Wednesday, September 2, 2015

स्‍वाध्‍याय के गुण

संसार में दो प्रकार के लोग हैं--रचनात्‍मक और द्वंदात्‍मक। 'मेरे पास समय नहीं है' कहनेवालों को 'समय नहीं कट रहा है' कहते हुए भी सुना जा सकता है। द्वंदों से घिरे व्‍यक्ति इसी भावना से परिचालित होते हैं, जबकि रचनात्‍मक कार्य करनेवालों को जीवन बहुत छोटा लगता है। इसीलिए उनके पास समयाभाव व समय-भार का भाव-विचार कभी नहीं होता। उनकी दृष्टि में संसार अनेक सकारात्‍मक कार्यों से भरा हुआ है। उनके पास रचनात्‍मक विचारों व कार्यों की भरमार है। अभिभावकों, गुरुजनों, बुजुर्गों व समाज से वे जो कुछ भी सीखते हैं, वे केवल उसी से संतुष्‍ट नहीं होते। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्‍तांतरित ज्ञान प्राप्ति के बाद भी उनमें जीवन परिवेश के प्रति सदैव एक नवीन इच्‍छा बनी रहती है। नवज्ञान प्राप्ति की ऐसी जिज्ञासा दुनिया के बारे में स्‍वाध्‍याय करने के फलस्‍वरूप ही पनपती है। स्‍वाध्‍याय व्‍यक्तिवाद और ज्ञानाडंबर का नाश करता है। स्‍व, स्‍वार्थ व अभिहित से प्रतिपादित ज्ञान की धारा स्‍वाध्‍याय की चट्टान से टकराकर निर्मल हो जाती है। एक व्‍यक्ति के जीवनकाल में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उसे साकार कैसे करना है व सद्भाव से कैसे सींचना है, यह आत्‍मशोध स्‍वाध्‍याय के आधार पर ही फलीभूत होता है। किवदंतियों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का व्‍यक्ति स्‍तरीय संधान पुरानी व नई विचारधाराओं में से गंदगी छांटकर उसे दूर करने में बड़ा सहायक है। यह खोज परंपरा व आधुनिक विचारधाराओं में से श्रेष्‍ठ मूल्‍यों की पहचान कर उन्‍हें स्‍थापित करने पर आधारित है। ऐसा प्रयोग संसार में स्‍वर्ण-चेतना जगाता है और स्‍वाध्‍याय की निश्चित रूप से इसमें सबसे बड़ी भूमिका होती है। स्‍वाध्‍याय परंपरा से मतैक्‍य नहीं रखता। यह परंपरागत व आधुनिक जीवन का गहन विवेचन कर एक नई वैचारिकी उत्‍पन्‍न करता है। स्‍वाध्‍ययन सीधे जीवन से जुड़ा होता है। इस प्रक्रिया में सीखने-सिखाने का तनाव नहीं होता। स्‍वाध्‍याय में ज्ञानधारा स्‍वत: ही निकलती है। इसकी प्रश्‍नोत्‍तरी में उत्‍तीर्ण-अनुत्‍तीर्ण होने की समाज शासित लालसा नहीं होती बल्कि यह ज्ञान की व्‍यक्तिगत खोज है। इस परीक्षा में अनुत्‍तीर्ण होने पर निराशा-हताशा नहीं घेरती बल्कि यह श्रेष्‍ठतापूर्वक उत्‍तीर्ण होने का सन्‍मार्ग प्रशस्‍त करती है। अकादमिक शिक्षा हमें केवल बाह्य जगत के प्रति सजग करती है, जबकि स्‍वाध्‍याय जीवन के आंतरिक आदर्शों व मूल्‍यों के प्रति एकाग्रचित करता है। अकादमिक शिक्षा ग्रहण करनेवालों के ह्रदय में सदैव विद्वता का एक बोझ रहता है, लेकिन स्‍वाध्‍याय में व्‍यक्ति जीवनभर हंसी-खुशी रमा रहता है।
विकेश कुमार बडोला

8 comments:

  1. बिलकुल सच लिखा है. स्वाध्याय के समय ना कोई चिंता होती है मन में और ना ही कोई हड़बड़ी कि इसे जल्दी खतम करना है. वरन दूसरों के जीवन और उनके संघर्ष और सोच को जानकर प्रेरणा मिलती है.

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.09.2015) को "अनेकता में एकता"(चर्चा अंक-2088) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. रचनाकार कम ही है, हाँ , द्वंदियों की भरमार है अत: इन द्वंदियों से स्‍वाध्‍ययन की क्या अपेक्षा रखनी।

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  4. स्‍वाध्‍याय चिंतन की सटीक सार्थक प्रस्तुति।

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  5. एक नयी सोच, एक नया रास्ता केवल स्वाध्याय से ही मिल सकता है। स्वाध्याय में रत व्यक्ति न कभी अकेला होता है और न ही जीवन से निराश। विचारणीय आलेख..

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  6. एक नयी सोच, एक नया रास्ता केवल स्वाध्याय से ही मिल सकता है। स्वाध्याय में रत व्यक्ति न कभी अकेला होता है और न ही जीवन से निराश। विचारणीय आलेख..

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  7. महत्वपूर्ण बात यही है कि यह ज्ञान की व्‍यक्तिगत खोज है।
    अच्छा लेख.

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  8. आत्म-क्षुधा की तृप्ति का यही मार्ग है .

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