Tuesday, July 7, 2015

पत्रकारिता क्‍यों न हो मिट्टी के पूत के लिए

प्रा: देखने में आता है कि जरूरी मुद्दों पर जब राजनीतिक पार्टियों के परस्‍पर वाद-विवाद  होते हैं, तब ही जनसंचार माध्‍यम सक्रिय होते हैं। प्रश्‍न यह है कि क्‍या जनसंचार माध्‍यमों (समाचारपत्र या इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यम) को राष्‍ट्र के लिए आवश्‍यक विषयों के बारे में स्‍वयं ही आवाज नहीं उठानी चाहिए? आजकल यह समझना आसान है कि समाचार कैसे धन की शक्ति से बदलने-बनने-बिगड़ने वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं। तात्‍पर्य यह कि समाचारों को प्रभावशाली लोग अपने हित के अनुरूप छपवा या हटा सकते हैं। राष्‍ट्र, राष्‍ट्रीयता या मानव कल्‍याण की सत्‍य भावना का विकास क्‍या ऐसी पत्रकारिता के बलबूते कभी हो सकता है? क्‍या इस विषय पर गम्‍भीरता से नहीं सोचा जाना चाहिए? जब तक मीडिया और समाचारों की मौलिकता स्‍थापित नहीं होगी, पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ मानदंड कैसे स्‍थापित हो सकेंगे? फलस्‍वरूप व्‍यक्ति, समाज और सरकार का उचित मार्गदर्शन भी ऐसे में कभी नहीं हो सकता।
काश ऐसा होता कि मीडिया के विचार के केन्‍द्र में किसान और उनके कार्य होते। उनके बच्‍चों की पढ़ाई-लिखाई, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के बारे में सोचा-विचारा जाता जनसंचार माध्‍यमों में। पत्रकारिता कृषकों के बारे में क्‍यों नहीं सोचती, उनके बच्‍चों की निश्‍छल हंसी के परिशिष्‍ट क्‍यों नहीं निकालती! कृषकों के परिश्रम का वर्णन, कृषि-कार्य संबंधी उनकी दिनचर्या के समाचार क्‍यों नहीं दिए जाते नियमित रूप से! इन मिट्टी के दीवानों के कारण ही आधुनिकता की सारी शानो-शौकत, राजनीति, काम-धंधे, उद्योग-व्‍यापार, लड़के-लड़कियों की अकड़-ऐंठ, हुल्‍लड़बाजी, प्रेम-नफरत सब है। लेकिन कहां हैं वह संस्‍कार, जो सोचे कि मिट्टी के दीवाने भी पूजे और सराहे जाने चाहिए, पसंद किए जाने चाहिए, उनके ऑटोग्राफ लिए जाने चाहिए, उन पर लड़कियां मरी जानी चाहिए, लड़कों का उन जैसा बनने का स्‍वप्‍न हो। .....कहां हैं, किसी के भी तो नहीं हैं ऐसे संस्‍कार, जो कृषकों को सम्‍मान दे।
क्‍या पत्रकारिता को यहां से शुरुआत नहीं करनी चाहिए प्रत्‍येक दिवस की! यदि यह हो जाए तो व्‍यक्ति, समाज, सरकार सब के संस्‍कार बदल जाएं। दुनिया सहित अपना राष्‍ट्र जीवन की श्रेष्‍ठताओं के साथ रहने योग्‍य बन जाए!
विकेश कुमार बडोला

6 comments:

  1. पत्रकारिता ही क्यों ,लगभग सभी संचार माध्यम सिर्फ चकाचौंध से प्रेरित हैं . समाचार ,कहानियाँ ,धारावाहिक ..विज्ञापन सभी तड़क-भड़क वाले ही होते हैं . धारावाहिक देखकर लगता है कि देश में केवल सोफा-संस्कृति ही रह गई है .गाड़ी बँगला भारी-भरकम जेवर , मँहगे लिबास ..से नीचे बात ही नही होती .विवाह संस्था एक तमाशा बनाकर रखदी गई है ..इस विषय में गहराई से सोचा जाना चाहिये . अच्छे विचारों की सही अभिव्यक्ति है .

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  2. आज पत्रकारिता केवल एक व्यवसाय बन कर रह गयी है. ऐसी परिस्थिति में कौन किसानों के बारे में सोचेगा, कौन उनके लिए आवाज़ उठाएगा, कौन संस्कारों और सच्चाई की बात करेगा...बहुत सार्थक प्रश्न उठता आलेख...

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  3. कांग्रेस के भांडों को कौन घास डालेगा फिर ?

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  4. दरअसल हर बात में सनसनी फैलाने की आदत है आज के प्रचार तंत्र को ... हर समस्या और कसूर को सिर्फ राजनीति से ही जोड़ा जाता है ... नेता लोगों को मध्य में रख कर हर अच्छी/खराब खबर बुनी जाती है ... उन्हें या तो राम या रावण बना दिया गया है आज और बाकी सब को प्रजा और खुद मीडिया ने ये ठेकेदारी ले ली है ... पिछले २० वर्षों में ये सब चाटुकार पत्रकारों की वजह से हुआ है जिसने देश को दो खेमों में बाँट दिया है ...

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  5. जनसंचार माध्‍यम शहरी चकाचौंध में खोये रहते हैं। साधारण दिखने वाले किसान उन्हें बेजान फ़ीके रंग के तरह नज़र आते हैं इसलिए वे उन तक नहीं पहुँचते, . उनके बारे में नहीं सोचते। । घोर बिडम्बना है यह मीडिया की. जो सबका पेट भरते हैं वे उन्हें नज़र नहीं आते हैं।
    सार्थक चिंतनशील प्रस्तुति

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  6. सही लिखा है; लेकिन 'हाशिये' के लोग खुद जीवन भर ब्रेक होते रहने के बावजूद ब्रेकिंग न्यूज़ देने के लायक नहीं हो पाते. यही बात मीडियावाले जानते हैं.

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