Thursday, April 30, 2015

निरंतर घटता श्रम मूल्‍य


श्रम दिवस हर वर्ष की तरह आता है और श्रमिकों के लाभार्थ प्रभावी एवं कल्‍याणकारी नीति के बने बिना चला जाता है। यह सिलसिला उताना ही पुराना है, जितनी पुरानी श्रमिकों की संघर्ष कथा और इससे मुक्ति की उनकी उत्‍कंठा। देश में श्रमिक वर्ग के लोगों के हितों के लिए लागू श्रम कानून अपनी कोरी कल्‍पना के अतिरिक्‍त कुछ नहीं हैं। इक्‍कीसवीं सदी के भारत में आज भी श्रमिकों को उनके मूलाधिकारों से वंचित रखा गया है। उस पर त्रासदी यह कि महंगाई, मंदी और गरीबी से सर्वाधिक इन्‍हीं को पीड़ित होना पड़ता है। देश में सबसे कम आमदनी के कोने पर खड़ा, अपने रहने के असंगठित क्षेत्रों में बिना नाप-जोख किए वस्‍तुओं को मजबूरन सबसे महंगी दरों पर खरीदनेवाला यह वर्ग, चौतरफा मार झेल रहा है। सरकार द्वारा इनके कल्‍याणर्थ बने कार्यक्रम ठोस समन्‍वय की कमी और भ्रष्‍टाचार से उपजी लालची कार्य-प्रणाली में उलझ कर रह जाते हैं।
श्रम कानूनों के अन्‍तर्गत श्रमिकों के हितों में से इनके प्रमुख हित रोजगार को साधने में भी हमारी सरकारें पूर्णत: असफल हैं। तब ऐसी सरकारों के तथाकथित श्रम कानूनों के अधीन हम कैसे श्रमिकों के महती विकास एवं कल्‍याण की अपेक्षा कर सकते हैं। यहां चिंता केवल सुव्‍यवस्थित और समयानुकूल रोजगार उपलब्‍ध कराने तक नहीं है। जीवन-सुरक्षा, अस्‍पताल-व्‍यवस्‍था, पढ़ाई-लिखाई, पेंशन, मार-मन्‍दी में आपातकालीन राहतें आदि अनेक ऐसी अनिवार्य आवश्‍यकताएं हैं, जिनकी श्रमिकों के लिए अब तक कोई स्‍थायी और आसान व्‍यवस्‍था नहीं हैं। निर्माण, भारी निर्माण, वितरण, विपणन, परिवहन एवं अन्‍य महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में स्‍थायी व अस्‍थायी रूप से कार्यरत अनेक श्रमिक घोर उपेक्षाग्रस्‍त हैं। इनके कल्‍याण हेतु सामाजिक कर्तव्‍य के इन कार्यों को केवल सरकारों द्वारा ही ठीक ढंग से क्रियान्वित किया जा सकता है, पर इस आशय की इनकी उम्‍मीद को सदैव ग्रहण लग जाता है।
इनके आवास इलाकों में मूलभूत जरूरतों जैसे विद्यालय, अस्‍पताल, सरकारी राशन की दुकानें, जल, बिजली एवं अन्‍य सुविधाओं की अत्‍यन्‍त कमी है। यदि कहीं पर ये सुविधाएं उपलब्‍ध हैं भी तो वे क्षेत्रीय एकाधिकार के अधीन होकर निष्‍प्रभावी बनी हुईं हैं। जहां श्रमिक वर्ग के लोग रहते हैं, सामान्‍यत: वहां की दूकानों में दैनिक जरूरत की चीजें उचित, शुद्ध नहीं मिलतीं। वहां नकली वस्‍तुओं से दुकानें भरी रहती हैं। कोई चाहकर भी शुद्ध वस्‍तुएं नहीं खरीद सकता। इन क्षेत्रों की समस्‍त व्‍यापारिक गतिविधियां माफियाओं की सांठगांठ से चलती हैं। परिणामस्‍वरूप ऐसे असं‍गठित क्षेत्रों में भारतीय मानक पर सत्‍यापित दैनिक उपभोग की व अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तुएं कभी उपलब्‍ध नहीं रहतीं। जब इन क्षेत्रों के लोगों का श्रम मूल्‍य कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सरकार के खाते में भी जाता है तो फिर ये लोग माफियाग्रस्‍त स्‍थानीय इलाकों के व्‍यापारियों की मनमर्जी का कोपभाजन क्‍यों बनें? क्‍यों अपनी श्रम-शक्ति से उपार्जित आय से अवैध और नकली वस्‍तुओं को खरीदने के लिए विवश हों? और कब तक?

श्रमिक वर्ग इन उपरोक्‍त समस्‍याओं से ही नहीं निपट पा रहे हैं तो अपने श्रमिक अधिकारों को अक्षरश: जानने, उनके क्रियान्‍वयन हेतु जागरुक बनने और उनसे प्राप्‍त किसी राहत की कल्‍पना भी नहीं कर सकते, जबकि देश के विकास के क्रम में बुनियादी लकीर भी इन्‍हीं के द्वारा खींची जाती है और उसकी अन्तिम ईंट भी इन्‍हीं के हाथों लगाई जाती है। फिर भी नीति-निर्धारक देश के विकास में सहायक इनके अहम योगदान को कही भी समर्थन देने को तैयार नहीं हैं। इसके इतर पढ़े-लिखे श्रमिकों को भी उनकी समुचित सेवाओं के प्रतिफल में बहुत थोड़ा मूल्‍य ही मिल पा रहा है। यहां तक कि श्रम साध्‍यता के अन्‍तर्गत विद्वतापूर्ण अवस्‍था भी मूल्‍यांकनकर्ताओं को नहीं झकझोर पाती।
समाज में बढ़ते भ्रष्‍टाचार और बेईमानी ने श्रमिकों को भी नहीं छोड़ा है। श्रम कानून अपने क्रमवार व्‍यावहारिक पहलुओं को धता बताते हुए सिर्फ श्रम कानूनी पुस्‍तकों तक सिमट कर रह गए हैं। भारत जैसे देश में जहां संगठित-असंगठित क्षेत्रों के अनेक निर्माण एवं अन्‍य कार्यों में अनगिनत श्रमिक लगे हुए हैं, वहां श्रम कानूनों के प्रभावी क्रियान्‍वयन के साथ-साथ इनकी निश्चित समयांतराल पर समीक्षा भी होनी चाहिए। असंगठित क्षेत्रों की कठिन जीवन परिस्थितियों से डरकर न तो सरकारी और ना ही सामाजिक संगठनों द्वारा यहां पर कोई जागरुकता कार्यक्रम चलाया जाता है। इन्‍हें इनके नागरिक संवैधानिक अधिकारों के अन्‍तर्गत प्राप्‍त होनेवाली बिजली, पानी, अस्‍पताल और विद्यालय जैसी सरकारी, सं‍गठित सुविधाओं तक का अभाव भी झेलना पड़ता है।
जब नागरिक संवैधानिक अधिकारों के अधीन नि:शुल्‍क प्राप्‍त होनेवाली सरकारी सुविधाएं इन श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रही हों तो अपने श्रम के अवमूल्‍यन से निपटने की इनकी इच्‍छाशक्ति को व्‍यावहारिक बनाकर कौन सरकार तक पहुंचाएगा? प्रश्‍न यह भी बड़ा ही विचित्र है कि स्‍वयं सरकार भी इस बारे में क्‍या कर रही है? सरकार, पूंजीपति‍यों, सरकारी अधिकारियों और प्रबुद्ध-समृद्ध मनुष्‍यों, सभी का कर्तव्‍य है कि श्रमिकों को उनके अधिकार दिलाने में योगदान करें।
(मूल रूप से १ मई २००९ को दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित)
विकेश कुमार बडोला

Sunday, April 26, 2015

भूकंप में बेचारा मानव-जीवन

चैत्र अप्रत्‍याशित मौसमीय परिवर्तन के साथ व्‍यतीत हुआ। बैसाख भी चैत्र की ही तरह चलते हुए उत्तरार्द्ध में पहुंच चुका है। रबी की फसल बर्बाद करने के बाद प्रकृति ने प्रचंड तूफान से बिहार में जन-जीवन ठप कर दिया था। और आजकल पूरे उत्‍तर-पूर्वी भारत सहित पड़ोसी देश नेपाल में हुए भूकंप से कई सौ लोग मर गए। कई व्‍यक्ति बड़े-बड़े भवनों के उजड़ने के बाद उनके मलबे के नीचे दबे हुए हैं। नेपाल इस भूकंपन का केन्‍द्रीय स्‍थल था। भारत में बिहार और उत्‍तर प्रदेश में भी अनेक लोग भूकंप से काल-कवलित हुए। प्रकृति के इस कोप के आगे मानवीय जीवन और उसकी व्‍यवस्‍था अत्‍यंताल्‍प लगती है।
          भारत की राजधानी दिल्‍ली सहित राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, उत्‍तर-पूर्वी पहाड़ियों पर हुई वर्षा से सुहावना बना हुआ था। कल रात से ठंडी हवा चल रही थी। गर्मी के महीने में हवा की ठंडक कंक्रीट के शहर में रहनेवालों को अच्‍छी ही प्रतीत होगी। एक सप्‍ताह में दो बार भीगीं हिमालय की पर्वत शिखाएं मैदानी जन-जीवन के लिए गर्मी से बचने का प्राकृतिक वातानुकूलन होती हैं।
          नोएडा में रहते हुए मैं प्रकृति द्वारा वातानुकूलित जीवन में पत्‍नी और बिटिया के साथ घर की तीसरी मंजिल पर था। बिटिया बिस्‍तर पर लेटे-लेटे कह रही थी, ''अरे कोई बिस्‍तर हिला रहा है। कोई बुड्ढा बाबा है क्‍या?'' वह मेरा कहना नहीं मान रही थी। शांत बैठने के लिए कई बार कहने के बाद भी वह अपनी मर्जी से उछल-कूद मचा रही थी। इसलिए उसके प्रति क्रोध व आवेश से भरा था और इसी कारण उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। नहाने के लिए चौकी पर बैठा तो झटका लगा। ऐसे, जैसे किसी ने मेरी दोनों बांह पकड़ मुझे उठाकर एक ओर रखने के प्रयास में हिलाया हो। पत्‍नी बर्तन धो रही थी। उसे बताया तो उसने भूकंपन की अनुभूति को नकारा। अचानक पत्‍नी की नजर फ्रिज पर पड़ी। उसने मुझे दिखाया कि देखो फ्रिज कैसे हिल रहा है! मैं घबराए बिना, किसी अनहोनी की आशंका से अछूता चुपचाप फ्रिज को हिलते देखता रहा। संयत होकर पत्‍नी और‍ बिटिया को नीचे सड़क पर जाने को कहा, पर पत्‍नी नहीं गई। दो मिनट का यह समय असमंजस में व्‍यतीत हो गया। भूकंप के झटके थम गए।
          जीवन पहले ही इतने कष्‍ट-पीड़ाओं से घिरा हुआ है कि भूकंपन से जान जाने का भय पलांश में भी महसूस न हुआ। पास-पड़ोस की भूकंपन से होनेवाली प्रतिक्रियाओं को सुनने, देखने की जिज्ञासा से बाहर बॉलकनी में आया। दोपहर की तेज धूप में सड़क निर्जन थी। कुछ महिलाओं-लड़कियों की अचरजभरी आवाजें जरूर सुनाई दीं, पर वह भी शीघ्र बंद हो गईं। शायद लोग समाचार चैनलों पर भूकंप संबंधी समाचार देखने की इच्‍छा के चलते दोपहर के सन्‍नाटे में बाहर नहीं निकले होंगे।
          मेरे घर में टेलीविजन सालों से पेटी में बंद है। इसलिए भूकंप से कहां कितना उजाड़ हुआ, कितने जीवन बर्बाद हुए तत्‍काल इसकी जानकारी नहीं मिल पाई। कार्यालय जाकर पूरी जानकारी मिली।
मैं भूकंप की इस घटना को अप्रत्‍याशित नहीं मानता। जैसी शहरी रचना हो रही है, सीमेंट और लौह से चिपकाकर ईंटों के भवन खड़े किए जा रहे हैं, वे भूगर्भ में होनेवाली हलचल से हिलेंगे और गिरेंगे ही। लोग समझदार, विवेकवान और सज्‍जन बन जाएं तो सीमेंट, लौह, ईंट से निर्मित होनेवाले घरों की जरूरत ही न हो। घास-फूस और लकड़ी से तैयार घर होंगे तो प्राकृतिक संतुलन भी बना रहेगा। ऐसे घर भूकंप में गिर भी जाएं तो उससे मानव जीवन की हानि नहीं हो सकती। इन घरों को भूकंप में बिखरने के बाद भी शीघ्र ही रहनेयोग्‍य बनाया जा सकता है।
लेकिन ऐसे घरों की व्‍यवस्‍था क्‍यों की जाएगी। इससे बहुमंजिला भवनों के नाम पर चले रहे रियल स्‍टेट के कारोबार को झटका लगेगा। भूकंप से लगनेवाले झटकों से मानवीय जीवन को होनेवाली क्षति से अधिक चिंता व्‍यवस्‍था को रियल स्‍टेट कारोबार को बनाए रखने की है। ऐसा न होता तो बहुमंजिला भवनों का निर्माण कबका बंद करा दिया जाता।
रात को घर लौटते हुए जीवन की भावना निष्‍तेज लगी। बहुत गहरे हृदय में महसूस हुआ कि रात्रि साढ़े दस बजे और पौने ग्‍यारह बजे का समय जैसे ठहरा हुआ है। दोपहर के भूकंप को भूलकर लोग घरों में दुबके हुए हैं। मार्ग के दोनों ओर बड़ी-ऊंची कोठियों में अंधेरा अमानवीय बन कर पसरा हुआ है। मार्ग पर एक-दो पथिक या वाहन ही आ-जा रहे हैं। शीतल पवन में दुख के बाद की छितरी हुई सांत्‍वना का अनुभव है। इसमें जीवन की वेदना-संवेदना-मानवीयता-दयालुता-प्रेम-परोपकार-बलिदान जैसी पवित्र भावनाएं अनुपस्थित हैं। इस समय जीवन के कटु-प्रमाण से सिद्ध विचारों के बल पर लगता है कि मृत्‍यु सब जगह, सबसे छोटी बात हो गई है।
          देर रात छत पर टहल रहा था। घर के सामने बेलवृक्ष के पत्‍ते झड़ रहे हैं। ठंडी, सरसराती हवा में किंकर्तव्‍यविमूढ़ भावनाओं से लिपटा हुआ हूँ। तेज हवा से झड़झड़ाता, फड़फड़ाता हुआ बेलवृक्ष अपने शुष्‍क पत्‍तों को छोड़ रहा है। किर-किरकुर-कुरखर-खरसिर-सिरसिर-सिर की ध्‍वनियां करते बेल के सूखे पत्‍ते धरती पर मधुर स्‍पंदन करते हुए बिछ रहे हैं। पश्चिमी आकाश बादलों से घिरा हुआ है। छोटा बादल का घेरा धीरे-धीरे छितराया तो पीले रंग का कटा-फटा अर्द्धचंद्र दिखाई दिया। उसके ऊपर टिमटिमाता एकमात्र सितारा आंखों को देर तक शीतल करता रहा। वह मेरे अंत:स्थल में व्‍याप्‍त जीवन के विष को कम करता रहा।
इस धूल-धूसरित रात्रि से पहले के भूकंपित दिन-दोपहर के अनुभव मेरे जीवन के अप्राकृतिक कष्‍टों के अनुभवों से बड़े नहीं हो पाए। भूकंप से मिल जानेवाले भौतिक-जैविक अपशिष्‍ट में मेरा मिलना अर्थात् मरना उतना कष्‍टकारी नहीं होता, जितना मानवों के रूप में यहां-वहां हर स्‍थान पर विचरण करनेवाले असुरों के साथ जीवन गुजारने पर जीवन हो रहा है।
विकेश कुमार बडोला

Thursday, April 23, 2015

भूमि अधिग्रहण का विरोध बनता जानलेवा

भूमि अधिग्रहण कानून में संसार के वर्तमान अर्थतंत्र के अनुसार संशोधन करना भाजपा की एक व्‍यापक विकास योजना है। इसे ढंग से नहीं समझनेवाले भूमि अधिग्रहण कानून को कृषक विरोधी मान रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के बारे में आकाशवाणी से प्रसारित प्रधानमंत्री के सम्‍बोधन में उनके द्वारा लिए जानेवाले व्‍यावहारिक कृषि निर्णयों की झलक थी। इन्‍हें नहीं समझना, इनके बारे में समुचित आकलन नहीं करके केवल वर्तमान केन्‍द्र सरकार को गलत ठहराना, यह लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी तरह अपनी उपस्थिति बनाए रखने की क्षुद्र लालसा के अलावा कुछ नहीं है। पूर्ववर्त्‍ती कांग्रेसनीत सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर उसे आधुनिक अन्‍न, धन व संसाधन के अनुरूप बदलना बड़ी राजनीतिक सोच है। केंद्र सरकार के अधिग्रहण संशोधनों को केवल विरोध की दृष्टि से देखने से विकास के काम कभी नहीं हो सकते।
          विभिन्‍न राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोग भारतीय लोकतंत्र का ही हिस्‍सा हैं। आज अमीर से लेकर गरीब आदमी और नेता से लेकर किसान तक सभी अपने बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा देकर उनका भविष्‍य संवारना चाहते हैं। मोदी सरकार के विरोध में विभिन्‍न राजनीतिक दलों के प्रदर्शनों में शामिल लोगों के बच्‍चे बड़ी-बड़ी कंपनियों, उद्योग-धन्‍धों में नौकरी कर रहे हैं। कृषि आधारित कार्यों के उद्योग भी रोजगार सृजित करते हैं। इनमें भी अमीर व गरीब दोनों स्‍तर के लोग नौकरी करते हैं। आज के युग में अनगिनत उत्‍पादों का निर्माण हो रहा है। विभिन्‍न उत्‍पादों के निर्माण में उत्‍पाद-विशेष का कौशल रखनेवाले लोग रोजगाररत हैं। इस समय का मानव जीवन केवल उदर पूर्ति की जरूरत पर निर्भर नहीं है। जीवन-उत्‍कृष्‍टता बढ़ानेवाले अनेक उत्‍पाद भी मानव जीवन से जुड़ चुके हैं। कार, मोबाइल, कंम्‍प्‍यूटर से लेकर रेल, हवा-पानी के जहाज और इनका निर्माण करनवाले कल-कारखाने भी तो समाज की विलास-आवश्‍यकता के लिए संचालित किए जाने हैं। और यदि केंद्र सरकार इस दिशा में पर्यावरणानुकूल नीति के आधार पर विचार कर कृषि को परंपरागत रखने की योजना बनाती है और इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करती है, तो इस पर सार्थक विश्‍लेषण व विचार करने की बजाय केवल अंधविरोध में उतरने से पहले लोगों को और लोगों को भड़कानेवाली राजनीतिक पार्टियों को आत्‍ममंथन करने की जरूरत है।
          दिल्‍ली की सत्‍ता में आसीन पार्टी की एक रैली में एक राजस्‍थानी किसान की आत्‍महत्‍या का कारण जानने की कोशिश बेकार ही होगी। अतिवृष्टि के कारण परिश्रम से तैयार की गई रबी की फसल बर्बाद होने पर ह्रदयाघात लग सकता है। परिणामस्‍वरूप संवेदनशील किसान की असमय मृत्‍यु भी हो सकती है। यह बात गहन चिंता की है। इस बारे में केंद्र व राज्‍य सरकारों को पीड़ित-व्‍यतीत किसानों और उनके परिवार के भविष्‍य के बारे में अवश्‍य सोचना चाहिए। लेकिन अपना लाभ देखनेवाले राजनीतिक दलों द्वारा संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून के अच्‍छे-बुरे पक्ष के बारे में अपूर्ण जानकारी दिए जाने और उस कारण विरोधाभासी विचारों से ग्रसित हो किसानों द्वारा आत्‍महत्‍या करने जैसी दुर्घटनाओं के लिए केवल केंद्र सरकार को जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।
यह दुर्घटनाएं और अनावश्‍यक विरोध-प्रदर्शनों का आयोजन दर्शाता है कि इस राष्‍ट्र के अधिकांश लोगों को अभी भी जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों के बारे में बहुत ज्‍यादा शिक्षित होना है। अभी लोगों का ज्ञान अधूरा है। वे राष्‍ट्रनीतियों के बारे में अपने विवेक से विश्‍लेषण करने की क्षमता नहीं रखते। जीवन को संभालने वाले कृषि और उद्योग क्षेत्र के कार्यक्रम के बारे में समुचित जानकारी के अभाव में ही सारी दिक्‍कत है। इसी कारण भूमि अधिग्रहण कानून में किए गए संशोधन का विरोध हो रहा है।
          माना कि किसान या किसी आदमी के पास अपनी भूमि है। लेकिन यदि वह उस पर बीजारोपण नहीं करता या उसका औद्योगिक प्रयोग नहीं करता है, तो उसका मूल्‍य कैसे तय होगा। ऐसी भूमि का मूल्‍यांकन शासन की कृषि व उद्योग नीति के अनुसार ही हो सकता है। विशाल जनसंख्‍या की उदर-पूर्ति व उसके आधुनिक जीवन-स्‍तर को बनाने के लिए ईमानदार सरकार को कृषि और औद्योगिक विकास की अवधारणा बनानी पड़ती है। इसके लिए पर्यावरण पक्ष का भी बड़ा ध्‍यान रखना पड़ता है। विकास के नाम पर अंधानुकरण न हो इसके लिए प्राकृतिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण भी अपनाना पड़ता है। और इन सबके लिए अगर भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ संशोधन किए जाते हैं तो गलत क्‍या है।
          भूमि अधिग्रहण के बहाने सरकार को कॉर्पोरेट और बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए काम करनेवाली सरकार बतानेवालों को सोचना चाहिए कि उनके बच्‍चे भी रोजगार व जीविका के लिए कॉर्पोरेट व बड़ी-बड़ी कंपनियों से जुड़े हुए हैं। पूंजी का संचालन कृषि व उद्योग के आधार पर होता है। अर्थशास्‍त्र के कार्यक्रम को आम आदमी आसानी से नहीं समझ सकता। आज की केंद्र सरकार से पहले की सरकारों ने अर्थशास्‍त्र की इसी जटिलता को भ्रष्‍टाचार व दलाली के रूप में भुनाया। उन्‍होंने राष्‍ट्रीय कार्यक्रम से निर्धारित संसाधनों के अनुसार परिश्रम करनेवालों के पूंजीगत अधिकारों का हमेशा हनन किया। इसीलिए दशकों पुराने कानूनों को नई जनांकिकी के जीवन हेतु अपेक्षित संसाधनों के अनुसार बदलने का कोई प्रयास उनके स्‍तर पर कभी नहीं हुआ।
मानवीयता के पतन का कारक बने राजनीतिक दलों से बदलाव की उम्‍मीद भी नहीं की जा सकती थी। और अब, जब एक व्‍यक्ति एक नई योजना से राष्‍ट्र की उन्‍नति के लिए संकल्‍पबद्ध है और वह इसके लिए हर जरूरी कार्यक्रम निर्धारित कर रहा है, तो उसे मात्र राजनीति में बने रहने के लिए गलत ठहराना एकदम अनुचित है। यह बात आम आदमी और किसानों को अवश्‍य समझनी चाहिए।