Saturday, November 7, 2015

जीवन जैसा चेहरा

जकल एक चेहरा बहुत बेचैन करता है। कभी जीवन की, कार्यालय की सामान्‍य स्थितियों में इस चेहरे को बड़ी शुभकामना से आते-जाते देखा करता था। इस चेहरे पर अपनी दृष्टि टिकती थी तो लगता कितना सुन्‍दर, प्‍यारा चेहरा है! लेकिन इस चेहरे ने कभी भी मुझे उस दृष्टि से देखा ही नहीं, जिसमें उसे अनुभव हो सके कि उसके समीप से आते-जाते कोई उसके सौन्‍दर्य में उड़ता-बहता अवाक, हतप्रभ है।
            आजकल यह चेहरा मुझे पहचानने लगा है। इसकी मुस्‍कुराहट मुझे सपनों के फूलों सी लगती है। इसके स्‍नेह-संकेत (जो वास्‍तव में हैं नहीं, केवल मुझे लगते हैं) मुझे शुष्‍क जीवन में शीतलता के झरने लगते हैं। लगता है जीवन की रूखी-सूखी नदी में पावन जलधारें रेंगने लगी हैं।
            लेकिन अपनी पारिवारिक, सामाजिक सीमाएं इस चेहरे की दूर की सौन्‍दर्य अनुभूति को ही अनुभव करने को कहती हैं। कितना आकर्षण है इस चेहरे में! ऐसा लगता है जैसे यह सुन्‍दरता अपने व्‍यक्तित्‍व के साथ सिंहासन पर विराजमान होती तो इसका कितना व्‍यापक प्रभाव होता। यह सुन्‍दरता रोजगार से न जुड़ी होती तो क्‍या बात होती! इस व्‍यक्तित्‍व के रथ का घोड़ा बनने से किसी को भी आपत्ति नहीं होती। विशेषकर मुझे। मैं चाहता हूँ यह कंचन-विभूति घमण्‍ड में रहे। इस कामिनी की मुस्‍कुराहट वर्ष में एक बार दीपावली की तरह उभरे और इसके लिए मेरे जैसे लोग वर्षभर बेचैन, व्‍याकुल, व्‍यग्र रहें कि दीपावली यानी मुस्‍कुराहट कब आएगी। जो भी हो मैं हतप्रभ हूँ, आत्‍मविभोर हूँ।
            इन दिनों-रातों जीवन बुरी तरह से व्‍यतीत हो रहा है। आज सुबह शीघ्र उठ तो गया पर चाय पीकर फि‍र सो गया। जब दोबारा उठा तो दस बजने को थे। सुबह से ही वातावरण धुन्‍धीला हो गया। रात भी आजकल जल्‍दी ही धुन्‍ध में लिपट जाती है। प्राकृतिक जीवन समाप्‍त हुआ पड़ा है। जो मेरे जीवन का आधार है, वह प्रकृति विरुद्ध है। न पावन नील नभ है, न वनस्‍पतियों की चमचम हरियाली है, न वृक्ष-लताओं का आकर्षण बचा और ना ही चन्‍द्रमा-सितारों का ही अस्तित्‍व रहा। सूरज भी धूल-धुन्‍ध में रल-मिल कर अपने प्रकाश को भारी कर चुका है।
            किसी अनजान व्‍यक्ति की मुस्‍कान से स्‍वयं को प्रसन्‍न करना कितनी शान्ति देता है। आजकल तिपहिया चालक मुझ पर मोहित लगते हैं। एक तिपहिया चालक बहुत सधे ढंग से, यातायात नियमों के अनुसार अपना तिपहिया चला रहा था। यह दो दिन पहले की घटना है। मैं घर के समीप जब उससे उतरा तो उसे अच्‍छे चालन के लिए सराहा। वह प्रसन्‍न था। आज भी एक निजी तिपहियावाला मुझे कार्यालय तक केवल पांच रुपए लेकर छोड़ गया। उसे भी मैंने मेरी यात्रा सुगम व मितव्‍ययी बनाने के लिए धन्‍यवाद दिया। वह भी जिस मुस्‍कुराहट को बिखेर रहा था, उसने मुझे जीने का नया आधार दिया।
            लेकिन आज कार्यालय के समीप मैं अपने दोगुले व्‍यवहार से मन के भीतर परेशान रहा। हे साधु बाबा मुझे क्षमा करना। आप मुझसे कुछ दान मांग रहे थे। मैंने यह तो सत्‍य कहा कि मुझे आठ माह से वेतन नहीं मिला। लेकिन झूठ भी बोला कि मेरे पास आपको देने के लिए खुले पैसे नहीं हैं। तभी वहां अपनी मोटरसाइकिल में सुरेश कुमार शर्मा आया। सुरेश एक सक्रिय, सन्‍तुलित व शिष्‍ट नौजवान है। उसे देखकर अच्‍छा लगता है। उसने मेरे अनुरोध पर साधु बाबा को दस रुपए दे दिए। तभी हमारी कंपनी की एक और लड़की आयी। उसने भी प्रकरण समझकर बाबा को कुछ धनराशि भेंट की, लेकिन मैं आत्‍मलज्‍जा से स्‍वयं को घृणित मानने लगा। मन ही मन साधु बाबा, सुरेश व उस लड़की से क्षमा याचना की और सुरेश के प्रति श्रद्धानत हो गया, उस लड़की के प्रति सम्‍मान अभिवादन करने लगा। मेरे पास पांच सौ बीस रुपए थे, लेकिन मैं दस रुपए साधु बाबा को नहीं दे पाया। मैं अब तक इस गलती, असत्‍य के लिए ह्रदय में पीड़ा महसूस कर रहा हूँ।
            रात बारह बजे तक छत पर टहलता रहा। अपने होने का मूल अनुभव ऐसे एकांत में ही होता है। देर तक कई यादें, अभिलाषाएं विचलित करती रहीं। घर से पिताजी का फोन आया तो माता जी व भाई सुबोध से भी देर तक बातें हुईं। अनुभूतियों के स्‍तर पर आज की सन्‍ध्‍या के बाद का जीवन अच्‍छा लगा। देर रात तक अच्‍छी-सच्‍ची अनुभूतियां गुदगुदाती रहीं।
एक चेहरे की याद में
बुधवार 03.11.2015 का आत्मिक संस्‍मरण

6 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज का पंचतंत्र - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सुन्दर रचना -------------

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  3. ये उलझनें अब आम हैं और हम सबके जीवन का हिस्सा हैं । हाँ, हालात थोड़े अलग अलग हो सकते हैं ।

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  4. सुन्दर रचना ......
    मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन की प्रतीक्षा है |

    http://hindikavitamanch.blogspot.in/
    http://kahaniyadilse.blogspot.in/

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  5. बहुत सुन्दर ..

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