महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, September 14, 2015

उनके बच्‍चे को डेंगू बुखार हुआ था...

नके बच्‍चे को डेंगू बुखार हुआ। वे अपने बच्‍चे को बचा नहीं पाए। और उन दोनों पति-पत्‍नी ने एक-दूसरे के हाथ रस्‍सी से बांधे और कूद गए एक ऊंचे भवन से। वे भी आखिर में अपने बच्‍चे के पास पहुंच गए। हम सबने कहानी की तरह यह सब पढ़ा। कुछ नहीं हुआ हमें और लग गए अपने काम-धन्‍धों में। सरकार, समाज और मानवता असहाय होकर यह सब ताकती रही।
जब किसी की सहायता नहीं हो सकती तो उसका नाम याद करके करना ही क्‍या। दो या तीन दिन पहले इस मशीन यानि मैंने ये खबर पढ़ी कि डेंगू बुखार से अपने सुपुत्र को न बचा पानेवाली दम्‍पत्ति ने भी मृत्‍यु अंगीकार कर ली। चिकित्‍सालय में समय पर भर्ती न हो पाने और उसके बाद उचित चिकित्‍सा के अभाव में उनके बच्‍चे ने दम तोड़ दिया। मां-बाप इस अप्रत्‍याशित स्थिति की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे। वे इतने निराश हुए कि बेटे की अकाल मृत्‍यु के तीन दिन बाद पति-पत्‍नी ने एक ऊंचे भवन से कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली। इस तरह एक परिवार जो अपने को दुनिया, समाज व मानवता के बीच पाकर सुरक्षित मानता था वह उसी दुनिया, समाज व मानवता की उपेक्षा, असहायता और असहयोग के कारण काल कवलित हो गया।
            मुझे मरनेवालों के नाम याद नहीं। उनके मुख याद नहीं हैं। इतना स्‍मृति में कौंध रहा है कि इस तरह एक परिवार शासन-समाज के बीच कितनी अमानवीयता से ग्रस्‍त हुआ! क्‍या किसी सभ्‍य व जागरूक समाज में इस तरह की दुर्घटना की कल्‍पना की जा सकती है? यह एक अप्रत्‍याशित अशुभ समाचार है। इस पर हमारे कर्ताधर्ताओं सहित पूरे जन समुदाय को रुककर अवश्‍य सोचना चाहिए। क्‍या ऐसे परिवार के पास-पड़ोसवाले उसकी सहायता नहीं कर सकते थे? जहां वह व्‍यक्ति अपने तीन सदस्‍यीय परिवार के लिए रोजगार करता था, क्‍या उस नियोक्‍ता का यह दायित्‍व नहीं था कि वह उनके बारे में सोचता? यदि कोई परिवार इकाई अपने दुख से लोगों को परिचित नहीं करा पाती तो क्‍या लोगों का दायित्‍व नहीं कि वे अपनी सुख-सुविधाओं के समय में से कुछ समय निकालकर ऐसे परिवार के प्रति तन-मन-धन से समर्पित हों? आखिर सम्‍पन्‍नता की स्थिति में पहुंचे लोगों का सम्‍पन्‍न होने से क्‍या मतलब है? क्‍या उन्‍हें सम्‍पन्‍नता के समानांतर स्‍वाभाविक रूप से उपजनेवाले सामाजिक कर्तव्‍य के प्रति सचेत नहीं होना चाहिए? क्‍या उन्‍हें इतनी फुर्सत भी नहीं थी कि वे आत्‍महत्‍या करनेवाले परिवार को भावनात्‍मक सहारा देते, उनके बेटे के रोगग्रस्‍त होने पर उनकी सहायता करते?
            हमें स्‍वयं को इन प्रश्‍नों से अवश्‍य परेशान करना चाहिए। अन्‍यथा समाज का लक्षण समाप्‍त हो जाएगा। इस तरह मृत्‍यु को अंगीकार करनेवाले परिवार की स्थिति में कभी भी कोई भी परिवार हो सकता है। हमें इस तरह से अंतर्मुखी नहीं होना कि हमारा मनुष्‍य होने का आधार ही न रहे। अपने पास-पड़ोस, परिवेश में उन लोगों की ओर हमें अपना ध्‍यान फैलाना ही होगा, जिन्‍हें सच में तन-मन-धन से हमारी सहायता चाहिए। मनुष्‍य होने का यही उद्देश्‍य है। इसके बिना हम कैसे आत्‍ममुग्‍धता में ही अपना सारा जीवन गुजार सकते हैं?
................................इस मशीनी जिन्‍दगी में क्‍या कोई शख्‍स दिल भी रखता है?
.......................या जालिम आंखों औ' पत्‍थर मन से सिर्फ खूनी महफि‍ल तकता है?
विकेश कुमार बडोला

11 comments:

  1. दुर्भाग्यपूर्ण..... दिल झकझोरने वाली घटना....

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  2. एकाकी पन से बाहर आना ... सामाजिक प्राणी बनना और समाज, गली मोहल्ले के आस पास के लोगों से घुलना मिलना बहुत जरूरी है और हर किसी को जरूरी है ...
    ये घटना एक चेतावनी के रूप में देखि जा सकती है ... अपने अन्दर, आस पड़ोस से व्यवहार कैसे हों इस बार दृष्टि डालने की जरूरत है आज ....

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  3. जीवन में कब किसके साथ अघट घटना घट जाए कहा नही जा सकता . बीमारी से मृत्यु चिकित्सा का अभाव कहें , डाक्टरों की लापरवाही कहें पर उनका बच्चा चला गया लेकिन इससे भी सोचनीय बात हुई दम्पत्ति का आत्महत्या कर लेना क्योंकि वे अपने बच्चे की मौत को सह नही पाए क्योंकि वे अकेले थे . पड़ोस और शायद परिजन उनके पास नही थे . हमारे यहाँ ( देहात या देहाती परम्परा वाले क्षेत्र में शोकग्रस्त परिवार के साथ पड़ोस व परिजन पूरी संवेदना के साथ होते हैं उनका दुख बाँटकर हल्का करने का प्रयास करते हैं . यहाँ शायद ऐसा नही होगा .यह घटना सचमुच बड़ी दुखद है और एक चेतावनी भी . नासवा जी ने ठीक ही कहा है कि आज परिवार व समाज से कटती जीवन-धारा को मोड़ना जरूरी है .

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  4. सोचते रहने के अलावा क्या कहा जाय ? सोच को भी काठ मार जाता है .

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  5. सामजिक व्यवस्था चरमरा गयी है. क्यों चरमरा गयी यह हम सब जानते हैं. यह दुखद घटना एक तरह से आइना भी है. मनुष्य दिन-ब-दिन मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है.वरना दुःख से उबरने का एकमात्र विकल्प मृत्यु ही तो नहीं.

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  6. आज भीड़ में भी मनुष्य एकाकी है. हमारी असंवेदनशीलता और स्वार्थ हमें दूसरों के दुखों के बारे में सोचने ही नहीं देता. महानगरों की मानसिकता की एक भयावह स्थिति...

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  7. बेहद दुखद.
    समाज की बदलती सोच और स्थिति दुभाग्यपूर्ण है.
    आज जिन परिस्थितियों का शिकार एक परिवार हुआ कल न जाने कितने समाज की उदासीनता से प्रभावित होंगे.
    भावनात्मक सहारा भी देने कोई आगे नहीं आता...लोग एक दुर्घटना को 'घटना' देख सुनकर आगे बढ़ जाते हैं.

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  8. दुखद हालात हैं , जाने कुछ बदलेगा भी या नहीं ?

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  10. बिलकुल। नैतिकता और आपसी व्यवहार भी बहुत मायने रखता है। पर अफसोस नैतिक शिक्षा जैसा विषय तो अब पुस्तकों में भी देखने को नहीं मिलता तो फिर इन्सानों में यह भावना कहाँ से आए।

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