Sunday, June 21, 2015

'अच्‍छे दिन' का तात्‍पर्य कैसे समझा जाए

जीवन बहुत ज्‍यादा परिवर्तनशील है। भौतिक रूप में जीवन में जो परिवर्तन होता है, उसे देखा जा सकता है। आवश्‍यकता अनुसार उसमें सुधार किया जा सकता है। लेकिन अपने ह्रदय में घट-बढ़ रहे कितने ही बदलावों से हम सामान्‍य मनुष्‍य के रूप में अनजान ही रहते हैं। इन बदलावों के बारे में भी हम तब जान पाते हैं, जब हम जीवन में प्रतिपल एक नई सोच और नया विचार बनाते हैं।
            आजकल मन में कई महत्‍वाकांक्षाएं हैं। इनके पूरे होने की स्थिति तब बने जब इनकी शुरुआत हो। अन्‍य लोगों की तरह मैं भी सांसारिक ज्ञान से संचित होना चाहता हूँ। ऐसा सांसारिक ज्ञान, जो एक वैचारिक सीमा में जाकर घनघोर अज्ञान प्रतीत होता है। इस समय का ज्ञान सूचनाओं के एकत्रीकरण पर टिका हुआ है। सूचनाओं और जानकारियों के भराव से हरेक आदमी का दिमाग कूड़ाघर बन गया है। ऐसी लहर चल रही है कि यदि आप एक भी सूचना से अनभिज्ञ रहे तो जीवन पिछड़ जाएगा। हम यह भी नहीं सोचते कि जो हम बनना चाह रहे हैं, जो विद्वता ग्रहण करना चाह रहे हैं, उस तक पहुंचने के लिए यह सूचना व जानकारियों से भरा मार्ग काम नहीं आएगा। लेकिन नहीं आगे बढ़ना है। दैनिक पत्रों में व्‍यंग्‍य,विनोद और मजाक में लिख-लिख कर लेखन जगत में छा जाना है। क्‍या सच में जीवन की बातें मजाक हैं या क्‍या जीवन का उत्‍थान व्‍यर्थ मजाकिया बातों से हो सकता है? आजकल के लेखकों के लेखन को देखकर तो यही लगता है।
            देश में पिछले एक वर्ष से भाजपा के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का शासन है। सबसे पहले तो देश के अधिकांश लोगों (कांग्रेसियों, उग्र वामपंथियों व इन जैसे अन्‍य लोगों को छोड़कर) को धीरज है कि देश में कोई राजनीतिक दल शासन कर रहा है। शासन का संचालन अत्‍यंत पारदर्शी तरीके से हो रहा है। देश के केन्‍द्रीय शासन में जन सहभागिता भी बढ़ी है। पिछले एक साल में एक भी घोटाला नहीं हुआ। जिन सेवाओं के आबंटन से यूपीए सरकार ने देश के कोष से लाखों करोड़ रुपए लुटाए, उन्‍हीं की स्‍वच्‍छ व पारदर्शी नीलामी से एनडीए शासन में लाखों करोड़ रुपए सरकारी कोष में आए। केन्‍द्रीय शासन के स्‍तर पर एक रुपए का भी हेर-फेर नहीं हुआ। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान त्‍वरित जान-माल बचाव अभियान शुरू हुए। किसानों के लिए जरूरी कल्‍याणकारी मंचों की स्‍थापना हुई। मृदा स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण, खेती-किसानी आधारित दूरदर्शन चैनल आदि योजनाओं का विस्‍तारपूर्वक अध्‍ययन करने के बाद कोई मूर्ख ही इन्‍हें किसान विरोधी कह सकता है। प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा, दुर्घटना सुरक्षा, अटल पेंशन योजना, मुद्रा बैंक जैसी योजनाओं से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और कामगारों के जीवन को बहुस्‍तरीय सुरक्षा मिली। इतना सब होने के बाद भी कांग्रेस के प्रतिनिधित्‍व में उग्र लोग, इनका समर्थक मीडिया और देश-विदेश में लेखक-पत्रकार के रूप में शब्‍दों और अंकों के ज्ञानीजन ''अच्‍छे दिन'' वाक्‍य-युग्‍म के सहारे नरेन्‍द्र मोदी का अनुचित विरोध कर रहे हैं।
            यदि कांग्रेस के बहुमत वाले यूपीए से छुटकारा पाने के लिए 2014 लोकसभा चुनाव में नरेन्‍द्र मोदी ने बहुमत से चुनाव जीतने पर लोगों से 'अच्‍छे दिन' आने का वादा किया था, तो उसका तात्‍पर्य यह नहीं था कि देश का एक-एक आदमी एक वर्ष में पान-गुटखा चूसते-थूकते, दारू पीकर मां-बहन की गालियां देते हुए धन-सम्‍पत्ति से संपन्‍न बन जाएगा। देश के अच्‍छे दिन लाने के लिए प्रधान सेवक ने शुरुआत कर दी है। लोगों को भी अपने-अपने स्‍तर पर अपने कार्य देश हित का ध्‍यान रखते हुए करने होंगे।
            साठ वर्ष से चले आ रहे बुरे दिन एक साल में कैसे खत्‍म हो सकते हैं। हां, बुरे दिनों को खत्‍म करने के लिए केन्‍द्रीय शासन की जो योजनाएं, नीतियां पिछले एक साल में बनीं और उनका जो दीर्घकालिक प्रभाव होगा, निश्चित रूप से उससे देश में लोगों के अच्‍छे दिन जरूर आएंगे। बुरे दिनों के आभास से छूटने के लिए क्‍या यह कम सुखद अनुभव है कि एनडीए शासन के एक वर्ष में एक भी बड़ा घोटाला नहीं हुआ! क्‍या यह छोटी बात है कि आज देश के समझदार आदमी को देश में कोई राजनीतिक पार्टी शासन करती हुई लगती है! पिछले तीन सौ पैंसठ दिनों में संसद, संविधान, विधि-विधान की मौलिकता स्‍थापित हुई है। जब‍कि एक साल पहले तक तो केन्‍द्रीय शासन का आभास ही जनमानस से मिट चुका था। लगता ही नहीं था कि देश में कोई सरकार है। कांग्रेस की आवाज बनकर जो लोग कहते हैं कि इस सरकार ने पूंजीपतियों, बड़ी-बड़ी कंपनियां चलानेवालों या व्‍यापार करनेवालों को फायदा पहुंचाया, तो उन्‍हें ढंग से ज्ञात हो जाना चाहिए कि कंपनियों, उद्योगों, व्‍यापारिक उपक्रमों और पूंजी आधारित व्‍यवस्‍था की स्‍थापना कांग्रेस के ही प्रमुख दिवंगत नेताओं की अवधारणा थी। जब पूरा विश्‍व छोटी से बड़ी वस्‍तु के उत्‍पादन-उपभोग और क्रय-विक्रय के लिए एक सदी से अधिक समय से परस्‍पर निर्भर हो चुका हो, तो इस व्‍यवस्‍था को केवल राजनीतिक लाभ लेने और गरीबों को पूंजीपतियों के विरोध में उकसाने मात्र से कैसे बदला जा सकता है।
            कृषि आधारित परंपरागत जीवन किसे अच्‍छा नहीं लगता। जो पीढ़ी बीसवीं सदी का उत्‍तरार्द्ध और इक्‍कीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध जी चुकी होगी, चाहे वह देशी पीढ़ी हो या विदेशी, उसे परंपरा और आधुनिकता दोनों कालखण्‍डों में जीवन गुजारने का मौका मिला। और अपने इस अनुभव के आधार पर वह दोनों प्रकार के जीवन की तुलना करती है, तो निश्चित रूप से परंपरागत जीवन को ही अधिक उचित मानती है। इस मान्‍यता में पीढ़ी किसी राजनीतिक पार्टी, औद्योगिक प्रवृत्ति, कॉर्पोरेट जीवन-शैली या सामाजिक प्रभाव से प्रभावित हुए बिना ही अपने स्‍वयं के जीवन पर पड़ते इन सबके दुष्‍प्रभाव के कारण परंपरा के प्रति झुकाव रखती है। इस स्थिति में तो संवदेनशील कांग्रेसी या भाजपाई या कोई अन्‍य व्‍यक्ति औद्योगीकरण, पूंजीवाद और इनके आत्‍मघाती सामाजिक असर को नापसंद ही करेगा। लेकिन जब उद्योग संचालित करनेवाले पूंजीपति एक बड़े निजी रोजगार सेवा क्षेत्र के रूप में बदल चुके हों और करोड़ों लोग राष्‍ट्रीय नागरिकता के बावजूद जीविका के लिए इन उद्योगों पर निर्भर हों, तो इनका विरोध कैसे किया जा सकता है कैसे यह बोला जा सकता है कि कोई सरकार गरीबों और किसानों का अहित कर उद्योगपतियों की हितैषी बन रही है? आज जीवन की जरूरतों के लिए कृषि और उद्योग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इन दोनों में से किसी एक की तरफदारी और दूसरे की अनदेखी नहीं हो सकती। दोनों को संतुलित तरीके से संचालित करना होगा। दोनों क्षेत्रों के सामाजिक, पारिश्रमिक और मानवीय हितों की रक्षा तो करनी ही होगी। कम से कम इस आधार पर तो केन्‍द्र सरकार को 'बुरे दिन' के लिए घेरना क्षुद्र राजनीतिक लालसा ही होगी।
विकेश कुमार बडोला

1 comment:

  1. मेरा अपना अनुभव यही है कि पूर्णता कहीं नहीं है. ग्राम्य जीवन की कई खूबियाँ हैं और कुछ खामियाँ भी. शहरी जीवन का भी कुछ पक्ष अच्छा है, कई पक्ष अच्छे नहीं है. मुझे नही लगता कि इस सांसारिक जीवन में रहकर सुख के पूर्णता की प्राप्ति की जा सकती है. शायद आध्यात्मिक मार्ग ही उसका उत्तर हो. वर्तमान सरकार का एक सरकार सक्रियता से भरा रहा है और आगे काफी उम्मीदें है. मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद भ्रष्टाचार निर्मूलन से है.

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