Thursday, August 20, 2015

इतना तो सोचना ही चाहिए कि--

  • ''कुछ और बनने से पहले हम एक 'नैसर्गिक मनुष्‍य' बनेंगे, तो बात बनेगी और जिन्‍दगी संबंधों की कड़ुवाहट से बाहर निकल आएगी।''
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  • ''जो भी हम देखते-सुनते हैं उस पर कम से कम अपने अनुसार सोचने की जरूरत तो होनी ही चाहिए। भीड़ के हिसाब से चलना हानिकारक तो होगा ही।''
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  • ''धर्मगुरु या गुरुमाताएं जब अपने चमत्‍कार से करोड़ों प्रशंसक और पैसे बटोर सकते हैं, तो क्‍या ये कानूनी पकड़ से बचने की युक्ति-शक्ति नहीं प्राप्‍त कर सकते? पकड़े जाने पर इनके चमत्‍कार बंद-कुंद क्‍यों हो जाते हैं?''
विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. कम से कम अब इतना तो हो रहा है कि धर्म के नाम पर ठगने वालों की सच्चाई खून जोर-शोर से सामने आ रही है.

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  2. बिलकुल सच कहा है...सटीक चिंतन

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  3. मौलिक सोच का होना जरूरी है ... सार्थक चिंतन ...

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  4. सोचना तो चाहिए ही पर न जाने क्यूँ लोग इस विषय में कुछ भी सोचना समझना ही नहीं चाहते।

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