Monday, August 10, 2015

दो पीढ़ियों की सोच के अन्‍तर के वास्‍तविक कारण

पनी पहचान अलग लगती है। मनुष्‍य होने, जीवन में होने, दुनिया में रहने का अनुभव जैसे कितना रिक्‍त है! सुबह उठने से रात सोने तक इक्‍कीसवीं सदी का विज्ञान हावी रहता है। मन, भावनाएं और संवेदनाएं तो मर गई हैं। दिमाग की गति बहुत तेज है। ह्रदय का धड़कना जैसे होता ही नहीं। दिमाग में बातों और घटनाओं के असंख्‍य आयत बनते-बिगड़ते हैं। घर के सदस्‍यों के साथ होते हुए भी मन-मस्तिष्‍क जाने कहां-कहां गोते लगा आता है। इस जिन्‍दगी का असल मकसद किस चीज पर स्थिर होना है? इस बिन्‍दु की झिलमिलाहट में कितने ही विचार तैरने लगते हैं। विचारों का चक्र इतनी तेज चलता है कि उसमें अपनी जैविक संभावनाएं खत्‍म होती प्रतीत होती हैं।
            उन संभावनाओं तक पहुंचना इस दौर में कितना मुश्किल है, जो आदमी के लिए जिन्‍दगी में आगे बढ़ने के लिए जरूरी आंकी गई हैं। हर क्षेत्र, हर बात, हर रिश्‍ते और हर संबंध में एक दि्वअर्थ है। हर चीज अपनी मौलिकता के आवरण में एक गंदा अनुकरण लिए हुए है। अच्‍छी बातों के पीछे बुरी प्रवृत्तियों की चिंगारियां दुबकी पड़ी हैं। ऐसे में आदर्श क्‍या बचा है, कुछ भी नहीं। जिनके पास अच्‍छाई की शक्ति है, वह भी अन्‍याय के करोड़ों मुखों के शोर में अशक्‍त हो जाती है। नए बच्‍चों के लिए जिन लोगों को आदर्श और महान बनाकर प्रस्‍तुत किया गया असल में वे खुद आदर्श और महानता से डरकर हमेशा दुर्गुणों की ढाल ओढ़ बचते रहे। तो फि‍र बच्‍चों को यह समाज कैसे दिखेगा समझदार होने पर? क्‍या वे अपने बचपन की उन स्थितियों,‍ जिनमें उन्‍हें अच्‍छाई और आदर्शवाद सिखाया गया, का अपनी परिपक्‍वता की उन स्थितियों, जिनमें उन्‍हें अच्‍छाई और आदर्शवाद के पीछे की विद्रूपता नजर आई, से सहज मिलान कर सकेंगे? वे तब क्‍या सोच रहे होंगे?
            आज समाज में नई-पुरानी पीढ़ी के बीच जो स्थिर मनमुटाव है, वह उक्‍त कारणों से ही उपजा है। यदि एक वृक्ष हमें विनम्रता का पाठ पढ़ाता है तो इसलिए कि वह खुद जीवनभर अपना प्राकृतिक उत्‍पादन करते हुए विनम्र रहा, सदैव झुका रहा, खुद के प्रति हुए मानवीय अन्‍याय का कभी विरोध नहीं किया। उसे देखकर कोई भी नया, नन्‍हा जीवन बिलकुल वैसा ही बन सकता है। लेकिन हम, जो जीवनभर अच्‍छाइयों और परोपकार का भाषण करते रहे और व्‍यवहार में बुराइयां कर उन्‍हें छिपाते रहे, क्‍या हम कभी किसी नए मानव के लिए किसी रूप में अनुकरणीय हो सकते हैं? हां, जब तक नया मनुष्‍य समझदार नहीं होता तब तक उसे ऐसे लोग अच्‍छाइयों के भाषण से अस्थिर जरूर करते रहते हैं। लेकिन समझदार होते ही उसकी नजर में दुनिया का दोगुलापन स्‍पष्‍ट हो जाता है। परिणामस्‍वरूप वह उसे सिखाई-पढ़ाई गई खोखली अच्‍छाई के बजाय अपना एक नया रास्‍ता बनाता है। दुर्भाग्‍य से यह रास्‍ता भी पतन की ओर ही जाता है।
            इन स्थितियों में बचा-खुचा समाजवाद, अच्‍छाई, मानवीयता और सज्‍जनता भी दम तोड़ती नजर आती है। आखिर इस कंटीले रास्‍ते को समरसता से कैसे पूर्ण किया जाए, यह चिन्‍तन भी तो इसी धरती के पुत्रों ने ही करना है। अभी तक पीढ़ियों के बीच का यह अन्‍तर यह कहकर परिभाषित किया जाता रहा है कि नए बच्‍चे, बड़ों का सम्‍मान नहीं करते। लेकिन पीढ़ियों की सोच के अन्‍तराल के वास्‍तविक कारण स्‍वीकार करने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई। इस दिशा में हमें मौलिक और व्‍यावहारिक तरीके से सोचना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

1 comment:

  1. ये बेहतरीन व नायाब पोस्ट है. आज की पीढ़ी को हम कुछ दे नहीं पा रहे हैं. हर कड़वे सच को एक झूठे आवरण में दिखा रहे हैं. जैविक मौलिकता से हमने अपना नाता तोड़ लिया है. दिक्कत यही से शुरू होती है.


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