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Tuesday, August 16, 2016

राजनीति विकासपरक हो विवादास्पाद नहीं

विश्‍व गुरु बनने के लिए किसी भी देश के वासियों की जीवन के प्रति एक स्‍पष्‍ट और सुखद सोच होनी चाहिए। भारत में राजनीतिक मंशाएं नेताओं को यह भाषण देने के लिए तो जरूर प्रेरित करती हैं कि हम तरक्‍की और उन्‍नति करेंगे तथा विश्‍व गुरु बनेंगे परंतु तरक्‍की और उन्‍नति कैसे करेंगे या विश्‍व गुरु कैसे बनेंगे, इस बारे में हमारा सार्वजनिक रूप से कोई ठोस कार्यक्रम नहीं होता। यह आशा की गई थी कि संसद के दोनों सदनों में सांसद मानसून सत्र में देश और जनता के कल्‍याणार्थ आवश्‍यक विधेयकों पर विचार-विमर्श कर इन्‍हें पारित करेंगे। उनसे जनप्रतिनिधि के रूप में यह अपेक्षा है कि वैश्विक रूप से कृत्रिम व प्राकृतिक समस्‍याओं से घिरी दुनिया में वे अपने देश को हर तरह से सुरक्षित रखने की दिशा में काम करेंगे। लेकिन ओछी राजनीति के दम पर सत्‍ता हथियाने वाली क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए विषय राजकाज नहीं अपितु उन अनावश्‍यक और नगण्‍य मुद्दों पर संसद का ध्‍यानाकर्षण कराना है, जो कहीं भी विचारयोग्‍य नहीं होने चाहिए। विश्‍व में इस समय बड़ा मुद्दा आतंकवाद है। यूरोपीय संघ के कई देश प्रत्‍यक्ष आतंक की चपेट में हैं। अमेरिका, इंग्‍लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, तुर्की जैसे विकसित देश और बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान के कारण भारत जैसे देशों में भी आतंकवाद तेजी से पैर पसार रहा है। इसके साथ ही वर्ष के बारह महीनों में विश्‍व के तमाम देशों के साथ भारत भी जलवायु विघटन का शिकार बन रहा है। भूकंप, अतिवृष्टि, तापमान वृद्धि और अप्रत्‍याशित प्राकृतिक असंतुलन से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इन परिस्थितियों में देश के जनप्रतिनिधियों को देश-दुनिया और इसके लोगों के प्रति एक समग्र कल्‍याण भावना और मानवीय दृष्टिकोण रखकर काम करने की अत्‍यंत जरूरत है। लेकिन नहीं उनका ध्‍यान अभी भी जातिवाद, नटखटपन से ग्रसित और एकदम नौसिखिया राजनीति करने पर लगा हुआ है।
पड़ोसी देश पाकिस्‍तान के कारण कश्‍मीर में भारत के सामने आतंकवाद से निपटने की बड़ी चुनौती है। इस बाबत भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र जैसे मंच के माध्‍यम से पाकिस्‍तान को कठोर शब्‍दों में चेतावनी भी दे दी है कि वह भारत के अंदरूनी मामलों में हस्‍तक्षेप न करे और न इसके लिए अपनी आतंकवादी नीति का इस्‍तेमाल करे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्‍वरूप ने स्‍पष्‍ट रूप से कह दिया कि पाकिस्‍तान गुलाम कश्‍मीर खाली करे। इस चेतावनी से पहले भारत ने भारत-चीन सीमा पर अपने 120 युद्धक टैंक तैनात कर दिए थे। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में चीनी सैन्‍य गतिविधि भी सीमा पर बढ़ गई। चीन गुलाम कश्‍मीर के एक भाग और दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक रत्‍नों से पूर्ण समुद्री क्षेत्र को हथियाने के चक्‍कर में है। इसके लिए उसने अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कई बार प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से पाकिस्‍तान की आतंकी नीति पर कभी कुछ नहीं बोला, बल्कि चुप्‍पी साध कर ही रखी। वह पाकिस्‍तान के माध्‍यम से भारत पर प्रत्‍यक्ष व परोक्ष युद्ध थोपना चाहता है। चूंकि पाकिस्‍तान और भारत की दुश्‍मनी कई दशक पुरानी है इसलिए चीन दोनों देशों के इस वैमनस्‍य का फायदा उठाकर गुलाम कश्‍मीर के एक  भाग पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है। मुसलिम मत को सारी दुनिया पर थोपने की भ्रांति से ग्रस्‍त आइएस आतंकवाद का केंद्र बनकर यूरोप से  लेकर एशिया-अफ्रीका तक किसी न किसी रूप में आतंकवाद फैला रहा है। दुश्‍मन देशों के बीच युद्ध की आशंका के मद्देनजर आइएस अपनी आतंकवादी गतिविधियों का इस्‍तेमाल वैश्विक युद्ध भड़काने के रूप में भी कर सकता है।
कहने का तात्‍पर्य यही है कि जब किसी न किसी बहाने पूरी दुनिया तीसरे विश्‍व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है और इस कारण विकसित और विकासशील देशों के अलग-अलग विकास संबंधी मानक भी आधुनिकता की उपयोगिता के नहीं बल्कि विसंगति के सूत्रधार बन गए हों, तो ऐसे में किसी देश के भीतर जाति, धर्म, आरक्षण और अनेक दूसरे अनुपयोगी वाद-विवाद में संसद से लेकर सड़क तक शोर होना क्‍या सिद्ध करता है। यह यही बताता है कि अभी हम ठीक से किसी लोकतांत्रिक देश के एक सामान्‍य नागरिक होने की योग्‍यता भी अर्जित नहीं कर पाए हैं।
अपने लिए वर्णसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल किए जाने पर बौखलाई बसपा नेता मायावती और उनके दल के एक अन्‍य नेता का संसद में किया गया कथन बड़ा विचित्र था। उनके अनुसार अगर उन पर या उनकी राजनीतिक पार्टी पर की गई टिप्‍पणी से दलित लोग आंदोलन करते हैं और देश में बवाल होता है तो इसके जिम्‍मेदार वे नहीं होंगे, इसकी जिम्‍मेदारी केंद्र सरकार की होगी। एक तरह से उनके इस कथन ने उन लोगों को बवाल करने और विधि व्‍यवस्‍था को बिगाड़ने के लिए उकसाया ही है, जिनके वर्णगत प्रतिनिधित्‍व से ऐसे लोग संसद में विराजमान हैं। मायावती और उनकी राजनीति से जुड़े लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि विघटन की बातें करके उनका लोकतांत्रिक जनाधार बढ़ेगा नहीं अपितु घटेगा ही। वे अपनी जाति, विचारधारा और राजनीति से अगर निम्‍नस्‍तरीय सामाजिक वातावरण उत्‍पन्‍न करेंगी, तो दूसरी तरफ जिनसे उनका द्वेष है, वे क्‍या शांत बैठे रहेंगे। वे भी अपने स्‍तर पर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए इनसे उलझेंगे। तो ऐसे में भला लोकतंत्र का अर्थ क्‍या रह जाता है। मायावती जैसे नेताओं को सोचना होगा कि देश में राजनीतिक पद या कद उन्‍हें अधिकार नहीं देता कि वे इसके दायित्‍व, मर्यादा को भूलकर अपना राजनीतिक एकाधिकार स्‍थापित करने में ही लगे रहें। उन्‍हें राजनेता के पद की राजसेवा की अवधारणा को समझना होगा। इसी में उनकी और उनके राजनीतिक अस्तित्‍व की भलाई है।
राजनीति के कई ऐसे रूप देखने को मिल रहे हैं, जिससे लोकतंत्र और संविधान के प्रति अनास्‍था का भाव व्‍यापक होता है। आप पार्टी के सांसद भगवंत मान को ही लें। इन्‍होंने संसद भवन के भीतर का वीडिया बनाकर सोशल मीडिया साइट पर डाल दिया। यह सांसद यह तो जानता ही रहा होगा कि 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमला हो चुका है। तब एक सांसद के रूप में मान की जिम्‍मेदारी क्‍या बनती थी और उन्‍होंने क्‍या किया, इस पर उन्‍हें अवश्‍य विचार करना चाहिए। इस घटना के बाद उन्‍हीं की ही पार्टी से निलंबित सांसद हरिंंदर सिंह खालसा ने तो मान के बारे में कह दिया कि वे संसद में मदिरापान करके आते हैं और उनसे मदिरा की दुर्गंध आती है। खालसा ने बताया कि उन्‍होंने लोकसभा अध्‍यक्ष को संसद में अपनी सीट मान से अलग करने के लिए आवेदन पत्र भी दिया हुआ  है। जनतंत्र में जहां हमसे संसद और संविधान के प्रति सम्‍मान और आदर करने को कहा जाता है, वहां यदि मान जैसे व्‍यक्ति जनप्रतिनिधि होंगे तो देश की दशा-दिशा कितनी खतरनाक होगी, यह कल्‍पना ही अपने आप में घिनौनी है। कहां तो मानसून सत्र में वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक सहित कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी थी और इसके बाद इनके पारित होने की कामना की जा रही थी और कहां मानसून सत्र के पहले कुछ दिन ही निरर्थक मुद्दों में घिसट गए।   
देश के नेताओं को समझना और सोचना होगा कि सांसद-विधायक बन जाना हर्षातिरेक, प्रफुल्‍लता और मनमानी का ही विषय नहीं है। जनप्रतिनिधित्‍व ग्रहण करने का अर्थ है जनता के दैनिक जीवन के लिए समय-काल-परिस्थिति के अनुसार काम करना। अगर सही जनप्रतिनिधि होगा तो भारत जैसी जीवन-परिस्थितियों में तो उसे राजनीति में विभिन्‍न प्रकार के जनकल्‍याणकारी कामों से मरने की फुर्सत नहीं होनी चाहिए। जनता के लिए काम करने के हिसाब से भारतीय भूभाग में सांसद-विधायक बनना अभी आराम का मामला तो किसी भी कोण से नहीं है। अगर कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को विवश होकर या कानून की बाध्‍यता से निर्धारित जनकल्‍याणकारी काम समय पर पूरा करने को कहा भी आएगा, तो वे इतने चिंताग्रस्‍त हो जाएंगे कि फौरन पदमुक्‍त होने का अनुरोध करने लगेंगे। क्‍योंकि कामकाजी और खासकर ईमानदारी से काम करनेवाले राजनेता के सामने इतने सार्वजनिक विकास कार्यक्रम हैं कि वह अपने एक कार्यकाल में तो इन्‍हें, कितना ही परिश्रम कर ले, पूरा नहीं कर सकता। अब जाति, धर्म, समुदाय आदि निरर्थक मानसिक विकारों में बंटी राजनीतिक धारा को तिलांजलि देने का समय आ गया है। हम सब सोचें तो सही कि विकास का वास्‍तविक तात्‍पर्य है क्‍या। विकास भवनों, सड़कों और भौतिक सुविधाओं तक ही सीमित न हो। उसे व्‍यक्तिगत भावनाओं तक ले जाना होगा और उस से बढ़कर राजनीतिक नीतियों में अंतर्निहित करना होगा। यह सब करने के लिए हमें और हमारे राजनेताओं को चमत्‍कार करने की आवश्‍यकता नहीं, बल्कि अपनी-अपनी मानवीय अंतदृष्टि में राजनीति को एक नवीन और सर्वथा इसके मौलिक स्‍वरूप में देखने की जरूरत है।  
इसलिए हमारे राजनेताओं को अब अपने वैचारिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में तत्‍काल परिवर्तन करना चाहिए। यदि वे प्रतिपल जनता के प्रति दायित्‍व-भाव से बंधे रहेंगे तो निश्चित रूप से फि‍र कभी ऊल-जुलूल मुद्दों में नहीं उलझेंगे और ना ही इन पर वाद-विवाद करेंगे। उन्‍हें वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य में अपने देश को आगे बढ़ाने और संतुलित विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए ही प्रयासरत रहना चाहिए। तभी जनता में उनकी भावनात्‍मक स्‍वीकार्यता हो सकेगी। देश की मुख्‍यधारा की राजनीति में शामिल ऐसे तथाकथित नेताओं को यह विचार भी अवश्‍य करना चाहिए कि विश्‍व में व्‍याप्‍त प्राकृतिक और मानवजनित कृत्रिम समस्‍याएं इस सीमा तक बढ़ रही हैं कि उनके निराकरण पर ही ध्‍यान लगाकर लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और इसके अंतर्गत निर्धारित सांसद-विधायक पदों को बचाए रखा जा सकता है। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। 
विकेश कुमार बडोला

3 comments:

  1. आप नेताओं को परिवर्तन की बात कर रहे हैं पर मुझे लगता है २००४ के बाद जितनी तेजी से समाज में राजनितिक पार्टियों का पतन हुआ है ... स्वार्थपन हुआ है वैसा पिछले ५० वर्षों में नहीं हुआ होगा ... इस जटिल परिवर्तन के दौर में आज की कुछ राजनितिक पार्टिओं की बदोलत देश सबसे ज्यादा डेंजरस मोड़ पे खड़ा है ...

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  2. सार्थक विचार
    सच तो यही है ---

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