Monday, August 24, 2015

सन्‍मार्ग की स्थिर राह

से लगा वह जो वाद-विवाद कर रहा है, व्‍यर्थ है। और वह चुप होकर खुद से संवाद करने लगा। इस प्रकार उसने उस दिन से किसी से कभी ऊंचे स्‍वर में बात ही नहीं करी। किसी की बात से वह सहमत है या असहमत, यह सब वह लिखकर ही प्रकट करता। इस तरह सामान्‍य लोगों के लिए वह गूंगा, मतलबी, स्‍वार्थी मनुष्‍य हो गया। समझदार लोग उसका सम्‍मान करने लगे। इन सबसे अलग उसे स्‍वयं के लिए एक नई दृष्टि मिल गई। जिसमें वह जब भी अपने को और अपनी असंतुलित जिन्‍दगी को देखता, तो उसे संतुलित होने का उपाय भी अपने आप से ही मिल जाता।
            इतना होने के बाद भी उसके मानवीय गुण उपेक्षित होते रहे। वह अपने परिवेश के बुरे लोगों, बुरी बातों और बुरी सोच को बदल नहीं पा रहा था। उसे लगा लोगों से संवाद करके ही बुराई से बचने का आह्वान किया जा सकता है। बिना प्रवचन किए ये लोग अच्‍छाइयां नहीं अपना सकते। इन्‍हें अच्‍छाई के संकेत यदि किसी व्‍यक्ति में दिखाई भी दें तो ये उसके बारे में सोचने-समझने की लगन नहीं बढ़ा पाते। ये लोग उन बातों, कार्यों के प्रति शीघ्र आकर्षित होते हैं, जिनसे इनके तन-मन मलिन होते हैं। आखिर इन्‍हें सही रास्‍ते पर कैसे लाया जाए!
            वह अपने संतुलित व्‍यक्तित्‍व और सद्व्‍यवहार में आत्मिक रूप से रम गया। धीरे-धीरे उसने परिवेश के उन लोगों के बारे में विचार करना बंद कर दिया, जो कुमार्ग पर चल रहे थे। इसके बाद उसने महसूस किया कि उसे अपने पास-पड़ोस में वही लोग दिखाई देने लगे, जो उसकी प्रवृत्तियों पर चल रहे हैं। उसने उनमें से कुछ लोगों के मुख ध्‍यानपूर्वक देखे। उनमें से कई मनुष्‍य वही थे, जो उसके देखते-देखते उसके अच्‍छे व्‍यवहार की उपेक्षा करते रहे और गलत कामों में लिप्‍त रहे। लेकिन अब वे लोग उसकी तरह ही सोचने-समझने लगे और सद्व्‍यवहार करने लगे। उसने पूछा, आप लोगों ने कुमार्ग का त्‍याग किस प्रेरणा से किया। लोगों ने बताया, हमने आपका सन्‍मार्ग में लगा जीवन कुछ पल, कुछ दिन के लिए नहीं देखा। जब हम प्रतिदिन आपको अच्‍छाई की ओर उन्‍मुख होते हुए देखते रहे, तो हमने भी सोचा क्‍यों न हम भी यही उपाय करें। फि‍र हमने यह भी सोचा कि समाज में जब अधिकांश लोग कुमार्ग पर चल रहे थे, तो आप सन्‍मार्ग की यात्रा पर स्थिर रहे। तब हममें से कइयों ने सोचा कि हो सकता है आपको हमसे ज्‍यादा आनंद मिल रहा होगा। बस यही वैचारिक लगन हमें आपका अनुसरण करने की प्रेरणा देती रही। अंतत: हम आपकी राह पर चल पड़े।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अमर शहीद राजगुरु जी की १०७ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. मन भटकता तो ज़रूर है पर अपनी राह ही अच्छी ( सन्मार्ग) :)

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  3. सुन्दर आशावादी लेखन ... अपने मार्ग पे चलते रहना जरूरो प्रेरित करता है दूसरों को भी ...

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  4. जब आप स्वयं अच्छी राह पर चलते रहें तो निश्चय ही एक दिन दूसरे लोग भी उसका अनुसरण करेंगे...बहुत प्रभावी आलेख..

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  5. अगर सब लोग बस अपना-अपना जिम्मा ले लें सन्मार्ग पर चलने के लिए तो आजकल के प्रदूषित समाज का स्वतः क्षालन हो जाएगा. लेकिन सन्मार्ग पर चलने वाले लोग दूसरों के लिए शीघ्र प्रेरक नहीं हो पाते हैं. असन्मार्गी लोगों के लिए प्रेरक सवाल होते हैं...डिड यू हेव फन? ....ओह...यार आई फील लाइक आई ऍम लिविंग इन स्टोन ऐज'....यू नो व्हाट....दिस इस माय लाइफ एंड आई डोंट गिव ऐ डैम अबाउट व्हाट यू थिंक ऑफ़ माय लिव-इन-रिलेशनशिप .....सवाल यह नहीं है कौन सही है और और कौन ग़लत...सवाल यही है कि संमार्गियों के जीवन से सीख लेने के लिए लोग सोच क्यों नहीं पाते हैं?

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  6. क्या आज के इस आधुनिक युग में यह संभव है ?

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