Wednesday, March 16, 2016

दायित्‍व सार्वजनिक व्‍यवस्‍था/स्‍वच्‍छता का

(मूल रूप से दैनिक जनसत्‍ता हिन्‍दी समाचारपत्र के
 दुनिया मेरे आगे कॉलम में बुधवार १६ मार्च २०१६ को प्रकाशित)
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सी माह एक दिन सुबह छह बजे गोल मार्किट से राजीव चौक मेट्रो स्‍टेशन तक पैदल आ रहा था। सोचा, सुबह-सुबह तो शहर यातायात की रेलमपेल और लोगों की भीड़भाड़ से मुक्‍त होकर शांत-सुंदर लगेगा। लेकिन देश की राजधानी के केंद्रीय स्‍थल कनाट प्‍लेस को सुबह-सवेरे ही अव्‍यवस्‍था और गंदगी से सना हुआ पाकर मैं भीतर तक दुखी हो गया। सोचा, जब देश की राजधानी के ये हाल हैं तो दूर-दराज के क्षेत्रों की हालत क्‍या होगी।
शहीद भगत सिंह प्‍लेस कमर्शियल कॉम्‍प्‍लेक्‍स के सामने और पास-पड़ोस की सड़कें तक दुरुस्‍त न थीं। उनमें गड्डे थे और कूड़ा-करकट फैला हुआ था। एक पार्क की लौह-चाहरदीवारी जगह-जगह से टूटी-फूटी हुई थी। पार्क में हरी घास के बजाय मिट्टी फैली हुई थी। नगर निगम के कूड़ेदान जगह-जगह पर उलटे लटके हुए और टूटे-फूटे हुए थे। आवारा कुत्‍तों की भौं-भौं दुर्व्‍यवस्‍थाओं के खिलाफ और ज्‍यादा विचलित कर रही थी। पेड़-पौधों का रूखा-सूखा स्‍वरूप देखकर उद्यान विभाग की अकर्मण्‍यता साफ परिलक्षित होती थी।
रीगल बाजार के पैदल-पथ से चलते हुए सड़क पर यह सोचकर रुक गया कि भूमिगत मार्ग का द्वार अभी खुला नहीं, यहीं से पार चला जाऊं। जैसे ही कदम बढ़ाया गलत दिशा से एक कार तेजी से आई और मेरी सांसों को अटका कर चली गई। अगर खुद को नियंत्रित नहीं करता तो कार की टक्‍कर में पक्‍का मर-मुरा जाता। याद आया कि जब केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे तक दिल्‍ली के अस्‍त-व्‍यस्‍त व अनियंत्रित यातायात से खुद को नहीं बचा पाए तो एक आम आदमी के रूप में मेरी क्‍या औकात। एक ऊपरवाले का ही सहारा है। उसी की कृपा थी जो कार की टक्‍कर से बच गया।
किसी तरह सड़क पार कर भूमिगत मेट्रो स्‍टेशन की ओर बढ़ रहा था तो फि‍र से दाएं-बाएं की टूटी-फूटी सड़कों, उनके गड्ढों में भरे गंदे पानी, पानी में मंडराते मच्‍छरों, फुटकर व्‍यापारियों और खरीदारों द्वारा फैलाई गई दिनभर की गंदगी के ढेरों पर नजर पड़ी। बहुत पश्‍चाताप हुआ कि क्‍या लोकतंत्र ऐसा ही होता है? क्‍या टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइल स्‍मार्टफोन, जनंसचार माध्‍यमों (मीडिया) में अपनी-अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते राजनीतिक दलों का विकास यही है? इसी आभासी प्रगति के घमंड से राजनीतिक दल परस्‍पर वाद-विवाद में मशगूल हैं?
सोचा, इस स्‍थान से प्रधानमंत्री और दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री कुछ ही किलोमीटर दूर होंगे। और जब वे अपने रहवास के इतने नजदीकी क्षेत्र की दुर्व्‍यवस्‍थाओं से अनभिज्ञ होकर स्‍वाभिमान व स्‍वानंद में मस्‍त हैं तो देश का तो भगवान भी मालिक नहीं हो सकता। ऐसी मन‍:स्थिति से गुजरते हुए लगता है कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था में एक आम आदमी के पास खुद को ठगा हुआ महसूस करने के अलावा क्‍या बचता है? देशव्‍यापी स्‍वच्‍छता अभियान राष्‍ट्रीय प्रधान के नेतृत्‍व में हलचल मचाता है। लेकिन आज सुबह राजधानी के केंद्रीय क्षेत्र कनाट प्‍लेस में फैली गंदगी देखकर लगा कि देश की नागरिक समझ सार्वजनिक दायित्‍वों के लिए पता नहीं कितने युगों में उत्‍पन्‍न होगी! साफ-सफाई और सद्व्‍यवहार के लिए पहले तो नागरिकों को खुद ही सचेत होना चाहिए। ऐसा नहीं हो पाता तो शासन-प्रशासन को नागरिकों को इसके लिए येन-केन-प्रकारेण जागरूक और जवाबदेह अवश्‍य बनाना चाहिए।
मैंने राष्‍ट्रीय राजधानी के मुख्‍य स्‍थल पर सुबह-सवेरे खुद अपनी आंखों से जो दुर्व्‍यवस्‍थाएं देखीं, वे मुझे भीतर तक शर्म से गाड़ गईं। मैं राष्‍ट्रीयता की भावना को तीन रंग के ध्‍वज और पुस्‍तकाकार लोकतांत्रिक संविधान के आधार पर ही कैसे महसूस कर सकता हूँ! पूरे देश में जब तक उन्‍नत सार्वजनिक व्‍यवस्‍थाएं, काम-काज, दायित्‍व-भाव, स्‍वच्‍छता दिखाई नहीं देती तब तक कोई किस तरह अपने ह्रदय में राष्‍ट्रीयता की भावना का पोषण करेगा!
हम अधिकांश भारतीय क्‍या प्रगति का नौसिखियापन नहीं ओढ़े हुए हैं? प्रगति के लिए सबको सबसे पहले अपनी-अपनी सोच को एक सार्वजनिक दायित्‍व बोध से संचित करना होगा। समाज, पास-पड़ोस में जो भी अव्‍यवस्‍थाएं हमें विचलित करती हैं, वे हमारी ही लापरवाही का परिणाम होती हैं। जिस तरह किसी के घर में साफ-सफाई के लिए सरकारी नियम नहीं हो सकते लेकिन तब भी लोग अपने-अपने घरों को भरसक साफ रखते हैं, उसी तरह की स्‍वच्‍छता-भावना लोग सड़कों और सार्वजनिक स्‍थलों के लिए क्‍यों नहीं रख सकते? उन्‍हें बाहर की सफाई के प्रति भी घर जैसी ही जागरूकता अपनानी होगी।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. नागरिक सहभागिता के बिना स्वच्छता का सपना पूरा नहीं हो सकता. जैसे आपने लिखा है. लेकिन उसके अलवा प्रशासन की कड़ी निगरानी की जरूरत भी है. कनाट प्लेस का आलम कुछ और ही होता है. जैसे ही रेड करने लोग आते है...सब दुकानवाले भाग जाते हैं. और उसके सेकंड्स बाद फिर सब आ जाते हैं. यह कड़ी निगरानी नहीं है. क्योंकि सब घूस लिए रहते हैं पहले से ही. दूसरा पहलू है ...आपको कूड़ेदान नहीं मिलेंगे... पेशाबघर नहीं होता. इसलिए चाहकर भी कई बार आप सफाई नहीं रख पाते.

    पत्तियों को जो हाल आपने देखा.....मुझे भी वह देखकर बहुत दुःख हुआ. सारे पत्ते धुंए में काले हो चुके है. उसपर धूल का बोझ.

    आपकी चिंता बिलकुल उचित है.

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  2. सब जगह एक ही हाल है. देश की राजधानी से लेकर किसी प्रखंड मुख्यालय तक हम सब वही काम करते हैं. आपने सही लिखा...

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  3. बढ़िया अभिव्यक्ति , मंगलकामनाएं एवं होली मुबारक !!

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  4. जब तक देश का हर नागरिक स्वच्छता के लिए खुद को प्रतिबद्ध नहीं मानता तब तक कुछ नहीं हो सकता। हमें पहले खुद को ही बदलना होगा। हर एक नागरिक यदि अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाए तो हमारा देश भी सुंदर रह सकता है।

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  5. सहमत हूँ आपकी बात से ... दरअसल हम प्रगति को सिर्फ पैसे से जोड़ के देखने लग गए हैं ... पैसा है तो प्रगति है ... घर में भौतिक सुविधाएं इकठ्ठा कर लीं बस ... अपनी, मन की प्रगति समाज की प्रगति को नहीं सोचते ... सफाई, मानसिक प्रगति इस तरफ कोई ध्यान नहीं देना चाहता ...

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