Friday, August 7, 2015

सद्गुणों का विरोधाभास

च बताऊं दोस्‍तों जीवन मेरे वश में न रहा। मुझे उन पर घोर आश्‍चर्य होता है जो आत्‍मविश्‍वास, आशा और परिश्रम की बात करते हैं। क्‍योंकि सकारात्‍मकता के ये तीन वैचारिक स्‍तम्‍भ आज बहुत ज्‍यादा विरोधाभासी हो गए हैं। सबसे पतित आदमी जब आपको कहता है कि धीरज रखिए, सब ठीक हो जाएगा तो समझ लेना चाहिए कि दुर्जनता का बीज अंकुरित होने के लिए फड़क रहा है। साधन सम्‍पन्‍न और सुख‍-‍सुविधाओं से परिपूर्ण व्‍यक्ति का निर्धन और गरीब को धीरज की बातें सिखाना क्‍या किसी मानवीय स्‍तर की बात है। भरे हुए उदर के व्‍यक्ति से खाली पेटवाला रोटी मांगेगा तो क्‍या होना चाहिए। खाली पेटवाले को भोजन कराया जाना चाहिए। ना कि खाली पेटवाले से ये उम्‍मीद करनी चाहिए कि वह हर सुख से तृप्‍त आदमी की समृदि्ध और महत्‍वाकांक्षाओं के लिए अपने तन-मन की भेंट चढ़ाता जाए।
            मैं विदेश नहीं गया। देश में भी चार-पांच शहर ही देखें हैं। किसी शहर में तीन, किसी में दो तो किसी में कुछ महीनों या हफ्तों तक ही रहा। लेकिन ध्‍यानपूर्वक सभी शहरों के सड़कों के मानवीय जीवन को देखने पर यही पता चलता है कि पूरे भारत की स्थिति इससे अलग नहीं होगी। अधिकांश जनता आज भी सच में भूखी-नंगी है। यहां तक कि आधुनिक वेशभूषा, जीवन शैली अपनाकर घूमने वाली पीढ़ी भी पौष्टिक भोजन से वंचित है। इस पीढ़ी पर आधुनिक भागदौड़ का ऐसा भूत सवार है कि उसे अपने शरीर के बाहरी आवरण को ढकने के लिए तो कई प्रकार से कई वस्‍त्रों के बारे में सोचना पड़ता है। और वह अपने बाह्य शरीर के लिए अपनी उदार सोच को व्‍यवहारिक भी बनाता है। कई तरह के वस्त्र पहनता है। लेकिन दुखद है कि उसे अपने शरीर के अन्‍दर के अंगों की चिन्‍ता नहीं है। उसे उन अंगों के लिए जरूरी खाद्य पदार्थों, पौष्टिक आहार के बारे में सोचने का समय नहीं है। अपने बाहरी स्‍वरूप की तो वह बहुत व्‍यस्‍तता के बाद भी साज संभाल करता है। लेकिन बाहरी स्‍वरूप को बनाए रखने के लिए परमावश्‍यक अपने आन्‍तरिक अंगों के ज्ञान-विज्ञान से वह अपरिचित ही रहता है।
            ऐसा भविष्‍य किस काम का, जिसका वर्तमान ही मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो। और सबसे बड़ा आश्‍चर्य इस बात का कि यहां-वहां कई विद्यालयों-विश्‍वविद्यालयों, समाज कल्‍याणकारी संस्‍थानों, निजी व सरकारी कार्यालयों में असंख्‍य विद्वजन बैठे हैं, जो वर्षों से गरीबी और गरीबों के लिए संवाद कर रहे हैं, देश को सभी सुविधाओं से सम्‍पन्‍न बनाने के लिए बैठकें कर रहे हैं, निर्धनता को पाटने के लिए मौखिक पुल बना रहे हैं लेकिन आज तक हुआ क्‍या? कुछ भी तो नहीं! आत्‍मविश्‍वास, आशा और परिश्रम की बातें यदि एक आदमी के जीवन में मरते दम तक भी फलीभूत नहीं हों तो फि‍र इनका क्‍या अर्थ लगाया जाए? क्‍या यही कि यह शब्‍दोपक्रम इस जीवन में गरीबों को छलने के लिए ही बने हैं?
            छोटा सा जीवन है। जीवन-निर्वाह के लिए आधारभूत सामान जुटाने में सभी तो परिश्रम कर रहे हैं। लेकिन परिश्रम करते रहने के बाद समृदि्ध, मान-सम्‍मान, यश-कीर्ति की भेंट सबको कहां मिल पाती है! यदि अधिकांश लोग जीवन की सर्वश्रेष्‍ठ प्राप्तियों से मरने तक वंचित रहते हैं तो निस्‍संदेह उनका जीवन आशा-विश्‍वास और परिश्रम के गुणों को अपनाने में संकोच ही करेगा। यह भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के तले मानवीय जीवन के सद्गुणों का कष्‍टकारी विरोधाभास ही तो है। 

3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ०८ अगस्त, २०१५ की बुलेटिन - "पश्चाताप के आंसू" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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  2. bahut achhi aur sarthk rachna ...

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  3. यदि अधिकांश लोग जीवन की सर्वश्रेष्‍ठ प्राप्तियों से मरने तक वंचित रहते हैं तो निस्‍संदेह उनका जीवन आशा-विश्‍वास और परिश्रम के गुणों को अपनाने में संकोच ही करेगा। यह भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के तले मानवीय जीवन के सद्गुणों का कष्‍टकारी विरोधाभास ही तो है। … सटीक सार कथन।
    कहना सरल है लेकिन वास्तविकता जब सामने होती है तब समझ आता है कि दुनिया में जीवन एक सा नहीं जीते लोग
    सार्थक चिंतनभरी प्रस्तुति

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