Tuesday, August 11, 2015

फणीश्‍वरनाथ रेणु का मैला आंचल

हुत पहले, शायद १९९८ में मैला आंचल पढ़ा था। आज उस बात को सत्रह साल बीते। तब मेरी उम्र इक्‍कीस वर्ष थी। और सन् २०१५ तक मैं भूल चुका था कि मैला आंचल का कथानक क्‍या है। लेकिन पिछले हफ्ते फि‍र मैला आंचल पढ़ी। चार-पांच दिन लगे इसे पढ़ने में। इस बार यह उपन्‍यास और इसकी कहानियां मेरे अन्‍तर्मन की संवेदनाओं से एकाकार हो गईं।
            सात दशक पहले के कालखण्‍ड में पूर्वी बिहार के एक अंचल के मानवीय जीवन और उसकी दैनिक घटनाओं को जिस तात्‍कालिकता से इस उपन्‍यास में उकेरा गया है, वह उस जीवन का एक वास्‍तविक चलचित्र बनकर उभरता है।
स्‍वतन्‍त्रता संग्राम की गूंज हवाओं में थी। पढ़े-लिखे लोगों के लिए स्‍वतन्‍त्रता, भारत, इंग्‍लैंड, स्‍वतन्‍त्रता आंदोलन और उससे प्रभावित-दुष्‍प्रभावित कई जीवन-सम्‍यक विषयों को समझना आसान था। लेकिन ग्रामीण पृष्‍ठभूमि से जुड़े जमींदार, तहसीलदार, हलवाले, चरवाहे और साधारण ग्रामवासी को किसी भी विषय को अफवाहों के आधार पर ही समझना होता था। इसी से गांव की विभिन्‍न जातियों में मनमुटाव, तनाव, भेदभाव और ईर्ष्‍या बढ़ने लगी। ब्राह्मण, राजपूत, कायस्‍थ, अहीर, शूद्र और गांव से दूर बसे कहीं बाहर से आए हुए संथाल जाति के लोगों के मध्‍य कई स्‍तर पर बातें बनती-बिगड़ती रहीं। प्रमुख जातियों के मान-सम्‍मान प्राप्‍त व्‍यक्तियों के बीच जो आपसी ऐंठन थी, उसके दुष्‍परिणाम अंतत: पूरे गांव को भुगतने पड़े।
उपन्‍यास कथा के मुख्‍य पात्र हैं प्रशान्‍त कुमार और कमली। प्रशान्‍त कुमार एक डाक्‍टर है। जो अपनी डाक्‍टरी की शिक्षा पूरी करके शहर के किसी सुविधा संपन्‍न चिकित्‍सालय में मरीजों की सेवा करने के बजाय इस गांव को अपनी डाक्‍टरी सेवा के लिए चुनता है। बीमार लोगों की सेवा-सुश्रूषा करते हुए वह उनके ग्रामीण मनोविज्ञान से भी भलीभांति परिचित होता है। इसमें उसे ग्रामीण लोग एक नजर से तो अंधविश्‍वासी, नासमझ, मूर्ख दिखते हैं। लेकिन दूसरी दृष्टि से यही ग्रामीण उसे ऐसे ठग प्रतीत होते हैं, जो उसकी भावनाओं-संवेदनाओं-मानवीय विचारों की आसानी से चीर-फाड़ करके उसे किंकर्तव्‍यविमूढ़ छोड़ देते हैं।
क्षेत्र के तहसीलदार की बेटी कमली भी रोगी बनकर प्रशान्‍त से मिलती है। और धीरे-धीरे कमली के रोग को ठीक करते हुए प्रशान्‍त उसके प्रेम में बीमार पड़ जाता है। दोनों का पवित्र प्रेम अविवाहित रहते हुए एक बच्‍चे के जन्‍म की परिणति तक पहुंच जाता है।
संथाल जाति की भूमि को हड़पने के लिए जब सामान्‍य पैंतरे काम नहीं आते तो तहसीलदार गांव की विभिन्‍न जातियों के लोगों को इकट्ठा कर संथालों पर आक्रमण कर देता है। खून-खराबे, मारपीट और विध्‍वंस के बाद गांव में पुलिस का आगमन होता है। स्‍वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के नेताओं का वर्चस्‍व था। साथ-साथ मार्क्‍सवाद की विचारधारा पसंद करनेवाले नेता भी उभर रहे थे। गांव में भी कुछ लोग कांग्रेसी ध्‍वज तले तो कुछ मार्क्‍सवादी पताका थामे स्‍वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में शामिल थे। पुलिस की नजर में मार्क्‍सवादी विचारधारा का अनुसरण करनेवाले संदेहास्‍पद थे। षडयंत्र से पुलिस को बताया गया कि संथालों पर आक्रमण का नेतृत्‍व करनेवाले मार्क्‍सवादी हैं। परिणामस्‍वरूप कई लोगों को हिंसा, उत्‍पात के लिए जेल में डाल दिया गया।
डाक्‍टर प्रशान्‍त कुमार पर मार्क्‍सवादी होने का शक पुलिस को इसलिए हुआ कि डाक्‍टरी की पढ़ाई के दौरान उसके अधिकांश सहपाठी मार्क्‍सवाद को मानने वाले थे। उसके घर पर मार्क्‍सवादी पुस्‍तकें पाए जाने से पुलिस का शक सच में बदल गया। इस तरह गांव में हुई हिंसा में किसी भी रूप में शामिल न होकर भी प्रशान्‍त कुमार को जेल हो गई। कमली उसके विरह में तड़पती रही।
मठ, मठ के महन्‍त, मठ की कोठारिन, कुश्‍ती और कुश्‍ती के अखाड़े में अहीर पहलवानों के दांव-पेच, गांधीवादियों द्वारा गांव में चरखा-कतली का प्रशिक्षण और बहुत से जीवन उपक्रमों से सजा यह ग्रामीण उपन्‍यास अपने आप में जीवन के कई आयाम समेटे हुए है।
अंत में कई रोचक कथा चरित्रों की मृत्‍यु, कई की अनुपस्थिति और मुख्‍य चरित्रों के स्‍थायी मिलन से यह उपन्‍यास ह्रदय में हलचल मचा गया। प्रशान्‍त और कमली फि‍र से प्रेम की हिलोरों में झूलने लगते हैं। प्रशान्‍त की डाक्‍टर मित्र ममता, प्रशान्‍त के प्रति अपने अप्रकट प्रेम को दर्शाने के लिए कमली और उसके बच्‍चे के प्रति हार्दिक स्‍नेह दिखाते हुए पूरे दस दिन गांव में ही गुजारती है। वह उसके बच्‍चे का नामकरण भी करती है--नीलोत्‍पल। केवल छप्‍पन वर्ष जिए फणीश्‍वरनाथ रेणु मैला आंचल लिखकर साहित्‍य प्रेमियों के लिए अमर हो गए।

3 comments:

  1. बहुत ही बेजोड़ उपन्यास है विकेश जी .पूर्णिया और सहरसा अंचल की कमल-कीचड़ भरी माटी को जिन सच्चे रंगों से रेणु जी ने जीवन्त किया है अद्भुत है . कमली प्रशान्त की कथा जहाँ मन को गुदगुदाती है वहीं कोठारिन का चरित्र एक टीस से भर देता है .महन्त और मठों की वास्तविकता का बड़ा सूक्ष्म चित्रण हैं . इसमें विश्वनाथप्रसाद जैसे व्यवहार चतुर भी हैं और रामकिरपालसिंह जैसे सरल लोग भी हैं . स्वातन्त्र्य-संग्राम ,उसका ग्रामीण समाज पर प्रभाव तथा बाद में आए परिवर्तनों की झाँकी साफ दिखाई देती है .लोककथाओं और लोक परम्पराओं ने इसे और भी विश्वसनीय बनाया है . और भाषा तो कमाल हैं . कमली और प्रशान्त के लोक-विरुद्ध प्रणय को और उनके नवजात को जिस तरह लोकमान्य बनाया जाता है यह समरथ कों नहि दोष गुसांई को भी चरितार्थ करता है . हिन्दी के महान आंचलिक उपन्यासों में से एक है यह .

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  2. लगभग तीस साल पहले यह उपन्यास पढ़ा था और आपका आलेख पढ़ कर के एक बार फिर पढ़ने की उत्कंठा हो गयी...बहुत बहुत आभार

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  3. अच्छा किया आपने रेणु को याद करके. उनकी, लेखनी, उनके कथ्य का कायल कौन नहीं हो सकता.

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