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Saturday, February 4, 2017

आतंकवाद उन्मूलन के लिए अमेरिकी तरीका ही सर्वश्रेष्ठ

संपूर्ण जगत के कल्‍याणकारी दृष्टिकोण्‍ा के साथ जो लोग भावी सं‍ततियों के बारे में चिंतित थे, उन लोगों के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति के दो शासकीय नवनिर्णय निश्चित रूप से आनंद प्रदान करनेवाले सिद्ध होंगे। आशा के अनुरूप डोनाल्‍ड ट्रंप ने विश्‍वव्‍यापी आतंकवाद की प्रामाणिक सूत्रधारणा इसलामी विचारधारा को पालनेवाले सात मुसलिम बाहुल्‍य देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। यह रोक अभी नब्‍बे दिनों के लिए लगाई गई है, जिसे परिस्थितियों के आधार पर बढ़ाया भी जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान और सऊदी अरब जैसे मुसलिम बहुल देशों को आतंकवाद नियंत्रण व निरोधक प्रस्‍ताव के अंतर्गत निगरानी सूची में रखा गया है। ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, यमन, सूडान और सोमालिया प्रतिबंधित देशों की सूची में हैं। अपने दूसरे शासकीय निर्णय में डोनाल्‍ड ट्रंप ने अमेरिका के शरणार्थी पुनर्वास कार्यक्रम पर भी चार महीनों के लिए प्रतिबंध घोषित कर दिया है। इस निर्णय के बाद अमेरिका में किसी भी देश के शरणार्थी प्रवेश नहीं कर सकेंगे।
उल्‍लेखनीय है कि रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्‍याशी के रूप में ट्रंप ने चुनाव अभियान के दौरान ही कह दिया था कि यदि वे राष्‍ट्रपति बनेंगे तो अमेरिका में कट्टरपंथी मुसलिमों के प्रवेश पर रोक लगाएंगे। इसके बाद 20 जनवरी को राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया था कि वह अपनी चुनावी घोषणाओं पर काम करेंगे तथा कट्टरपंथी इसलामी आतंकवाद समाप्‍त करके रहेंगे। ‘प्रोटेक्‍शन ऑफ द नेशन फ्रॉम टेररिस्‍ट एंट्री इन टू दे यूनाइटेड स्‍टेट्स’ शीर्षक से जारी आदेश में स्‍पष्‍ट है कि अमेरिकी वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर पर सितंबर 2011 के आतंकी हमले के बाद अमेरिकी प्रशासन द्वारा आतंकनिरोध के लिए किए गए उपाय अपर्याप्‍त थे तथा इनसे अमेरिका आतंकवाद को मिटा नहीं सका। इस आदेश के जारी होने के बाद अमेरिकी दक्षिणपंथी जनता की इस धारणा को संबल मिला कि जिन विदेशियों ने वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर व अमेरिका के दूसरे स्‍थानों पर आतंक फैलाया वे सभी वहां पर्यटन, शिक्षण तथा नौकरी का वीजा लेकर आए थे और इनमें से कुछ उग्रवादी तो अमेरिका में चलनेवाले शरणार्थी सहायता कार्यक्रम का लाभ लेकर वहां पहुंचे। साथ ही ट्रंप के इन दो शासकीय निर्णयों के बाद अमेरिका के बारे में उसके विरोधी देशों की यह भ्रांति भी गलत सिद्ध हुई कि उसने नब्‍बे के दशक के उपरांत अमेरिका में आई मंदी से उबरने के लिए खुद ही वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर पर हमले करवाए। ताकि विश्‍व को आतंक से भयग्रस्‍त कर वह अपने हथियार निर्माताओं के‍ हथियारों को दु‍नियाभर में बेचने का प्रबंध कर सके।
ट्रंप के इन आदेशों का अमेरिकी विपक्षी राजनीतिक दल डेमोक्रेटिक पार्टी तथा दुनिया के कई धर्मनिरपेक्षवादी तीखा विरोध कर रहे हैं। आशंका है कि दुनिया के सभी कट्टरपंथी मुसलिम बहुल देश ट्रंप के इस निर्णय के खिलाफ विध्‍वंशक एकता न दिखाने लग जाएं। ऐसी स्थिति में दुनिया के दक्षिणपंथियों को भी इनका मुकाबला करने के लिए एकजुट होने की आवश्‍यकता होगी। विरोधी राजनीतिक दल, इनके लोग और इनका मीडिया, ये सभी ट्रंप के इस आदेश के बाद बुरी तरह घबराए हुए हैं। ये वही विरोधी हैं जिन्‍होंने राष्‍ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप को सदैव हिलेरी क्लिंटन से कमतर आंका। इन्‍होंने स्‍थानीय अमेरिकी जनता के उस मतपक्ष की भी जानबूझकर अनदेखी करी, जिसमें स्‍पष्‍ट रूप से लोकतंत्र का बहुमत डोनाल्‍ड ट्रंप को मिलने जा रहा था। चुनाव परिणाम आने के कुछ समय पूर्व तक अमेरिका सहित दुनियाभर के मीडिया सर्वेक्षणों में हिलेरी‍ क्लिंटन को विजयी बताया जा रहा था। परिणामों के बारे में असत्‍य भविष्‍यवाणी करके विरोधियों ने दुनियाभर के दक्षिणपंथियों का रक्‍तचाप बढ़ा दिया था। जिस प्रकार परिणाम पूर्व सर्वेक्षणों और कल्‍पनाओं में ट्रंप को पराजित आंका जा रहा था, उससे तो अब यही सिद्ध हो रहा है कि अमेरिकी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का षड्यंत्र रिपब्लिकन ट्रंप का नहीं अपितु डेमोक्रेटिक हिलेरी की ओर से किया गया था। और जब अमेरिकी लोकतंत्र का बहुमत हिलेरी की पराजय के रूप में आया तो डेमोक्रेट्स ने अपने अपराध को छुपाने के लिए चुनाव परिणाम प्रभावित करने का आरोप उल्‍टा ट्रंप पर मड़ दिया ताकि उनकी विजय को अप्रत्‍याशित जता कर दुनिया में उन्‍हें चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का अपराधी बना दिया जाए।
रक्षा मंत्रालय पेंटागन के दौरे के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप द्वारा हस्‍ताक्षरित उपरोक्‍त आदेशों का आशय स्‍पष्‍ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि ये निर्णय अमेरिकी नागरिकों को इस्‍लामिक आतंकवादियों के हमलों से बचाने के लिए किए गए हैं। उन्‍होंने साफ कहा कि वे अब कट्टरपंथियों को किसी भी कीमत पर अमेरिका में नहीं देखना चाहते। सात मुसलिम बहुल देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश करने पर रोक, तीन मुसलिम बहुल देशों को निगरानी में रखने के अलावा अन्‍य देशों से अमेरिका जानेवाले व्‍यक्तियों की भी कड़ी जांच की जाएगी। शासकीय आदेश में उल्लिखित है कि दुनिया के किसी भी देश से अमेरिका आने वाले व्‍यक्ति का उद्देश्‍य अवश्‍य स्‍पष्‍ट किया जाना चाहिए। इस आदेश के पूर्व कुछ देशों विशेष वर्ग के लोगों को वीजा साक्षात्‍कार में छूट मिली हुई थी। अब उसे भी समाप्‍त कर दिया गया है। भाविष्‍य में अमेरिका जाने के इच्‍छुक सभी लोगों का साक्षात्‍कार होगा।
जहां सात मुसलिम देशों पर प्रतिबंध को देखते हुए दुनियाभर में अमेरिका की आलोचना वाली खबरें ज्‍यादा चल रही थीं, वहीं कुवैत जैसे देश ने पाकिस्‍तान सहित पांच मुसलिम देशों पर अमेरिका की तरह ही अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस बीच पाकिस्‍तान ने भी अमेरिका की नजर में खुद को आतंकवाद फैलानेवाले देशों में से एक मानने के बाद मुंबई बम धमाकों के मुख्‍य षडयंत्रकारी हाफि‍ज सईद को नजरबंद कर उस पर कार्रवाई करने का दिखावा भी शुरू कर दिया। इस बीच भारत के एच1 वीजा पर अमेरिका की सख्‍ती के बाद भारत में अमेरिका का विरोध शुरू हुआ तो अमेरिका ने भारत को वीजा देने या न देने के संबंध में अपनी संसद को इस विषय पर अंतिम निर्णयाक बनाने की पहल की। अमेरिका जानेवाले भारतीय नागरिकों के लिए यह राहत की बात होगी।
जिस तरह पिछले एक दशक में मुसलिम आतंकवाद ने इसलाम की धार्मिक धारणा के वशीभूत हो दुनिया के विभिन्‍न विकसित, अर्द्ध-विकसित और विकासशील देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई उसे दुनियाभर के तथाकथित उदारवादी विद्वानों, वामपंथी विचारकों और इनके बलबूते शासन करनेवाले वैश्विक नेताओं ने गंभीर नहीं माना। प्रत्‍येक आतंकी घटना में अनेक निर्दोष लोगों के मारे जाने के बाद ऐसे वैश्विक नेताओं का स्थायी वक्‍तव्‍य आता था कि गरीबी व अशिक्षा के कारण कुछ मुसलमान नौजवान राह भटक गए हैं इसलिए यह सब हो रहा है। लेकिन जब सीरिया, पाकिस्‍तान, सोमालिया जैसे देशों में कुछ आतंकी समूहों ने विश्‍व के लगभग सभी स्‍थानों पर बकायदा पेशेवर तौर पर निरंतर आतंकी घटनाएं कराईं तो चेतना रखनेवाले कुछ वैश्विक विद्वानों का माथा ठनका। उन्‍होंने अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देशों के शासनाधीशों का ध्‍यान इस ओर इंगित कराया। भारत आतंकवाद से सर्वाधिक पीड़ित रहा। परंतु यहां के धर्मनिरपेक्ष शासन-तंत्र ने मात्र मुसलिम वोटों के लालच में कभी भी अपने को मुसलिम आतंकवाद से पीड़ित राष्‍ट्र घोषित नहीं किया। यहां आतंक को ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ कहकर संबोधित किया जाता रहा। भारतीय लोकतंत्र के सभी संस्‍थान पता नहीं क्‍या सोचकर मुसलिम कट्टरवाद को हमेशा से प्रश्रय देते रहे। इसका परिणाम आज यह है कि अल्‍पसंख्‍यक कही जानेवाली भारतीय मुसलिम जनता अहिंसा, कट्टरता और धार्मिक उन्‍माद दुर्भावना से दुष्‍प्रेरित हो भारतीय संविधान के समानांतर अपनी अनावश्‍यक धार्मिक कानूनी धारणाएं मजबूत कर रही है। दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से यहां का संविधान और संवैधानिक तंत्र वर्षों से ऐसी कानूनी धारणाओं की सुनवाई करने में लगा हुआ है।
 मोदी सरकार ने भारत व इसके पड़ोसी भूभाग पर व्‍याप्‍त आतंकवाद की जड़ों को सीधे तौर पर तो नहीं पर अप्रत्‍यक्ष रूप से काटने के प्रयास किए हैं। इस अभियान में नोटबंदी सबसे बड़ा आधिकारिक प्रयास रहा। लेकिन लगता नहीं कि मात्र नोटबंदी से ही आतंक की‍ विषैली जड़ों को काटा जा सकता है। मुसलिम आतंक से सर्वाधिक त्रस्‍त भारत देश से भी आतंकवाद की समाप्ति हेतु यहां की सरकार को अमेरिकी सरकार जैसे ही सशक्‍त और सीधे शासकीय निर्णय लेने की आवश्‍यकता है। 

3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "अंधा घोड़ा और हम - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. As usual amazing article .... really fantastic .... Thanks for sharing this!! :) :)

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  3. विरोध का बराबर विरोध धार की कुन्द ज़रूर करता है ... ट्राम्प का तरीक़ा सही है या नहीं ये तो समय बताएगा पर समाज में हलचल होनी ज़रूरी है तभी इस तरफ़ ध्यान जाएगा ... और समाधान भी निकलेगा ...

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