Friday, July 22, 2016

महंगाई, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण अर्थव्‍यवस्‍था के सरल फ्लोचार्ट से ही संभव

भी  कुछ दिन पहले राजग शासन के दो वर्ष पूर्ण होने पर देश की दशा-दिशा के बारे में कई विद्वानों ने विभिन्‍न तरीकों से विश्‍लेषण किया। सरकार की ओर से बताया गया कि पिछले डेढ़ वर्ष में शेष विश्‍व में आर्थिक मंदी के चलते विकास दर 5 से 6-5 प्रतिशत के बीच रही। जबकि भारत की विकास दर 7-5 प्रतिशत के आसपास रही। इस बात में संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में सरकारी मद में से किया जानेवाला खर्च अत्‍यंत पारदर्शी बना है और इस कारण सरकारी मुद्रा कोष में वृद्धि हुई लेकिन फि‍र भी दो क्षेत्र ऐसे हैं जिन पर मोदी सरकार चाहकर भी अपेक्षित नियंत्रण नहीं रख पाई। पहला, दालों और खाद्यानों के मूल्‍य स्थिरीकरण में पिछले दो वर्ष में कोई विशेष उपलब्धि हासिल नहीं हुई। महंगाई का विचलन पूर्व की संप्रग सरकार के अनुसार ही बना हुआ है। किसी माह सब्जियों के मूल्‍य में अचानक आधे हो जाते हैं तो किसी माह सब्जियों के मूल्‍य दोगुने हो जाते हैं। दूसरा, सरकार की क्रांतिकारी नीतियों और योजनाओं का धरातल पर उचित क्रियान्वयन क्रांतिकारी तरीके से ही नहीं हो सका है। जैसे स्‍वच्‍छता अभियान को भारतवासी अभी भी केवल एक विचार मानते हैं और उसे केवल वैचारिक रूप से श्रेष्‍ठ मानकर इधर-उधर फैली गंदगी साफ करने को नागरिक उत्‍तरदायित्‍व की भावना से नहीं लेते। स्‍वच्‍छता की नागरिक समझ तो प्रधानमंत्री ने अनेक देशवासियों को दी लेकिन देशवासी अभी इसे अपने सार्वजनिक जीवन का एक उत्‍तरदायी अभ्‍यास नहीं बना पाए हैं। मुझे लगता है प्रधानमंत्री भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को समय से पूर्व ही समझदारी स्‍वीकार करनेवाला मानकर गलती कर रहे हैं। अभी इस देश में नए विचारों और कार्यों की नी‍तियां व योजनाएं बनाने को ही लोग बड़ी उपलब्धि समझते हैं। व्‍यवहार में इन विचारों, नीतियों-योजनाओं को लाने में अभी हमारे समाज और शासकीय अंग को बहुत समय लगेगा। राजधानी दिल्‍ली के केन्‍द्रीय स्‍थल कनाट प्‍लेस से लेकर दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैली गंदगी को देखकर तो ऐसा ही प्रतीत होता है। बड़ा अजीब लगता है जब देखता हूँ कि दिल्‍ली के कनाट प्‍लेस में ही सड़कें और सार्वजनिक स्‍थल गंदगी और अव्‍यवस्‍थाओं से पटे पड़े हैं। जिस काम यानी स्‍वच्‍छता के सार्वजनिक काम से सरकारी या निजी स्‍तर पर अवैध मुद्रा लेन-देन की बहुत कम संभावनाएं हैं, जब उसी में भ्रष्‍टाचार और अकर्मण्‍यता बुरी तरह हावी है, तो खाद्यानों की राष्‍ट्रीय मांग-आपूर्ति के संचालन में तो देश की एक बहुत बड़ी जनसंख्‍या शामिल है, तब इसमें सब कुछ दो वर्ष में दुरुस्‍त हो जाने की कामना करना ठीक नहीं होगा।
                देश में बढ़ रही महंगाई के कारकों का यदि फ्लोचार्ट बनाया जाए और इसके हिसाब से उन व्‍यावहारिक कारकों पर नियंत्रण पाने का प्रयत्‍न किया जाए तो सरकार को समझ आएगा कि भ्रष्‍टाचार अभी केवल प्रधानमंत्री कार्यालय से ही दूर हुआ है। अभी सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों और उनकी कार्यप्रणालियों या कार्य-दशाओं में श्रेष्‍ठ सरकारी-नागरिक उत्‍तरदायित्‍व का विकास नहीं हुआ है। अभी देश की सामाजिक-सरकारी-आर्थिक व्‍यवस्‍था से भ्रष्‍टाचार नहीं मिटा है और ना ही इस दिशा में कठोर निगरानी व नियामक तंत्र बनाए बिना कुछ हो सकता है।
अभी सरकार को कम से कम इन बिंदुओं पर तो नवदृष्टि डालनी ही होगी। एक, आयकर प्रणाली अभी भी पारदर्शी नहीं है। इस कारण करोड़ों-अरबों रुपया सरकारी खाते में आए बिना देश विरोधी कार्यों के लिए प्रयोग होता है। दो, आज भी अर्थव्‍यवस्‍था की परिभाषा जनसाधारण की समझ में नहीं आती। उसके दिमाग में मोटा-मोटी रेल और आम बजट की अवधारणा रहती है कि इसमें उसकी गृहपयोगी चीजें कितनी सस्‍ती या महंगी हुई। तीन, अल्‍पसंख्‍यकों के कल्‍याण के नाम पर बनी योजनाओं का सच सामने है। जिस प्रत्‍युत्‍पादन या प्रतिलाभ की इच्‍छा से सरकार द्वारा अल्‍पसंख्‍यकों के विकास पर पैसा खर्च किया जाता है उस हिसाब से लाभार्जन नहीं होता। बल्कि देशविरोधी गतिविधियों में अल्‍पसंख्‍यकों के लिप्‍त होने के बाद सरकारी और गैर-सरकारी खर्चा और बढ़ जाता है। चार, यह बड़ी अच्‍छी बात है कि मोदी सरकार के दो साल के कार्याकाल में एक भी अवैध वित्‍तीय लेन-देन नहीं हुआ। कोई घोटाला नहीं हुआ। इस महान उपलब्धि ने देश के राजकोष को बढ़ाया ही है। लेकिन विगत साठ वर्षीय अव्‍यवस्‍थाएं और अर्थव्‍यवस्‍था के नाम पर मनमानियों का नतीजा ही रहा कि अभी भी वास्‍तविकराजकोषीय घाटा पूरा होने में कई वर्ष लग सकते हैं। इन बिंदुओं पर गंभीरतापूर्वक मनन करके अर्थव्‍यवस्‍था को आम आदमी के लिए एक सहज व सरल विषय बनाया जा सकता है। ध्‍यान रहे जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक देशव्‍यापी भ्रष्‍टाचार व अवैध लेन-देन का छिद्रान्‍वेषण किसी न किसी रूप में रहेगा ही रहेगा।
                आज सरकार की ईमानदार छवि और स्‍पष्‍ट देशी-विदेशी नीतियां लोगों में लोकतंत्र का विश्‍वास बनाने में कामयाब हुई हैं। लेकिन सरकार को सोचना होगा कि रोटी, कपड़ा और मकान की आधारभूत जरूरतों को पूरा करे बिना कोई भी, कितनी भी ईमानदार सरकार जनता के गले नहीं उतरती। हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने दो वर्ष से अधिक के कार्यकाल में विभिन्‍न देशों की यात्राओं के दौरान खाद्यान से संबंधी समझौते किए। इसी के तहत देश में पिछले तीन सालों की मानसून की कमी की वजह से खरीफ की उपज न होने और उसके तहत उपजाई जानेवाली दलहनों की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने बफर स्‍टॉक बनाना भी शुरू कर दिया है। चूंकि नागरिक वस्‍तुओं की मांग और आपूर्ति पर नियंत्रण का विषय पूरी तरह केंद्र सरकार के अंतर्गत नहीं है और यह नियंत्रण राज्‍य सरकारों के कार्यकारी समन्‍वय दल के सहयोग से ही पूरा हो सकता है इसलिए महंगाई के लिए गैर-राजग राज्‍य सरकारें भी केंद्र सरकार के बराबर ही उत्‍तरदायी हैं। पिछले दो वर्षों में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री के दिग्‍दर्शन में सरकार की हर नीति व नियम को अत्‍यंत पारदर्शी बनाने का संकल्‍प है। वे चाहते हैं कि सरकार की हर नीति व नियम इतना सरल बन जाए कि इसके कार्यान्वित होने या न होने या यह जिन कारणों से कार्यान्वित नहीं हो रहा आदि बातों की जानकारी आम आदमी को एक निश्चित माध्‍यम से मिलती रहे। यदि ऐसा संभव होता है तो जो अवरोधक तत्‍व होगा उसकी पहचान सुगम हो जाएगी। ऐसे में किसी नीति के क्रियान्वित नहीं होने के लिए केवल केंद्र सरकार को जिम्‍मेदार मानने की अवधारणा से समाज मुक्‍त हो सकेगा। यह इसलिए भी जरूरी है ताकि लोगों को केवल ओछी राजनीति के लिए सत्‍ता पर काबिज राजनीतिक दलों की जमीनी सच्‍चाई मालूम हो सके और भविष्‍य में ऐसे दलों को राज्‍य या केंद्र में आने से रोकने के लिए जनता कमर कस सके।
                राजग के दो वर्ष के कार्यकाल में गरीबों और किसानों को लेकर कम से कम डेढ़ दर्जन से अधिक योजनाएं बनाई जा चुकी हैं। इनमें सिंचाई, मृदा परीक्षण, फसल बीमा, उर्वरक आदि योजनाएं तो किसानों के सर्वोपरि हित को ध्‍यान में रखकर ही बनाई गई हैं। साथ ही साथ केंद्र सरकार ने सन् 2022 तक अर्थव्‍यवस्‍था को किसानों की आर्थिक व कृषि गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय को दोगुना करने का जो लक्ष्‍य रखा है, वह केवल किसानों के कल्‍याण की ही दूरदर्शी नीति सिद्ध नहीं होगी अपितु इससे अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती प्रदान करने के लिए एक नए व्‍यावसायिक क्षेत्र का विकास भी संभव हो सकेगा। रबी व खरीफ की फसलों को जैविक प्रक्रिया से उगाने में किसानों की सहायता करके उनके उत्‍पादन के लिए आधुनिक कृषि मंडियों व अर्थव्‍यवस्‍था के निगरानी तंत्र से संचालित बाजारों या व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठानों को वास्‍तविकता के साथ किसानों के हित में अपना संचालन करने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं, वे सराहनीय हैं। इसके अलावा कृषि विविधीकरण योजना को भी किसानों के लिए सहज बनाया गया है। इस योजना के अंतर्गत किसान को उस फसल के लिए उत्‍पादन, विपणन और विक्रय के सरकार नियंत्रित मंच उपलब्‍ध कराना जिसमें वह अपना मुद्रा लाभ ज्‍यादा देखता है। इस प्रक्रिया में किसान अपनी परंपरागत फसल की ही बुवाई करने से मुक्‍त होता है। सरकार खाद्य प्रसंस्‍करण कार्यक्रम को भी किसानों की सुविधानुसार निर्धारित करना चाहती है ताकि उनकी आमदनी में उनके कृषि उत्‍पादन के साथ उसके प्रसंस्‍करण प्रक्रियाओं के कारण भी वृद्धि हो सके। 
विकेश कुमार बडोला

2 comments:

  1. योजनाएँ चाहें अच्छी हीं ... जब तक देश का जनमानस ये नहीं समझेगा की उसका कोई भला हो रहा है बाई मानेगा नहीं ... जनमानस भोला है और प्रचार तंत्र वाले चालाक ... वी मोदी की भी नबी टिकने देंगे ... २०१४ के हालात हमेशा बनेंगे ज़रूरी नबी ...

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  2. प्रजातंत्र में हमारी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा होती है. चाहे सरकार की सोच कितनी भी अच्छी क्यों न हो, बिना हमारी भागीदारी के कुछ भी नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार का मुद्दा हो या फिर सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन.

    महंगाई के नियंत्रण में मोदी सरकार की विफलता की उम्मीद नहीं थी. पर ऐसा हो रहा है जो कि दुखद है. एक और विषय जिसपर चुनाव के समय मुझे लगता था कि मोदी सरकार जरूर कुछ करेगी वो है कालाधन. वहां भी अभी तक घोर निराशा ही हाथ लगी है. मुझे उम्मीद थी की कांग्रेस सरकार के सारे करतूतों, सारे भ्रष्टाचार और वाड्रा की सारी हेराफेरी, यह सरकार उजागर करेगी और उन्हें न्यायसंगत सख्त सज़ा दी जायेगी. पर अफ़सोस ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है.

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