Monday, October 17, 2016

भाषाई समझौता केवल हिन्‍दी में ही क्‍यों हो

ल्‍पना करिए यदि हम अमेरिका या किसी दूसरे देश में होते और तब हिन्‍दी दिवस मनाते तो यह भारत और भारतीय राजभाषा हिन्‍दी के लिए महत्‍वपूर्ण होता। परंतु अपने ही देश में अपनी ही राजभाषा के लिए हिन्‍दी दिवस मनाना राजभाषा के लिए सम्‍मान है या उसका अपमान, इस पर भावपूर्ण विवेचन किए जाने की अति आवश्‍यकता है। हिन्‍दी भाषा तीन प्रमुख समस्‍याओं से अधिक जूझ रही है। पहली, हिन्‍दी के राजभाषायी स्‍वरूप का जन-जन में स्‍थान न बना पाना। राजभाषा की धारणा बनाने वालों द्वारा इसके व्‍यापक प्रसार के लिए देश के विद्यालयों में इसका समुचित भाषाई क्रियान्‍वयन नहीं कराया जाना। दूसरी समस्‍या राजभाषा हिन्‍दी को पचास वर्षों से भी अधिक समय तक न तो शासकीय और ना ही निजी प्रतिष्‍ठानों में पत्रकारिता की भाषा बनाया गया। तीसरी और सबसे बड़ी समस्‍या जो रही, वह थी हिन्‍दी भाषा का पत्रकारिता के रूप में स्‍वयंमेव मनचाहा प्रयोग होना। इसका दूरगामी दुष्‍परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय राष्‍ट्र की राजभाषा हिन्‍दी को अपने साथ चाहे-अनचाहे उस मानवीय समाज, समूह और व्‍यापारियों की मुंहबोली व सर्वथा भावहीन तथा आडंबरपूर्ण शब्‍दों से युक्‍त कथ्‍य-भाषा का प्रयोग करना पड़ रहा है जो भारतीय धर्म-संस्‍कृति-सभ्‍यता की धारणाओं को कुचलने के लिए पृथ्‍वी पर हजारों वर्षों से आक्रांता बन घूम रहे हैं। ऐसे आक्रांता कभी तुर्कों, कभी मुगलों तथा कभी अंग्रेजों के वेश में रहे। आज भी हिन्‍दी भाषा जहां-जहां खटकती है तथा हिन्‍दी के संवेदनशील सृजक को भाषायी विरोधाभास कराती प्रतीत होती है, उसका कारण आक्रांताओं के आडंबरपूर्ण व भावहीन शब्‍दों का हिन्‍दी से मिल जाना ही रहा।  
       
        कुछ लोग उर्दू भाषा के हिन्‍दी में लिखे जानेवाले शब्‍दों को बड़ा महत्‍व देते हैं। वे कहते हैं कि समाज में यही शब्‍द आम बोलचाल में ज्‍यादा शामिल हैं तो लिखने के लिए भी इनका ही प्रयोग किया जाना जरूरी है। इस अभियान को भारतीय हिन्‍दी समाचारपत्रों और डेढ़ दशक पहले अस्तित्‍व में आए इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने समर्थन ही नहीं दिया, सराहा ही नहीं, बल्कि इसका अपने-अपने स्‍तर पर क्रियान्‍वयन भी खूब किया। समाचारपत्र वास्‍तव में आम बोलचाल के उर्दू शब्‍दों से भरे होते हैं। विशेषकर जिन पढ़े-लिखे लोगों पर वामपंथ का असर रहा, उन्‍होंने तो आम जीवन में बोले जानेवाले उन शब्‍दों का अपने लेखन में खूब इस्‍तेमाल किया, जिनके शब्‍द का शब्‍द से ही अर्थ नहीं समझा जा सकता। संस्‍कृत से निकली देवनागरी, हिन्‍दी, मैथिली, बिहारी, बंगला, तमिल, तेलुगू, उड़िया, गढ़वाली, कुमाउंनी आदि प्रादेशिक भाषाओं का भाषाई एकता के रूप में जो प्रयोग हिन्‍दी लेखन-सृजन में सर्वश्रेष्‍ठ तरीके से हो रहा था उसमें उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं ने एक भाष्‍य-रुकावट उत्‍पन्‍न कर दी। इन भाषाओं के शब्‍दों का हिन्‍दी और संस्‍कृत से निकली प्रादेशिक भाषाओं के शब्‍दों के साथ जो विवशतापूर्ण मेल हुआ उसने हिन्‍दी की उपयोगिता, स्‍वच्‍छंदता, स्‍वाध्‍याय आधारित उसके शिक्षण और उसके प्रति भाषाई आकर्षण को सीमित कर दिया।
       
        जब कहा जाता है कि आम बोलचाल की भाषा में लिखना चाहिए, यह भाषा लोगों को आसानी से समझ आती है और इसी से आम लोगों को विद्वतजनों के सोचने-समझने के तौर-तरीके सीखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, तब मन में एक सहज जिज्ञासा प्रकट होती है कि क्‍या वास्‍तव में आम बोलचाल की भाषा लिखने योग्‍य है, क्‍या वास्‍तव में विद्वतजनों का सोचने-समझने का तरीका सीखने-सिखाने योग्‍य है और क्‍या आम लोगों के अनुसार भाषा निर्धारित करने के स्‍थान पर समाज के विद्वानों का यह कर्तव्‍य नहीं कि वह श्रेष्‍ठ भाषागत व्‍यवहार आम लोगों को सिखाएं?
       
        आम बोलचाल में तो अपशब्‍दों, अश्‍लील बोलियों-गालियों, निर्लज्‍ज बातों, असभ्‍य लोकोक्तियों और बिना किसी सशक्‍त भाषाई आधार के ऐसी मिश्रित भाषा बोली जाती है, जिसे सुनकर लगता है कि क्‍या भाषा के रूप में समाज में व्‍याप्‍त इन भाषाई विकारों के साथ समझौता कर लिया जाना चाहिए? आज जिस तरह लोग सामान्‍य भाषा व्‍यवहार करते हैं, उसका प्रयोग तो केवल उपन्‍यास, कथा-कहानियों में समाज के सच को व्‍यक्‍त करने के लिए किया जा सकता है। समाचारपत्रों और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया वालों को तो ऐसी भाषा रचनी चाहिए जो सभ्‍य समाज का एक अंग बने। जिसका प्रयोग करते समय लोगों को अपने जीवन में भाषाई उत्‍कृष्‍टता का अनुभव हो।
       
        फि‍र जिस जेएनयू के पोषक वामपंथ के कारण (दरअसल, लिहाजा, बहरहाल, मसलन जैसे शब्‍द वास्‍तव में, इसलिए, जो भी है, जैसे के स्‍थान पर) हिन्‍दी की देवनागरी लिपि में बिना किसी विचार के लिप्‍त हो गए और निरंतर प्रयोग में बने हुए हैं, उनका उद्देश्‍य तो आम बोलचाल के रूप में केवल उर्दू और अंग्रेजी का मिश्रण परोसने से था। 'नाबालिग', 'हिरासत', 'गिरफ्तार', 'तनख्‍वाह' जैसे कई उर्दू-अरबी शब्‍दों को आम बोलचाल की भाषा के शब्‍दों के रूप में स्‍वीकार कर लिया जाता है लेकिन 'अवयस्‍क', 'कारावास', 'अभिरक्षा' 'वेतन' जैसे सहज-सरल-सुनियोजित हिन्‍दी शब्‍दों को मेरे जैसे लोगों द्वारा अपने आम जीवन में और भीतर हृदय में अनुभव किए जाने के उपरान्‍त भी आम बोलचाल की भाषा के रूप में अधिमान नहीं मिलता। मैं एक गंभीर व्‍यक्ति हूं। जो कुछ सोचता हूं और सोचने की प्रक्रिया में भाषा का जो प्रवाह होता है उसमें लिहाजा, दरअसल, बहरहाल जैसे शब्‍दों के लिए कोई स्‍थान नहीं होता। ऐसे में मैं अपने हृदय की भाषा के स्‍थान पर संवाद, लेखन के लिए बाहरी या मुझे अरुचिकर भाषा कैसे लिखूंगा या लिख सकता हूं?
       
        भाषा के विषय में उदारता अपनाने की बात होती है तो यह शर्त केवल समस्‍त भारतीय भाषाओं का सौंदर्यगत और शिल्‍पगत प्रतिनिधत्‍व करनेवाली भाषा हिन्‍दी के लिए ही क्‍यों हो? अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं में तो हिन्‍दी के लिए उदारता नहीं दिखाई जाती। इन भाषाओं की लिपि में कहीं या कभी भी 'सूर्य', 'शशि', 'नभ', 'प्रकृति' आदि शब्‍दों का उल्‍लेख नहीं किया जाता। तब सारे भाषाई प्रयोग हिन्‍दी में ही क्‍यों हों? विशेषकर जब हिन्‍दी भाषा अपने आप में हर कोण से सशक्‍त हो तब तो इसमें कई कमजोर आधारों पर खड़ी भाषाएं सम्मिलित करके इसे सुदृढ़ नहीं शक्तिहीन ही किया जा सकता है।
       
        जब कोई लेखक साहित्‍य या पठन-पाठन की प्रवृत्ति में स्‍वानंद प्राप्‍त करने लगता है तो उसे मेरे द्वारा उठाई गई उपर्युक्‍त भाषाई आपत्तियां अवश्‍य दिखनी शुरू हो जाती हैं। अपने किसी जैव या जीवन-निर्वाह हित के कारण वह इन आपत्तियों का प्रत्‍यक्ष विरोध भले न करता हो, किंतु कहीं न कहीं उसके हृदय में खटास तो पड़ ही जाती है कि अन्‍य भाषाओं के विचित्र शब्‍दों को मिलाकर हिन्‍दी के साथ भाषाई दुराग्रह तो चल ही रहा है। 
       
        हिन्‍दी भाषा के शब्‍दों में शब्‍द के अर्थ उसके एक, दो, तीन, चार या कितने ही अक्षरों में छिपे होते हैं। भाषा विज्ञानी इनका सन्धिविच्‍छेद कर इनका समानार्थ सुगमता से जान सकता है। शब्‍दों के ये समानार्थ आवश्‍यक नहीं कि जीवन में इनकी व्‍यवहारगत घटनाओं के बाद ही दृष्टिगोचर हों। हिन्‍दी शब्‍दों के अंतर्निहित अर्थों में ही इनके मूल, गूढ़ और समाजोपयोगी अर्थ गुप्‍त रहते हैं। समझ, विवेक तथा बुद्धि शक्ति से इनकी जानकारी हो जाती है। जबकि इनके विपरीत अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के शब्‍दार्थ हम बचपन से ऐसे शब्‍दों के व्‍यवहारगत वाड.मय, इनसे संबंधित वस्‍तुओं के नामों और संबंधित परिघटनाओं के कारण ही जान पाते हैं। ऐसी भाषाओं में प्रयोग होनेवाले शब्‍द अपने भीतर कोई सहज, प्राकृतिक अर्थ नहीं रखते। इनके अर्थों को जीवन में घटनेवाली कृत्रिम घटनाओं के संकेतों या वास्‍तविक घटनाक्रमों के आधार पर ही समझा जा सकता है।

        आजकल हिन्‍दी प‍त्रकारिता में एक नई वाक्‍य रीति चल रही है। इसमें स्‍त्रीलिंग संज्ञा की प्रथम और द्वितीय दोनों क्रियाओं को पुल्लिंग क्रिया-शब्‍दों से जोड़ कर लिखा जा रहा है। निस्‍संदेह यह भाषा प्रयोग कुछ प्रदेशों में बोली के रूप में स्‍वीकार है, लेकिन जहां हिन्‍दी को लिखने की बात है तो उसे राजभाषा के अनुसार ही लिखा जाएगा। 'धारा बह रहा है', 'कीमत चुकाना पड़ा' जैसे वाक्‍य प्रादेशिक वाक्‍य प्रयोग हैं। किन्‍हीं अंचलों में ऐसा बोला जाता है। लेकिन राजभाषा के नियमानुसार लिखने के लिए इन्‍हें 'धारा बह रही है', 'कीमत चुकानी पड़ी' ही लिखा जाएगा। आंचलिक स्‍तर पर भाषा को इस तरह बोलने का गलत प्रचलन भी हिन्‍दी और इसकी प्रादेशिक भाषाओं में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के आने के कारण ही हो रहा है। हिन्‍दी भाषा का इस प्रकार का भाषाई प्रयोग करने से हिन्‍दी का पारं‍परिक शिल्‍प-सौंदर्य तो बिखरता ही है, उसके प्रादेशिक भाषांश भी व्‍याकरण के स्‍तर पर गलत होने लगते हैं।

विकेश कुमार बडोला

3 comments:

  1. ये बात केवल भाषा पर ही नहीं ... कई विषयों पर लागू होती है ... अपने त्य्हार, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति हर बात में केवल समझौता ही करना पढता है और आज के तथाकथित बुद्धिजीवी इसको प्रगतिशीलता मानते हैं और शोर मचाते हैं ... अपने समाज को जागना होगा ... सीरियसली सोचना होगा ...

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  2. बहुत ही उम्दा ..... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... Thanks for sharing this!! :) :)

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  3. संवेदना का सशक्त स्वर मुखरित है । संभवतः मैं भी इन बिंदुओं पर अटकती हूँ । प्रभावी आलेख के लिए आभार ।

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