Wednesday, January 27, 2016

लोकतंत्र में अनारक्षित आदमी

नारक्षित आदमी

आज लोकतंत्र में गुम है

उसे तंत्र की तरफ से

इतनी भी

सुविधा नहीं

कि वह अपना दुख प्रकट करे

अपने आंसू छलकाए

अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त करे

वह देखता है

सारा तंत्र

सारी व्‍यवस्‍था

सारा लोकतांत्रिक बुद्धि-विवेक

केवल आरक्षित श्रेणी

में चढ़ने को है आतुर

जैसे वह आरक्षित श्रेणी की मदद

नहीं कर रहा हो

बल्कि उसे मदद से लाद रहा हो

आरक्षित श्रेणी के नखरे

आकाश के नितंब पर चिकोटी काट रहे हैं

आरक्षित श्रेणी के पुरखे

जिस विषमता से पीड़ित थे

वह आज तक कराह रही है

अपने वंशजों को

धन-वैभव, अधिकार सम्‍पन्‍न

देखने के बाद भी

उनका दलित विलाप

अब भी जारी है

वे लोकतंत्र के प्रमुख संस्‍थानों में

विराजकर भी

खुद को आरक्षित समझते हैं

खुद को दलित कहते हैं

अनारक्षित आज बुरी तरह

पिस रहा है

योग्‍य होकर भी आयोग्‍यता का

विरोध नहीं कर सकता

उससे उम्‍मीद है

आरक्षित लोकतंत्र को

कि वह चुपचाप

अपनी योग्‍यता पर

अयोग्‍यता को चढ़ने दे

निर्विरोध अयोग्‍यता की

स्‍थापना होने दे

चाहे अयोग्‍यता चालित

लोकतंत्र का यह चक्र

कालांतर में

आरक्षित-अनारक्षित सबको

एक ही वार से

काट क्‍यों न फेंके

10 comments:

  1. चुप और बाधित है क्योंकि योग्यता भी बाधित है।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.01.2016) को "धूप अब खिलने लगी है" (चर्चा अंक-2236)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. सटीक और सामयिक अभिव्यक्ति.... निश्चित रूप से कालांतर में नतीजे नुकसानदेह ही होंगें

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  4. वाकई बहुत दुखद स्थिति के गवाह हो रहें हैं हम और कह भी नहीं सकते .

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  5. शायद भारतीय प्रजातंत्र केवल आरक्षितों के इशारे पर नाचता है और अनारक्षित वर्ग केवल एक दर्शक बन कर रह गया है। बहुत समसामयिक और सटीक अभिव्यक्ति।

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  6. शायद भारतीय प्रजातंत्र केवल आरक्षितों के इशारे पर नाचता है और अनारक्षित वर्ग केवल एक दर्शक बन कर रह गया है। बहुत समसामयिक और सटीक अभिव्यक्ति।

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  7. शानदार रचना है सर कृपया मेरे इस ब्लॉग Indihealth पर भी पधारे

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  8. अब यही देखना है किस सरकार में इतनी इच्छाशक्ति है जो इसे खत्म कर सके. पिछले २५ सालों के विकास में सचमुच कुछ सशक्तिकरण हो पाया है क्या? भारतीय प्रजातंत्र कई मामलों में बहुत उलझा हुआ है. और उस 'वोट' के लिए क्या से क्या हो जाता है.

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  9. ये तो शायद भविष्य ही बता सके की कुछ अर्जित हुआ या होगा ... जहां तक तंत्र की बात है अब तो निराशा के भादल भी नज़र आने लगते हैं ...

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  10. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 12/02/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 210 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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