Thursday, August 11, 2016

आतंक के कारण अफस्पा की जरूरत तो आए दिन बढ़ ही रही है इसे हटाने का तो प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए

यह अालेख मूल रूप से 12 जुलाई 2016 को 
दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हो चुका है। 
र्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायधीशों ने जोर देकर कहा है कि भारत के पूर्वोत्‍तर राज्‍य मणिपुर में कभी युद्ध जैसी स्थिति पैदा ही नहीं हुई। न्‍यायाधीशों की यह टिप्‍पणी किसी संगठन की तरफ से प्रस्‍तुत जनहित याचिका में मणिपुर में सन् 2000 से 2012 के बीच हुई 1528 मुठभेड़ों को फर्जी बताने के बाद आई। एमबी लोकुर और यूयू ललित की पीठ ने इन फर्जी मुठभेड़ों की गहनता से जांच करने के आदेश देते हुए अफस्‍पा कानून और इसके प्रयोग पर ऐसी टिप्‍पणियां कीं, जिनसे इन क्षेत्रों में होनेवाली देशविरोधी गतिविधियों को प्रत्‍यक्ष झेलनेवाले लोग कभी सहमत नहीं हो सकते। जजों ने सीमांत प्रदेशों और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में सशस्‍त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्‍पा) के अंतर्गत सशस्‍त्र बल या पुलिस द्वारा अतिवादियों पर ‘ज्‍यादा या जवाबी ताकत’ के इस्‍तेमाल को गलत बताया। कोर्ट के अनुसार, ‘‘राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था आंतरिक अव्‍यवस्‍था जैसी है। इससे देश की सुरक्षा को या देश को युद्ध होने या बाहरी आक्रमण या सशस्‍त्र विद्रोह का खतरा नहीं है। आतंरिक गड़बड़ी पर काबू पाने के लिए सशस्‍त्र बल को प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की सहायता में तैनात किया जा सकता है। सशस्‍त्र बल ना‍गरिक प्रशासन का अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकता है, बल्कि उसकी मदद कर सकता है। इसका कारण यह है कि स्थिति सामान्‍य रूप से बहाल करने के लिए उसे तैनात किया जाता है। सच्‍चाई जानना अनिवार्य है ताकि कानून न्‍याय के साथ खड़ा दिखे। सच्‍चाई के लिए इसका पता लगाया जाएगा कि मुठभेड़ हुई या नहीं। और यदि हुई तो मानवाधिकार उल्‍लंघन किसने किया, पीड़ित के आश्रित के संग कैसी संवेदना जताई गई तथा इसके लिए क्‍या कदम उठाए गए। मणिपुर में आतंरिक गड़बड़ी 1958 से है। इसे करीब 60 वर्ष बीत चुके हैं।’’
मणिपुर में दशकों से लागू अफस्‍पा के संदर्भ में न्‍यायालय को अब सच्‍चाई जानने की जरूरत महसूस हुई तो यह बड़ा अजीब प्रतीत होता है। किसी भी राज्‍य की प्रशासनिक व्‍यवस्‍था अगर इतनी मजबूत होती तो केंद्र सरकार को इतने सुरक्षा बलों की इकाइयां खोलने की आवश्‍यकता ही क्‍या थी! मणिपुर राज्‍य के शासन-प्रशासन के सहयोग से जन-जन के लिए विकास कार्यक्रमों के क्रियान्‍वयन की अधिकता होती तो ऐसे बलों को विकास कामों में सहयोग देने के लिए निर्देशित किया जाता। लेकिन सब जानते हैं कि देश के राज्‍यों में शासन-प्रशासन की व्‍यवस्‍था की स्थिति क्‍या है। किसी भी राज्‍य की प्रशासनिक व्‍यवस्‍था उस राजनीतिक दल के हिसाब से तय होती है, जो वहां राज करता है। जैसे कांग्रेस, वाम और क्षेत्रीय राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि उनके राज्‍य में चिन्‍हित मु‍सलिम आतंकवादियों को पकड़ने के लिए वह अपने प्रशासन का इस्‍तेमाल करे, क्‍योंकि ऐसे राजनीतिक दल अधिकांशत: मुसलिम मतों से ही सत्‍ता प्राप्‍त करते रहे हैं। और मुसलिम बाहुल्‍य राज्‍यों में नियम-कानून और सामाजिक स्थितियां कैसी हैं, यह अब छुपी हुई बात नहीं रही। इसलिए अफस्‍पा की जरूरत इस देश में बहुत ज्‍यादा है। और यह जरूरत दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ना केवल सीमांत व पूर्वोत्‍तर राज्‍यों बल्कि हर उस राज्‍य में जहां मुसलिम वोट बैंक से राजनीतिक दल सत्‍ता हासिल कर रहे हैं, कर चुके हैं या करेंगे।
भले ही माननीय न्‍यायाधीशों सहित अन्‍य धन-साधन संपन्‍न लोगों को सुविधाओं के बीच जीवनयापन करते हुए कानून का शासन सुचारू दिखता हो, लेकिन वस्‍तुस्थिति उसे ही पता चलती है जो ऐसे क्षेत्रों में अपने दिन-रात गुजारता है। शीर्ष न्‍यायालय अफस्‍पा को निष्‍प्रभावी करने की मांग करनेवाली याचिका पर भी सुनवाई करते हुए क्‍या आए दिन जम्‍मू एवं कश्‍मीर में हो रही हिंसक झड़़पों और अतिवादियों के सुरक्षा बलों पर होनेवाले हमलों का संज्ञान नहीं ले रही? क्‍या मणिपुर के अतिवादियों का कश्‍मीर के अतिवादियों से अतिवाद फैलाने के लिए कोई संपर्क नहीं होता होगा? तो इन हालातों में मणिपुर में अफस्‍पा की जरूरत को खत्‍म करने की बात करना देशहित में कहां तक न्‍यायसंगत बैठता है?
न्‍यायाधीशों द्वारा इस विषय पर की गईं सारी टिप्‍पणियां राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त हैं। सर्वप्रथम गड़बड़ी वाले इलाका के स्‍थान पर न्‍यायाधीशों को सीधे टिप्‍पणी करनी चाहिए कि मुसलिम बहुल बस्‍ती। यदि मुसलिमों की स्‍थानीय जनसंख्‍या अधिक है तो जाहिर है उनके वोट से ही राजनीतिक दल सत्‍ता हासिल कर पाया। हमारे सामने प्रत्‍यक्ष उदाहरण है कि अवैध मुसलिम वोटरों की मेहरबानी से सत्‍तासीन होनेवाले राजनीतिक दल कालांतर में मुसलिम आतंकवादियों, नकली मुद्रा-मदिरा-मादक पदार्थों का कारोबार करनेवाले मुसलिम घुसपैठियां का खूब सहयोग करते हैं। इस क्रम में समस्‍त लोकतांत्रिक नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ती रही हैं।
आज पूरी दुनिया आतंकयुद्ध की चपेट में है। भारत जैसे देश तो आतंक की विभीषिका को झेलते हुए इसके मर्माहत भुक्‍तभोगी बन चुके हैं। आए दिन कोई न कोई देश आतंकवादियों की हिंसा में उलझता ही जा रहा है। ऊपर से विडंबना यह कि सैन्‍य शक्ति से पूर्ण देश इस अनुत्‍पादक विषय यानी आतंकी नौटंकी को सिर्फ इसलिए बर्दाश्‍त कर रहे हैं क्‍योंकि उन्‍हें धर्मनिरपेक्ष होने के सिद्धांत पर खरा उतरना है। चाहे इसके लिए उन्‍हें अपने राष्‍ट्रीय धर्म या अधिकांश व्‍यक्तियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस क्‍यों न पहुंचानी पड़े। अधिकांश देश आतंक के संपूर्ण सफाए से इसलिए हिचक रहे हैं क्‍योंकि इसमें मुसलिम समुदाय के लोग लिप्‍त हैं और उन्‍हें डर है कि आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से दुनियाभर के मुसलिमों में गलत संदेश जाएगा। मतलब दुनिया के देशों की सारी कवायद अब यही है कि मुसलिम धर्म के सार्वभौमिक प्रसार के लिए जो आतंकवाद फैल रहा है, उससे धर्म के नाम पर न निपटकर केवल आतंकवाद के आधार पर निपटा जाए। जबकि दुनिया के सशक्‍त राष्‍ट्रों को यह सोचना चाहिए कि आतंकवाद के सफाए के लिए जब तक इसके धार्मिक कारण को केंद्र में रखकर विचार नहीं किया जाएगा तब तक आतंकी हिंसा को बिलकुल नहीं रोका जा सकता। भारत सहित दुनिया के देशों का यह कोरा भ्रम ही है कि विकास की बातें और काम करके आतंकवाद सहित सभी वैश्विक दुश्‍वारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
अभी ज्‍यादा देर नहीं हुई। मानव व मानवीयता के अस्तित्‍व के लिए अब देश-दुनिया में यह धारणा स्‍पष्‍ट हो जानी चाहिए और स्‍वीकार भी होनी चाहिए कि ज्‍यादातर आतंकवादियों की धार्मिक एकाधिकार की लालसा कभी खत्‍म नहीं हो सकती। जब तक इस धार्मिक एकाधिकार लालसा पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, कुंठित आतंकवादी विश्‍व को निरंतर आत्‍मघाती राह पर धकेलते रहेंगे।
            सीमा क्षेत्र के प्रदेशों और पूर्वोत्‍तर प्रदेशों के अलावा अब तो बिहार व उत्‍तर प्रदेश जैसे राज्‍यों में भी मुसलिम धार्मिक स्‍वीकार्यता को असभ्‍यता और अहंकार के बूते सारे समाज पर थोपने का कुचक्र साफ-साफ दिखाई देता है। जो काम पहले अप्रत्‍यक्ष तरीके से होता था तथा जिसे आम आदमी तत्‍काल समझ नहीं सकता था, वह अब खुले आम हो रहा है और इस तरह हो रहा है कि स्‍थानीय पुलिस, शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं और मुसलिम गुंडागर्दी अपने मंसूबों को आराम से अंजाम तक पहुंचा देती है। कैराना और कांधला जैसे मामले अभी इस संदर्भ में ताजातरीन उदाहरण हैं।
ऐसी परिस्थितियों में सर्वोच्‍च न्‍यायालय की इस तरह की टिप्‍पणी दर्शाती है कि न्‍यायिक अवधारणाएं भारत के भौगोलिक वातावरण की वा‍स्‍तविकता से दूर मात्र सजावटी और जिल्‍दसजी पुस्‍तक में उद्धृत संवैधानिक धाराओं से ही संचालित हैं। संविधान एक काल विशेष की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार तैयार होना चाहिए। संविधान निर्माता अपने काल में कहीं भी यह उद्धृत करके नहीं गए कि कालांतर में अगर सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-पर्यावरणीय स्थितियां आत्‍मघाती होने लगें तो संविधान में संशोधन मत करना। संविधान को कालखंड के हिसाब से लचीला होना चाहिए। और इसलिए इस समय संविधान को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार तुरंत बदल दिया जाना चाहिए।
अफस्‍पा हटाने के बारे में न्‍यायालय जिस जनहित की बात कर रहा है, वह यहां आकर भी जुड़ता है कि इस दौरान कितने ही सैन्‍यकर्मी भी आंतकी मुठभेड़ों में शहीद हो गए। कोर्ट इस मामले में मुसलिम देशों के चंदों पर पल रहे ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की जनहित याचिका पर क्‍यों त्‍वरित कार्रवाई करता है, जो भारत में कार्यपालिका के देशहितैषी निर्णय (अफस्‍पा लगाने) को न्‍यायपालिका में चुनौती देता है। और न्‍यायपालिका भी बहुलांश लोगों की देशभक्ति का संदर्भ भूलकर केवल आंतक व आतंकियों अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से उनके हितैषी स्‍थानीय लोगों के बचाव में ऐसी परिस्थिति में प्रभावी कानून को ही कठघरे में खड़ा कर देती है। ज्ञात होना चाहिए कि तीस्‍ता सीतलवाड़ जैसे समाज सेवियों के गैर-सरकारी संगठन को भी देशविरोधियों, आतंकवादियों और इनके समर्थकों का मुकदमा लड़ने के लिए भारी चंदा मुसलिम देशों से मिलता रहा है। राजग सरकार ने अब ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया है।
अफस्‍पा को मजबूती से लागू करने के मामले में यह तर्क सटीक है कि जब जाकिर नाईक से जैसे लोग धार्मिक कट्टरवाद पर प्रवचन देते हुए भारत में रहकर भारत की जड़ खोदने का काम कर रहे हैं और यदि किसी दिन इन्‍हें देशद्रोह के आरोप में पकड़कर कारागार में डाल दिया जाता है और तब इनके समर्थकों को सरकारी काम में बाधा उत्‍पन्‍न करने के लिए मुठभेड़ में मार गिराया जाता है तो यह फर्जी मुठभेड़ किस आधार पर होगी भला। और क्‍यों इस संदर्भ में अफस्‍पा हटाने की बात उठनी चाहिए। आखिर सर्वोच्‍च न्‍यायालय चाहता क्‍या है!
हिंसा होने की चिंता से अलगाववादियों को मारने पर रोक नहीं होनी चाहिए। दुनिया से जब एक से बढ़कर एक लोकोपकारी लोग चले गए और आज के लोग उन्‍हें भूलकर स्‍वार्थ सिद्धि में ही लगे हुए हैं तो आतंकवादियों के बारे में दया, सद्भावना, अहिंसा और विकास जैसे शब्‍दों के छलावे कर उन्‍हें क्षमादान देने की बात करना ही शासकों की मूर्खता है। अगर आतंकी किसी भी रूप में इस दुनिया में नहीं रहेंगे तो दुनिया के लिए यह वरदान ही होगा। जहां भारत सहित दुनिया के ज्‍यादातर देशों को जलवायु परिवर्तन से हो रही आपदाओं पर नियंत्रण के लिए चिंतन-मंथन कर अपना मौसमीय ज्ञान-विज्ञान बढ़ाना चाहिए था, अतिवृष्टियों-सूखा-बाढ़ आदि से संसार को मुक्‍त करने की चिंताओं से विचलित होना चाहिए था, वहां वैश्विक राष्‍ट्रनीतियों के केंद्र में पूरी तरह अनुत्‍पादक विषय आतंकवाद है।
सभी देश इतने संसाधन संपन्‍न हैं तब भी अपने-अपने देशों में वे आतंक को जड़मूल नष्‍ट नहीं कर पा रहे तो इसका एकमात्र कारण सत्‍ता के लिए मुसलिम ‘‘मत’’ को सुरक्षित रखकर सत्‍तासीन होने की आत्‍मघाती लिप्‍सा ही है। तो क्‍या ये समझा जाए कि जो मुसलमान नहीं हैं, उन्‍हें जीवनभर इनके आतंक और इनकी नौटंकियों पर ही अपना चिंतन केंद्रित करना पड़ेगा? क्‍या दुनिया में इसके अलावा गैर-मुसलमानों के पास कोई अन्‍य काम नहीं?
            दुनिया में हिंदू, सिख, ईसाई, आदि धर्म क्‍या व्‍यर्थ या निरर्थ हैं? यदि इन धर्मों को माननेवाले शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जी रहे हैं, तो क्‍या मुसलिमों को इस एकमात्र आधार पर ही पूरी दुनिया को आतंक के दलदल में धकेलने की छूट दी जा सकती है? दुनिया में कायदा तो ये होता कि जो धर्म मानवता की जितनी सेवा करता या अपने युवाओं को आदर्श व सभ्‍य बनाने का जितना प्रयत्‍न करता उसे ही महिमामंडित किया जाता। लेकिन नहीं, यहां तो हिंसा के पोषक और उसमें प्रत्‍यक्ष भागीदारी करनेवाले धर्म के आतंकवादी नि‍तदिन खबरों में बने हुए हैं। दुनिया में जितने भी विद्वान हैं उन्‍हें मैं ठोक-बजाकर कहता हूं कि अगर आतंकवाद पर यूं ही अपूर्ण व आधी-अधूरी कार्रवाई की जाती है अथवा आतंकियों के उत्‍पात पर ऐसे ही चुप्‍पी बनाए रखी गई तो वह दिन दूर नहीं होगा जब आधुनिकता व विज्ञान की सभी अवधारणाओं के आधार पर संपन्‍न होने का दम भरती दुनिया के ऊपर इसलाम थोप दिया जाएगा। ऐसे में आतंक का विरोध करनेवाले सज्‍जन मुसलमानों के पास भी इसलाम थोपनेवालों के साथ जाने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। इससे वे चिंतित नहीं होगें। उन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इससे एक तरह से उनके मन की मुराद ही पूरी होगी कि उनका धर्म गाहे-बगाहे पूरी दुनिया में कुबूल हो चुका है। और अगर ऐसा होगा तो फि‍र दुनिया को खत्‍म होने से कोई नहीं बचा जा सकता। प्राकृतिक आपदाओं से पहले ही दुनिया खत्‍म हो जाएगी।
आर्म्‍ड फोर्स स्‍पेशल प्रोटेक्‍शन एक्‍ट (अफस्‍पा) को हटाने की बात करनेवाले सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश शायद भूल रहे हैं कि हरियाणा में जाट आंदोलन, उत्‍तर प्रदेश के आगरा में रामवृक्ष यादव की गुंडई तथा कैराना-कांधला से हिंदुओं द्वारा बहुसंख्‍या में पलायन के पीछे अप्रत्‍यक्ष आतंकवाद ही है। इसके अलावा जम्‍मू एवं कश्‍मीर में पाकिस्‍तान के हिमायती मुसलिम समूहों व उनके नेताओं की हिमायत करनेवाले मुसलिम युवाओं द्वारा आए दिन सुरक्षा बलों पर परोक्ष युद्ध जैसे हमले करने की घटनाएं भी हमारे सामने हैं। क्‍या इन घटनाओं को स्‍थानीय पुलिस-प्रशासन नियंत्रित कर सकता है? नियंत्रण की बात छोड़ दीजिए, स्‍थानीय पुलिस या शासन-प्रशासन तो इन घटनाओं पर सिर्फ लीपापोती करता आया है। पुलिस-प्रशासन कहीं न कहीं ऐसे अतिवादियों का समर्थन ही करता है क्‍योंकि उसे उन राजनीतिज्ञों का आदेश मानना पड़ता है, जो ऐसे ही अतिवादियों के समर्थन से जीतकर सत्‍तासीन हुए होते हैं।
 इन स्थितियों में लगता है कि शीर्ष न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों के निर्णय किन्‍हीं राजनीतिक प्रतिनिधियों की राज-प्रतिष्‍ठा करने और लोकतंत्र में उनके रसातल से ऊपर उठने की सीढ़ी के रूप में होते आए हैं। कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि शीर्ष न्‍यायालय के कुछ न्‍यायाधीश भी अपने निर्णय लोकतंत्र के सर्वोपरि लोकहित को धयान में रखकर नहीं अपितु अपनी न्‍यायाधीश के रूप में नियुक्ति के एहसान का बदला चुकाने की व्‍यक्तिगत स्थिति को ध्‍यान में रखकर करते हैं। इसीलिए वे अफस्‍पा के महत्‍त्‍वपूर्ण कानून को हटानेवाली तथाकथित जनहित याचिका पर इतना गंभीर हो जाते हैं कि अधिकांश भारतीयों के दृष्टिकोण में न्‍याय व्‍यवस्‍था को ही हास्‍यास्‍पद बनाकर छोड़ देते हैं।
विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. बहुत सही . सीमा-सुरक्षा के साथ कोई समझौता नही होना चाहिये . आम आदमी की मौत तो मौत है और जो जवान शहीद होते रहते हैं उनका क्या ? यही ना कि वे आतंकवादियों से देश को बचाने की कोशिश करते हैं . उनकी शहादत पर कोई आँसू नही बहाता . वे सुरक्षा के लिये नियुक्त हैं अगर कोई उनके सन्देह में आता है तो क्या वे सुरक्षा छोड़कर यह पता लगाने में जुट जाएंगे कि वह आम आदमी है या आतंकवादी .

    ReplyDelete
  2. बहुत सटीक आंकलन..प्रतिदिन जो सैनिक आतंकवादियों से संघर्ष करते शहीद हो रहे हैं उनके समर्थन में कोई राजनीतिक दल आवाज़ नहीं उठाता. जब तक वोटों की राजनीति से ऊपर उठ कर नहीं सोचा जाएगा इस समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा.

    ReplyDelete
  3. मेरे कमेन्ट दिखाई नहीं दे रहे हैं विकेश जी आपके ब्लॉग पर ...

    ReplyDelete
  4. वही मैं सोच रहा था। मैंने पहले गूगल प्‍लस कंमेट सिस्‍टम ऑन किया और उसमें कुछ गड़बड़ी थी तो वापस उसको ऑफ कर दिया तो देखा आपके कमेंट गायब थे।

    ReplyDelete
  5. गजब का प्रवाह...

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards