Thursday, August 13, 2015

परिस्थिति में जीवन

मारी सोचने की प्रक्रिया कई परिस्थितियों से प्रभावित होती है। परिस्थितियों में हम खुद को जैसा ढालते हैं, सोचने की हमारी आदत पर वैसा ही असर पड़ता है। आमतौर पर जीवन-परिस्थितियां तंग व तनावपूर्ण होती हैं। अधिकांश लोग तंगी व तनाव में हाथ-पैर, विचार-भावना सब छोड़ देते हैं। खुद को परिस्थिति के हवाले कर देते हैं। और इसके बाद हम जो कुछ भी सोचते हैं, उसमें हमारे दिमाग और दिल से अनुभव किया गया कुछ भी नहीं होता। हम बाह्य जगत के भाव-विचार से अपनी जिन्‍दगी के काम और लक्ष्‍य तय करने लगते हैं। इस प्रकार के जीवन में मौलिकता नहीं रहती। ऐसी जीवनचर्या मनुष्‍य स्‍वभाव के विपरीत है। स्‍वभाव अगर नवीनता, सकारात्‍मकता का है और आवरण भेड़चाल व नकारात्‍मकता का ओढ़ लिया जाए तो मानवता का पतन तय है। समस्‍या यही है कि आज ज्‍यादातर लोग सोच-विचार-भाव-अभाव की स्‍वभावगत क्रिया-प्रतिक्रिया से विलग हैं। दबाव की ऐसी मानसिक-शारीरिक कसरत लक्ष्‍यविहीन होती है, जबकि मानवीय जीवन एक निर्धारित लक्ष्‍य के बिना अपरिपूर्ण है। अच्‍छी बातों, ऊंचे विचारों और सकारात्‍मक मनोभावों का समावेश व्‍यक्ति में तभी हो पाता है, जब वह खुद को अनावश्‍यक व बुरे सामाजिक चाल-चलन से दूर रखे। जिस प्रकार जीवन में भोजन, पानी, शारीरिक व्‍यायाम आदि दिनचर्याओं का नियमन होता है, उसी प्रकार सकारात्‍मक विचार भी, व्‍यक्तित्‍व की उन्‍नति के लिए किया जाने वाला एक निरन्‍तर अभ्‍यास है। इसमें कमी आते ही हम बुराई की ओर बढ़ने लगते हैं। निस्‍संदेह हमारा वर्तमान सामाजिक जीवन चुनौतियों से भरा हुआ है। इनसे पार पाने के लिए अच्‍छाइयां ही अंगीकार करनी होंगी। बुराइयां मिटाने के लिए भी अपने स्‍तर पर कुछ न कुछ योगदान, समाधान अवश्‍य करते हुए आगे बढ़ना होगा। हमारे जीवन का उत्‍कर्ष हो या हमारा जीवन होड़ व हवश का शिकार बने, दोनों विकल्‍प हमारे हाथ में ही हैं। कैसी भी परिस्थितियां हों, हमें जीवन के उत्‍थान की राह ही चुननी होगी। कहते भी हैं‍ कि परिस्थितियों का दास मनुष्‍य को कभी नहीं बन चाहिए, बल्कि अपने मनोयोग से उन्‍हें अपने अनुकूल ढालना चाहिए। यह तो तय है कि परिस्थितियां आधुनिक काल में ज्‍यादातर प्रतिकूल ही रहनेवाली हैं, जरूरत उन्‍हें आत्‍मविश्‍वास के सहारे मानवता के अनुकूल बनाने की है। जीवन में परिस्थिति कैसी भी हो, हमें जीवन को हर हाल में संभालना है।

4 comments:

  1. अक्सर लोग यही सोचते हैं कि परिस्थिति ऐसी हो गयी है, चलो समझौता कर लेते हैं. उदाहरण के तौर पर चलन तो यही हो गयी है जो जन्म देने वाले है, उन्हें ही सबसे पहले हाशिये पर धकेला जा रहा है. उन्हें जवाब २५ साल मिलेगा, ये अलग बात है. लेकिन जो अंधी दौड़ में हैं उन्हें अभी के बाह्य चमक में दिख नहीं रहा है कि जीवन में आदर्श क्या है.

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  2. बहुत शानदार ,आपको बहुत बधाई

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  3. विपरीत परिस्थितियां सभी के जीवन में आती हैं लेकिन उनके समक्ष समर्पण किसी तरह श्रेयस्कर नहीं. सकारात्मक सोच का हाथ पकड़ कर विपरीत परिस्थितियों का सामना करके ही आगे बढ़ा जा सकता है....बहुत प्रभावी और सारगर्भित आलेख..

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  4. सच है। लेकिन यह तभी संभव है जब एक आम इंसान को अपनी नैतिक जरूरतों की सही ढंग से पूर्ति हो जाए तभी तो उसे इस सब से ऊपर उठकर कुछ और सोचने का अवसर मिलेगा अन्यथा यह संभव नहीं है।

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