Sunday, September 4, 2016

विकास के विरोधाभासी सिद्धांत

मूल रूप से यह आलेख 4 सितंबर 2016 को दैनिक जागरण
के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हो चुका है
गुलाम कश्‍मीर के संदर्भ में भारतीय नीति निर्धारकों का य‍ह निर्णय विरोधाभासी ही कहा जाएगा कि उसने पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर से विस्‍‍थापित 36,348 परिवारों का चयन कर उन्‍हें प्रति परिवार 5.5 लाख रुपए की अनुदान राशि देने पर विचार आरंभ कर दिया है। सरकार इस विशेष राहत अनुदान की घोषणा प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर करेगी। यह अच्‍छी बात है कि कोई राष्‍ट्र अपने यहां दूसरे देश से आए शरणार्थियों को सुख-सुविधाएं प्रदान करेलेकिन ऐसे में कुछ प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से उठते हैं कि क्‍या ऐसा कोई भी राष्‍ट्र जो प्रवासियों को अनुदान देने की बात कर रहा हैपहले उसे अपने मूल नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा नहीं उठाना चाहिए? क्‍या उसे सर्वप्रथम अपने राष्‍ट्र के लोगों की निर्धनता,असहायता और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा के बारे में विचार नहीं करना चाहिए?
एक ओर दाना मांझी जैसे भारतीय नागरिक हैंजिन्‍हें अपनी मृत पत्‍नी का शव घर ले जाने के लिए सरकारी वाहन उपलब्‍ध नहीं हुआ तथा अंततवह अपनी पत्‍नी का शव अपने कंधे पर लादकर ले जाने को विवश हुआ और दूसरी ओर गुलाम कश्‍मीर से आए हजारों लोगों के लिए हजार करोड़ अनुदान देने की योजना। क्‍या इन दो बातों से हमें अपने राष्‍ट्रीय नेताओं की देश-समाज-नागरिकों के प्रति एक ऐसी विरोधाभासी दृष्टि परि‍लक्षित नहीं होतीजिसमें हम गहराई तक यह सोचने को विवश होते हैं कि अभी भारत के वैकासिक मानदंडों में दूरदर्शितापरिपक्‍वता और न्‍यायिक चेतना की बहुत अधिक कमी है।
वैज्ञानिक तथा आर्थिक सिद्धांतोंधारणाओं के आधार पर विकास के स्‍वप्‍न देखनेवाले विकसित देशों ने अपने यहां विकास की पहली शर्त के रूप में जनसंख्‍या नियंत्रण का उपाय अपनाया। कालांतर में अत्‍यधिक विकसित होने या सर्वाधिक विकसित राष्‍ट्र बन जाने की महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के कारण भले ही उन्‍हें अपने वैज्ञानिक और भौतिक उत्‍पादन के उपभोग के लिए विशाल जनसंख्‍या वाले देशों की ओर ताकना पड़ापरंतु उन्‍होंने इन महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के दुष्‍परिणामों पर विचार नहीं  कियाजिसकी परिणति आज कई स्‍तरों पर आतंक-अव्‍यवस्‍था से घिरे विश्‍व के रूप में सामने है। कहने का आशय यह है कि सबसे पहले भारत को अपने देश के नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा उठाना चाहिए। इसके बाद ही शरणार्थियों को बड़ी आर्थिक देनी चाहिए। 
दाना मांझी तो एक उदाहरण है। इस देश में उस जैसे न जाने कितने स्‍वाभिमानी लोग हैं, जो कठोर परिश्रम के बावजूद अपना इतना आर्थिक मूल्‍यांकन होने का अधिकार भी नहीं रखते कि उनकी रोटी-कपड़ा-मकान की आधारभूत आवश्‍यकताएं पूरी हो सकें।
इसमें संदेह नहीं कि मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्त्‍ती सरकारों के वनिस्‍पत बहुत अच्‍छा काम कर रही है। अपने समस्‍त कार्यों के लिए वर्तमान सरकार सज्‍जनता और पारदर्शिता का आधार बनाए हुए हैजिसने जनमानस के हृदय पर छाप छोड़ी हैपरंतु वह पाकिस्‍तान और कश्‍मीर के संबंध में अंतर्राष्‍ट्रीय कूटनीतिक गोलबंदी को इतना आत्‍मघाती भी न बनाए कि यह सब कुछ हमारे अपने देश के लिए ही कई स्‍तरों पर हानिकारक सिद्ध हो।
आज तक सभी विकसित देशों ने विकास के लिए अपने देश की जनसंख्‍या को नियंत्रित रखकर ही विकासशास्‍त्र को फलीभूत किया है। इसलिए मोदी सरकार भी विकास के इस पहलू पर अवश्‍य विचार करे। कहीं ऐसा न हो कि डेमोग्राफी पर आधारित उनके वैकासिक सिद्धांत इतने उलझ जाएं कि देश में जनसमस्‍याएं एक नया आकार ले लें। वैसे भी वे अपने समस्‍त सिद्धांतों को तब ही लागू कर पाएंगे जब उन्‍हें भविष्‍य में लोकतंत्र का बहुमत मिल पाएगा। क्‍योंकि गुलाम कश्‍मीर के लोगों को अनुदान की भारी राशि वितरण जैसी उनकी कार्य योजनाएं बड़े स्‍तर पर उनके लोकतांत्रिक आधार को दरकाने का काम भी कर सकती है।
  विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. जैसा कि आपने स्वयं लिखा है ... ये अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति का अंग ज़्यादा लगता है न की कश्मीरी शरणार्थियों की मदद ... पर सहमत हूँ आपकी बात से पहले देश के लोगों का स्तर ठीक होना चाहिए फिर बाक़ी कुछ ....

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  2. सबसे पहले भारत को अपने देश के नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा उठाना चाहिए। इसके बाद ही शरणार्थियों को बड़ी आर्थिक देनी चाहिए। दाना मांझी तो एक उदाहरण है। इस देश में उस जैसे न जाने कितने स्‍वाभिमानी लोग हैं, जो कठोर परिश्रम के बावजूद अपना इतना आर्थिक मूल्‍यांकन होने का अधिकार भी नहीं रखते कि उनकी रोटी-कपड़ा-मकान की आधारभूत आवश्‍यकताएं पूरी हो सकें। .. सटीक बात कही आपने .. काश कि देश की बागडोर सँभालने वाले यह बात कभी फर्स्ट में अच्छे से समझ पाते ...
    बहुत सार्थक चिंतनशील प्रस्तुति .. प्रकाशन पर बधाई!

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  3. बहुत सटीक चिंतन...

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  4. सार्थक एवम सामयिक लेख

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  5. बहुत ही उम्दा ..... Very nice collection in Hindi !! :)

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  6. ये तो वही बात हुई कि घर की आग पर काबू ही नहीं चले पड़ोस बुझाने । नीति निर्धारण करने वाले को किस भाषा में ये बातें समझाई जाए ?

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  7. आगे-आगे देखिये होता है क्या!

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