Tuesday, October 11, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर ओछी राजनीति असहनीय

भारत में घुसपैठ करने की कोशिश के चलते नियंत्रण रेखा के पार पीओके में एकत्रित आतंकियों को सेना की सर्जिकल स्ट्राइक (सीमित सैन् कार्रवाई) में मार गिराने के बाद पूरा देश जब उड़ी आतंकी हमले में शहीद 19 सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि देने की स्थिति में हो, देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो और उसी दौरान कुछ विपक्षी दलों के नेताओं तथा फिल् उद्योग से जुड़े कलाकारों की देशविरोधी ओछी बयानबाजी सर्जिकल स्ट्राइक को तब तक फर्जी बताने के रूप में हो जब तक कि उन्हें इसके साक्ष् उपलब् करा दिए जाएं तो इसे क्या समझा जाए। क्या यही कि उन्हें देश में केंद्र सरकार, सेना तथा बहुसंख्यक सैनिकप्रिय जनता के लोकतांत्रिक अधिकार का अपमान अनादर ही करना है? क्या उनके लोकतांत्रिक रूप से राजनेता चुने जाने का कूटार्थ सर्जिकल स्ट्राइक के संदर्भ में उनके देशविरोधी वक्तव् को ध्यान में रख यही समझा जाए कि वे कहीं या किसी किसी रूप में राष्ट्रविरोध के लिए ही सत्तासीन हुए? जो भी है आज देश में इस संबंध में एक नई राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है, जो देश के सर्वांगीण विकास और विकास के आधार पर प्राप्त हो सकनेवाले राष्ट्रगौरव की भावना से कोसों दूर तथा सर्वथा निरर्थक है।   
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेसी नेता पी. चिदंबरम तथा संजय निरुपम के बाद राहुल गांधी और कपिल सिब्बल ने जिस तरह सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह व्यक् करते हुए अपनी बात कही, उससे साफ पता चलता है कि देश में कांग्रेस के नेतृत् में विपक्षी राजनीतिक दलों की येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने की लिप्सा कितने खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है! केजरीवाल सहित लगभग उन सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, जो सर्जिकल सट्राइक के साक्ष् मांग रहे हैं, को भला ऐसे राष्ट्रविरोधी वक्तव्यों के बाद नैतिक आधार पर लोकतांत्रिक देश का जनप्रतिनिधि कैसे स्वीकार किया जा सकता है! क्या केंद्र सरकार तथा न्यायपालिका को संविधान की धाराओं को, इस परिस्थिति में राष्ट्रविरोधियों को दंडित करने के लिए, अत्यंत लचीला करने की आवश्यकता नहीं, जब कुछ राजनेता अपने राष्ट्र, इसकी सैन् शक्ति तथा इसके केंद्रीय राजनैतिक नेतृत् को लेकर एक प्रकार से दुश्मन देश पाकिस्तान के मिथ्या प्रचार का हिस्सा बनने को अति उत्सुक हैं।
जो पाकिस्तान दशकों से भारत पर छदम युद्ध थोपता रहा, भारत में आतंकवाद का प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ जब-तब निर्दोष भारतीय सैनिकों नागरिकों का रक् बहाता रहा वह भला कैसे दुनिया की दृष्टि में एक विश्वसनीय देश रह सकता था। अपनी आतंकी नीतियों तथा इनके क्रियान्वयन के लिए सदैव तत्पर पाक किसी किसी रूप में दुनिया के अधिकांश देशों को चुभता रहा है। लेकिन मोदी सरकार से पूर्व की केंद्र सरकारें हमेशा ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को समझौतों तथा वार्ताओं के माध्यम से निपटाने की पक्षधर रहीं। हालांकि यह प्रयास मोदी सरकार ने भी किया। बल्कि इस सरकार ने तो पाक के साथ पूर्व की सरकारों से भी श्रेष् नवीन तरीकों से परस्पर सद्भावना बढ़ाने के अनेक प्रयास किए। परंतु जब पाक की नीयत में ही जन्मजात तथा धर्मांध खोट हो तो कहना चाहिए कि उसे साक्षात ईश्वर भी पड़ोसी राष्ट्र के साथ प्रेम शांति से रहने के लिए नहीं समझा जा सकता।
भारत पर पाक द्वारा किए जाते रहे आतंकी हमलों तथा इसके बाद भी भारत की दोस्ती के प्रस्तावों पर उसके द्वारा हमेशा किए गए विश्वासघात के कारण कांग्रेसी नेतृत् की सरकारें उसके खिलाफ विश्वभर में वैसा विरोधी वातावरण कभी नहीं बना पार्इं, जैसा भाजपा की मोदी सरकार ने बना दिया। पिछले दो-ढाई वर्षों में मोदी की विश् बिरादरी में जैसी राजनीतिक कूटनीतिक पकड़ रही आज उसके फलस्वरूप ही पाकिस्तान अपनी आतंकवाद संरक्षण की दुर्नीति के कारण विश् के लगभग सभी देशों की नजर में कुत्सित तथा नकारात्मक राष्ट्र बनकर उभरा है। बल्कि इस समय तो विश् के वह देश जो संयुक् राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर अनेक अन् वैश्विक मंचों का प्रतिनिधित् करते हैं तथा जिन मंचों की सदस्यता के लिए दूसरे देशों को अभी पता नहीं कितना परिश्रम करना पड़ेगा, उनकी दृष्टि को भी नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के संदर्भ में उसी रूप में मांझ डाला, पाक को हर मोर्चे पर परास् करने के जिसकी आज भारत को अत्यंत आवश्यकता है।
आज जब अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, ब्रिटेन जैसी वैश्विक महाशक्तियां भी भारत के साथ विकास की धारणाओं को ही नहीं अपितु जग कल्याण के प्रति उसके सामाजिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण को भी सम्मानपूर्वक अंगीकार करने की स्थिति में हैं तथा ये महाशक्तियां किसी किसी रूप में भारत के चहुंमुखी ज्ञान योग्यता के गुणात्मक लाभों को अपने देशों में आयात कर रहे हैं यदि उस समय हमारे अपने देश के मोदी विरोधी विपक्षी राजनीतिक दलों के नेता पाकिस्तान के इस कथन का समर्थन करते हैं कि पीओक में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक फर्जी थी, तो इन परिस्थितियों में देश के सभ् देशभक् नागरिकों के सम्मुख ऐसे नेताओं को सबक सिखाने का तरीका केवल लोकतांत्रिक चुनावों में उनके विरुद्ध मतदान करने तक ही सीमित नहीं हो सकता। इन परिस्थ्ितियों में तो जनता कहीं ऐसे नेताओं इनके समर्थकों के प्रतिमारो-मारोका अभियान छेड़ दे। क्योंकि इन्होंने लोकतंत्र के अधीन सत्ता संचालन को इतना निम् स्तरीय अभ्यास बना दिया है कि एक समझदार विवेकवान व्यक्ति अब कम से कम लोकतांत्रिक मान्यताओं को मानते हुए तो ऐसे लोगों को बर्दाश् करने की स्थिति में कदापि नहीं है।
नेता ही नहीं बल्कि खुद को कलाकार कहने वाले चित्रपट के कुछ अभिनेता तथा वामपंथी बुद्धिजीवी से लेकर वामपंथी विद्यालयों विश्वविद्यालयों के छात्रों की दृष्टि में विद्वता की जो धारणाएं आज बनी हुई हैं वह अत्यंत विरोधाभासी तथा देश के लिए सर्वथा अनुपयोगी और घातक मंतव्यों पर आश्रित हैं। ऐसे में इनका नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी या कलाकार होना अपनेआप में ही व्यर्थ-निरर्थ हो जाता है। वास्तव में ढाई वर्ष पहले तक लोकतंत्र के नाम पर केंद्र शासन के साथ तमाम क्षेत्रों के अगुवा तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों की भ्रष्टाचार अवैध मुद्रा लेन-देन के संबंध में एक गुप्तनीति चल रही थी। इस शीर्ष स्तरीय गुप् षडयंत्र के तहत भारत को हिन्दू धर्म-संस्कारों से विमुख करने का यह कुचक्र पिछले दशकों से सुगमता से चल रहा था। साथ ही भारत इसके धर्मविरोधी ऐसे षडयंत्रकारी बाह्य रूप से जनसाधारण के लिए महानता की प्रतिमूर्ति भी बने हुए थे। ऐसे लोगों के समस् कल-कपट धत्क्रर्मों पर मोदी सरकार के आने के बाद बहुत अधिक नियंत्रण होने लगा था। और जैसे-जैसे मोदी सरकार के निरंतर केंद्र में बने रहने के साथ-साथ राज्यों में भी शासन करने की संभावनाएं समाज में व्याप् हो रही हैं, ऐसे लोग बुरी तरह छटपटा रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप इन्होंने किसी किसी कारण मोदी सरकार को नीचा दिखाने की साजिश रची है। लेकिन ऐसे राजनेताओं और इनके साधारण तथा विशिष् कलाकार, बुद्धिजीवी रूपी समर्थकों को देश पर आसन् आतंकी युद्ध संकट के समय इस तरह का क्षुद्र राजनीतिक व्यवहार नहीं करना चाहिए। इससे दुश्मन देश की कूटनीतियां हमारे विरुद्ध एक नए ढंग से बढ़ जाती हैं।
केजरीवाल जैसे नेताओं को एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़नेवाले व्यक्ति के रूप में सम्मान देकर उनके साथ जुड़े लोगों को अब उस जुड़ाव प्रभाव से बाहर निकल आना चाहिए। नागरिकों को नागरिक के रूप में सर्वप्रथम उस देश के लिए एकजुट होने का विचार रखना चाहिए जिसके वे नागरिक होते हैं। और अगर इसमें उनका संदेहास्पद जननायक बाधा उत्पन् करता है या राष्ट्र विरोधी आचार-व्यवहार करता है तो उन्हें उसका मंतव् समझकर शीघ्र ही उससे किनारा भी कर लेना चाहिए। इस समय जब देश पर शत्रु का आतंक के रूप में प्रकट संकट प्रबल हो, समस् देशवासियों को विभिन् राजनीतिक दलों के साथ अपने हित जुड़े होने के कारण ही उनका अंधसमर्थन नहीं करना चाहिए। यदि केंद्र की मोदी सरकार उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छा पूर्ण नहीं करती तो कोई बात नहीं। उन्हें तो इस समय सिर्फ इतना देखना है कि यह सरकार देश के लिए शक्तिसंपन् होकर दुश्मन राष्ट्र के आतंकियों से लोहा ले रही है। इसी आधार पर सभी लोगों को मोदी सरकार का साथ निभाना चाहिए। इस समय देश के भीतर राजनीतिक भितरघात करनेवालों या देशविरोधी हरकतों के आधार पर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करनेवालों को लोकतांत्रिक नियमों से परे जाकर कठोरता से सबक सिखाए जाने की अत्यंत जरूरत है। इसी में देश लोकतंत्र की दीर्घकालीन भलाई निहित है।  
विकेश कुमार बडोला

4 comments:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 13/10/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

    ReplyDelete
  2. सटीक और सार्थक विश्लेषण .....

    ReplyDelete
  3. सार्थक और सटीक विश्लेषण ... पिछले ६०-६५ वर्षों में वामपंथी विचारों ने कांग्रेस की छत्रछाया में देश के विनाश के बीज ही बोये हैं ... रही सही कसर देश के बिकाऊ और चाटुकार मीडिया ने पूरी कर दी है ... शर्म बात है की आज लगभग पूरा विपक्ष एक तरफ हो के ऐसे सबूत मांग रहा है ...

    ReplyDelete
  4. घिनौनी राजनीति की पराकाष्ठा है ये सब ।

    ReplyDelete