो उसका जबतक सही और उचित जबाब नही दिया जाता तब तक शंकाओं को स्थान रहता ही है।

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  4. अब तो पता चल गया है कि असली गड़बड़ी कहाँ है ।

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