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Friday, December 9, 2016

शहीदों के मेले और दुश्मन देश का वार्ता राग

विगत दिनों जम्‍मू कश्‍मीर स्थित नगरोटा और सांबा में आतंकियों से हुई मुठभेढ़ में हमारे 7 सैनिक शहीद हो गए। सैनिकों के शहीद होने के बारे में जानना शायद इस देश के लोगों के लिए एक सामान्‍य खबर है। तभी तो पाकिस्‍तान की ओर से जारी आतंकी घुसपैठ के एक अघोषित युद्ध में हमारे सीमा प्रहरी सैनिकों को निरंतर जूझना पड़ रहा है तथा दुख इस बात का है कि पड़ोसी होने के तमाम सामान्‍य संस्‍कार तोड़ कर खुद पर हिंसक व बदमिजाज राष्‍ट्र होने का ठप्‍पा लगा चुके पाकिस्‍तान के साथ भारत की वार्ता की गुंजाइश अभी भी ढूंढी जा रही है। जिस दिन नगरोटा-सांबा में हुए आतंकी हमले में हमने अपने सैनिक गंवाए उससे पहले दिन भारत में तैनात पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त अपने यहां के विदेश मंत्री के साथ भारत सरकार सेे वार्ता करने की जुगत में जुटे हुए थे। और साथ ही एहसान की भाषा में कह रहे थे कि वे हमारे साथ बिना शर्त वार्ता करने को तैयार हैं।
आखिर इस देश की राजनीति को यह हो क्‍या गया है, जो पाकिस्‍तान के लिए इस तरह की कोई गुंजाइश छोड़ती है, जिसमें उसे लगता रहे कि वह तमाम गलतियां करके भी भारत की नजर में वार्ता करने लायक बना हुआ है। भारत स्थित उसके उच्‍चायुक्‍त का यह दुस्‍साहस हुआ ही क्‍यों कि वह कोई प्रेस विज्ञप्ति दे दे कि पाक वार्ता के लिए तैयार है। क्‍या वे दो-ढाई माह पहले उड़ी में शहीद भारतीय सैनिकों का बलिदान तथा उसके बाद भारतभर में आग की तरह व्‍याप्‍त पाकिस्‍तान पर आक्रमण करने तथा भारत की तरफ से उसकी जलापूर्ति रोकने की जनभावना को भूल गए?
कोई देश तब बनता है जब उसका एक-एक नागरिक वहां अपने कर्तव्‍यों के निर्वहन में लगकर देश चलानेवालों से अपनी सुरक्षा की भावना रखता है। कर्तव्‍य निर्वाह करने में तो नागरिक लगे हुए हैं परंतु राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की राजनयिक व्‍यवस्‍था के दोषों और सड़ी हुई कार्यप्रणाली के कारण नागरिकों का जीवन सुरक्षित नहीं है। विशेषकर सैनिकों और किसानों का जीवन तो विगत 70 वर्षों से इस देश में सरकारी सुरक्षा की कागजी छतरी के बावजूद असुरक्षित ही बना रहा।
राष्‍ट्र के लिए कर्तव्‍य निर्वाहक के रूप में सैनिक और किसान से बढ़कर कौन हो सकता है। और जब हमारे एक नहीं कई सैनिक निरंतर उस देश की तरफ से उत्‍पन्‍न आतंकी हमलों और सैन्‍य उकसावे की गतिविधियों में अपनी कीमती जानें गंवा रहे हों, जो बिना मतलब खून-खराबे को पसंद करता हो तो ऐसे में कम से कम शहीद सैनिकों के अंतर्मन में राष्‍ट्र का अस्तित्‍व धुंधला ही जाएगा। इस प्रकार देश के लिए जान देना उनके लिए फि‍र एक बड़ी देशभक्ति की भावना नहीं रह जाती। यह उनके मन की बात होती है। इसे वे कभी बाहर नहीं निकालते। लेकिन हमें समझना होगा कि बिना किसी घोषित युद्ध के एक देश के सैनिकों का ऐसे ही किसी देश की धार्मिक कार‍गुजारियों के कारण मर जाना कहां और कब तक सहन हो सकता है। 
यदि कर्तव्‍यपरायणता की बात होती है तो हमारे सैनिक अपने देश के लिए ही नहीं बल्कि शांति सैनिक बनकर मित्र देशों के लिए भी सैन्‍यकर्मी के रूप में अपना सर्वस्‍व झोंक देते हैं, अपनी जान की परवाह नहीं करते। लेकिन पाकिस्‍तान की ओर से जारी उकसावे वाले आतंकी युद्ध में षडयंत्र के तहत अपनी जान गंवाना हमारे सैनिकों को भी गवारा नहीं होगा। जो लोग कहते हैं कि युद्ध किसी समस्‍या का हल नहीं उनसे केवल एक प्रश्‍न है। क्‍या वे शहीद सैनिकों के स्‍थान पर खुद को रखकर या उनकी भावना से मौत का साक्षात्‍कार करते हुए कभी कह सकते हैं कि युद्ध समस्‍या का हल नहीं। और फि‍र युद्ध लड़े जाने की शुरुआत इसी युग में तो नहीं होगी। धर्मग्रंथों में समाहित, हजारों वर्षों का प्रामाणिक इतिहास हमें बताता है कि एक-दूसरे के परिक्षेत्रों पर अधिकार जमाने की मंशा से दुनिया में युद्ध हमेशा से होते रहे हैं। युद्ध नहीं करने की भावना अगर इतनी बलवती होती तो आज दुनिया में विभिन्‍न देशों का अस्तित्‍व नहीं होता तथा विश्‍वभर में हथियारों का कारोबार लाइसेंसशुदा नहीं होता। उस पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया होता। इन परिस्थितियों में एक अद्वितीय संवेदना जटिल प्रश्‍न बनकर खड़ी होती है कि आखिर युद्ध न होने पर भी संसार में सुखी है कौन।
हम ज्‍यादा पीछे न जाकर एक वर्ष पूर्व पठानकोट के वायु सैनिक केंद्र पर हुए आतंकी हमलों से लेकर उड़ी में शहीद सैनिकों तथा सीमा पार सर्जिकल स्‍ट्राइक होने के बाद लगभग प्रतिदिन शहीद, घायल होनेवाले हमारे सैनिकों के बारे में सोचें तो एक विषाद मन में घर कर जाता है कि अंतत: हमारी रक्षा नीति को कब तक धैर्य के उपबंधों से लिपटे रहना होगा। हमारे सैन्‍यकर्मी एक-एक दो-दो करके शहीद होने पर लगे हुए हैं। शहीदों का वास्‍तविक सांख्यिकीय ब्‍यौरा रखकर भारत-पाकिस्‍तान के रिश्‍तों पर बात करना बिलकुल वैसा ही होगा जैसे कोई किसी को बार-बार विष दे और विष पीनेवाला हर बार बच जाने पर फि‍र विष पिलानेवाले से दोस्‍ती की आशा रखे। पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रीय चरित्र में वह राजनीतिक मंशा कभी नहीं होगी कि वह अपने यहां आतंक पर पूरी तरह नियंत्रण पा लेगा। और यदि ऐसा नहीं होगा तो सीमा पर तैनात हमारे निर्दोष सिपाहियों के निरंतर बलिदान पर रोक लगाना बहुत मुश्किल होगा।
हमारी रक्षा नीति में पाकिस्‍तान को लेकर वहां सेना प्रमुख बदले जाने के बाद या उसके द्वारा बिना शर्त वार्ता के लिए तैयार होने की दोनों स्थितियों में कोई समझौतापरक परिवर्तन बिलकुल नहीं होना चाहिए। चाहे भारत-पाकिस्‍तान के तनावपूर्ण रिश्‍ते हों या इस आधार पर दुनिया की राजनीतिक अथवा सामरिक महत्‍वाकांक्षाएं, तय है कि परमाणु और नाभिकीय विस्‍फोट में दुनिया के खत्‍म होने तक पाकिस्‍तान का भारत के साथ दुर्व्‍यवहार जारी रहेगा।
इन परिस्थितियों में हमारी कोशिश यही हो कि पाक के साथ वार्ता के सभी रास्‍ते बंद करके पहले खुद के स्‍तर पर अन्‍यथा विश्‍व बिरादरी को साथ लेकर उसके भीतर के आतंक को उसके चीं-चुपड़ के बिना हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाए। इसके बाद यदि वह सुधरने का प्रयास करेगा तो उसके साथ वार्ता की जा सकती है। फि‍लहाल तो सीमा पर अपने सैनिकों के शहीद होने के समाचारों से संवेदनशील भारतवासी संत्रासित हैं। सरकार को पाकिस्‍तान के साथ कोई भी वार्ता करने से पूर्व शहीद और घायल हुए सैनिकों तथा उनकी जैविक भावनाओं के साथ जुड़ी देशवासियों की भावनाओं को अवश्‍य समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

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  2. दिनांक 11/12/2016 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
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    आप भी इस प्रस्तुति में....
    सादर आमंत्रित हैं...

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  3. आपका आंकलन जिस तरफ इशारा कर रहा है ... शायद अब ये देश उसी तरफ बढ़ रहा है ... धीरे धीरे ये स्थिति आ ही जानी चाहिए नहीं तो जनता का दबाव इसे बना देगा ...

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  4. बहुत ही उम्दा .... Sundar lekh ... Thanks for sharing this nice article!! :) :)

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  5. बहुत सटीक आकलन।

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  6. सवा सोलह आने सही ।

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