Friday, October 23, 2015

पुरस्‍कार लौटाने का खटकर्म

दिमाग ने जैसे इस दुनिया के हिसाब से सोचना ही बंद कर दिया है। वरिष्‍ठ लेखक बल्‍लभ डोभाल जी ने फोन किया। उन्‍होंने पूछा, "ये पुरस्‍कार वापस क्‍यों किए जा रहे हैं?" मैं उनके प्रश्‍न पर चुप था। वास्‍तव में मैं खुद पिछले आठ माह से आर्थिक-सामाजिक रूप से इतना खोखला हो चुका हूँ कि इस दुनिया और खासकर इस देश के अनावश्‍यक समाचारों पर मेरा ध्‍यान ही नहीं रहता। जनसंचार (मीडिया) की रंगबाजी और तफरीह पत्रकारिता से तंग आकर सन् २०११ में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मोहभंग हुआ। साथ ही अन्‍य टेलीविजन कार्यक्रमों की निरर्थकता के कारण घर का टेलीविजन पेटी में बंद हो गया। तब से घर में टेलीविजन नहीं है। कुछ महीनों से समाचारपत्रों से भी बुरी तरह चिढ़ हो गई है। उन्‍हें भी लेना बंद कर दिया है। ऐसे में मुझे क्‍या पता होता कि साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार क्‍यों लौटाए जा रहे हैं। 
            डोभाल जी के आदेश पर पुराने समाचारपत्र देखे। पता चला कुछ, बहुत सामान्‍य घटनाओं (सामान्‍य इस रूप में कि ऐसी घटनाएं इस देश में हर क्षण बहुतायत में घटती हैं, बल्कि इससे बड़े और संवेदनशील विषय भी हैं, जिनसे इस देश के लोग घिरे हुए हैं, पर उन पर बुदि्धजीवियों को कोई आपत्ति नहीं होती) को देश में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता पर रोक, सरकारी तानाशाही के रूप में फैलाकर वामपंथी साहित्‍यकार, पत्रकार केन्‍द्र शासन के विरोध में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटा रहे हैं।
            यहां वे तर्क देना बेकार है जिनमें ऐसे साहित्‍यकारों, पत्रकारों से यह आशा की जाती कि वे बड़ी व सार्वजनिक पी‍ड़ा की घटनाओं पर अपनी ऐसी विरोधी प्रतिक्रिया देते तो उनके लेखकीय मौलिकता की सही परख होती। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया ऐसी सामान्‍य घटना पर आयी, जो किसी भी रूप में उनके जीवन को चलाने के लिए महत्‍वपूर्ण नहीं है। यह सभी लेखक वे हैं, जिन्‍हें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार उन सरकारों द्वारा दिए गए, जिनके लिए ये अपने साहित्‍य को बुरी तरह सुखा चुके हैं या कह सकते हैं सड़ा चुके हैं। इनके सृजन में इतना दम नहीं जिसे पाठक समझ व साध सके। इनकी कविताएं इनकी मानसिक विसंगतियों का ऐसा मकड़जाल हैं, जिनको समझना किसी कठिन पहेली को बूझना जैसा ही होता है। ऐसे साहित्‍यकारों ने जो कुछ लिखा, उससे हिन्‍दी व हिन्‍दी पाठकों की बहुत हानि हुई। इनके सृजन ने पहले तो हिन्‍दी को खत्‍म किया उसके बाद आम पाठक भी हिन्‍दी के साहित्‍य से दूर होता गया।
            पिछले साठ सालों में कांग्रेस का जो बीज इस देश में रोपा गया, उसने साहित्‍य ही नहीं समाज और व्‍यक्ति तक को खोखला बना दिया। यह बीज अब एक बड़े कंटीले वृक्ष के रूप में बदलकर भारतीय मनुष्‍यता का खून पी रहा है। सारा दोष इसी का है। सारी समस्‍याएं इसी से हैं। इसके अपराध को वर्तमान भारतीय केन्‍द्र सरकार पर थोपा नहीं जा सकता।
            पुरस्‍कार लौटाने वाले वास्‍तव में किसी के नहीं हैं। इन्‍हें अपने से लगाव नहीं है तो ये किसी एक व्‍यक्ति या समाज से लगाव कैसे रख सकते हैं। इनके बौदि्धक षड्यन्‍त्र ने सबकी हानि तो की ही, खुद इनका भी नुकसान किया है। भले ही इसका अनुभव इन्‍हें जीते जी हो या न हो।
विकेश कुमार बडोला

4 comments:

  1. सही है। आपकी लिखी बातों से पूर्णतः सहमति है। एक तरफ पुरस्कार लौटा रहे है और दूसरी और यह भी कह रहे है कि यदि मोदी जी बोलेंगे वापस लेलों तो ले लेंगे। यह भी कोई बात हुई भला?

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  2. पुरस्कार लौटाने का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य क्या है ,इसे आम आदमी तो नही समझ रहा .बाकी जो समझ रहे हैं उनमें से कुछ हैं जो इसे महिमामंडित कर रहे हैं शेष तो निरर्थक ही बता रहे हैं .

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  3. कुछ लोगों की व्यक्तिगत पीड़ा रही हो, लेकिन एक को देख कर दूसरे ने अनुसरण करने का चलन तो बना ही दिया है.

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  4. सुंदर प्रासंगिक प्रस्तुति।

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