Saturday, June 6, 2015

'अच्‍छे दिन' से तात्‍पर्य

भाजपा के नेतृत्‍व में राजग सरकार की एक वर्ष की उपलब्धियों पर विपक्ष कांग्रेस की अगुआई में कुतर्कों, विवादों के सहारे प्रहार कर रहा है। २०१४ के लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार-प्रसार करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने भाजपा के पूर्ण बहुमत से जीतने पर 'अच्‍छे दिन' आने की बात क्‍या कह दी, विपक्ष और विपक्षी समर्थन में खड़ा मीडिया केन्‍द्र सरकार को घेरने के लिए आज तक उसका व्‍यंग्‍यपूर्ण इस्‍तेमाल कर रहा है। स्वाभाविक है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी कुछ भी करने का संकल्‍प-संव्‍यवहार तब ही करेगी जब वह सत्‍ता में आएगी। और सत्‍ता में आने के लिए यदि नरेन्‍द्र मोदी ने 'अच्‍छे दिन' का सकारात्‍मक वाक्‍य-युग्‍म चुना तो इसमें गलत क्‍या था। यह एक सामान्‍य समझ की बात है कि 'अच्‍छे दिन' का तात्‍पर्य मात्र एक वर्ष की अवधि में पिछले साठ सालों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सामरिक विसंगतियों को स्‍थायी रूप से समाप्‍त करने से नहीं है। और यह हो भी नहीं सकता। लेकिन प्रारंभिक‍ एक वर्ष में राष्‍ट्र की अनगिन समस्‍याओं में से मूल समस्‍याओं के समाधान के लिए कुछ योजनाएं और नीतियां लागू कर, उनका संकल्‍पबद्ध क्रियान्‍वयन सुनिश्चित करना क्‍या अच्‍छे दिन का द्योतक नहीं हो सकता।
कांग्रेस के नेतृत्‍व में संप्रग सरकार पिछले दस सालों में देश के बहुसंख्‍यकों से उनके धार्मिक अधिकार तक छीनने की क्षुद्र राजनीति करने लगी थी। ऐसे में उससे भारत में एक समावेशी विकास की अवधारणा बनाकर काम करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी। दुर्भाग्‍य से उसके राजनीतिक रणनीतिकारों में से अधिकांश बहुसंख्‍यक बिरादरी से ही थे। लोकसभा चुनाव फि‍र जीतने की लालसा में इनकी राष्‍ट्रीय योजनाएं इस आधार पर तय होने लगी थीं कि भारत में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है और हिन्‍दू परिवार सीमित होते जा रहे हैं या अधार्मिकतावश समावेशी समाज के अंग बनते जा रहे हैं। परिणामस्‍वरूप अपनी सरकार के लाखों-करोड़ों रुपए के घोटालों के उजागर होने, न्‍यायिक सक्रियता के बावजूद घोटालों के आरोपियों के बरी हो जाने और घोटालों के रुपयों की वसूली नहीं होने के कारणों से कांग्रेस लोगों का ध्‍यान भटकाने वाले मुद्दे लेकर बैठ गई। वैसे भी आर्थिक रूप से देश को पंगु बना चुकी संप्रग सरकार पर घोटालों, कालेधन और अवैध मुद्रा लेन-देन के बाबत स्‍पष्‍टीकरण देकर चुनाव लड़ने की नैतिक जिम्‍मेदारी थी। लेकिन वह अपने कुतर्कों, विवादित बयानों के सहारे इससे बचती रही। चुनाव में किस सहारे खड़ी हो, इसके लिए उसने मुसलमानों में अपनी छवि चमकाने के लिए अनावश्‍यक दंगा विरोधी विधेयक भी संसद-पटल पर रख दिया। इस विधेयक के विवादित प्रावधानों में संदेहास्‍पद मुसलिम आतंकवादियों के प्रति सीधे कठोर कानूनी कार्यवाही न करने और हिन्‍दू आतंकवादियों के प्रति ठोस कार्यवाही करने का वर्णन था। इन सब गल‍त नीतियों से कांग्रेस भारतीय बहुसंख्‍यक जनमानस के लिए अप्रासंगिक हो चली थी। जनता के लिए उसे बर्दाश्‍त करना मुश्किल था।
ऐसे में वह 'अच्‍छे दिन' का मजाक बनाकर भाजपा विरोधी दुष्‍प्रचार करने का दुस्‍साहस कर रही है, तो इसमें उसके द्वारा वर्षों पूर्व स्‍थापित मीडिया प्रतिष्‍ठानों का हाथ भी है, जो अपनी आंखों से दो अलग सरकारों के विकास सूचकांक को स्‍पष्‍ट देखने और उसमें भाजपा के भारी पड़ने के बावजूद, कांग्रेस के ऐसे गुप्‍त समर्थन में लगे हुए हैं, जो सामन्‍य समझ रखनवाले भारतीय को भी स्‍पष्‍ट दीख रहा है।
केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल के वरिष्‍ठ मंत्रियों के अनुसार पिछले एक साल में देश में लोकतांत्रिक शासन की शुचिता और गौरव स्‍थापित हुआ है। यह बात मानने योग्‍य है। वास्‍तव में एक साल पहले तक औद्योगिक, आर्थिक रूप से थोड़ा-सा विकसित होने के बावजूद सामाजिक और लोकतांत्रिक रूप से देश की प्रतिष्‍ठा दांव पर लगी हुई थी। हमें ज्ञात है पर हम भूल जाते हैं कि संस्‍थागत कार्य किसी एक व्‍यक्ति के बलबूते नहीं होते। लोकतांत्रिक हो या व्‍यापारिक, संस्‍थाओं का विकास क्रमश: उसके प्रत्‍येक नागरिक और पदाधिकारिक इकाई द्वारा संपन्‍न होता है। अंतर यहां से उत्‍पन्‍न होता है कि संस्‍थाओं का नेतृत्‍व संभालनेवालों की मानवीय प्रवृत्ति क्‍या है या उनका दृष्टिकोण कितना उदार है। इतने बड़े देश को लोकतांत्रिक, संवैधानिक योजनाओं के अनुसार तब ही चलाया जा सकता है, जब इसका केन्‍द्रीय नेतृत्‍व सशक्‍त, परिश्रमी और संस्‍कारित हो। देश की सम्‍पूर्ण प्रशासनिक संरचना को कड़ी-दर-कड़ी कर्मठ, पारदर्शी और उत्‍तरदायी बनाने के लिए जिस केन्‍द्रीय लोकतांत्रिक संस्‍था से ईमानदारी से कार्य करने की इस देश को सालों से अपेक्षा थी, वह अब पूरी होती नजर आ रही है।
प्रधानमंत्री जन-धन, सुरक्षा बीमा, जीवन-ज्‍योति बीमा, अटल पेंशन, मुद्रा बैंक जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू करने के साथ-साथ सरकार ने स्‍वर्ण बचत खाता योजना का प्रस्‍ताव भी रखा है। इन योजनाओं के दूरदर्शी परिणामों की कल्‍पना करके देखिए। नगण्‍य धनराशि के योगदान से खुलने वाली ये योजनाएं आम आदमी को भविष्‍य में बहुत अधिक सक्षम बनाएंगी। प्रत्‍येक योजना के व्‍यक्ति के आधार संख्‍या से जुड़ने के बाद इसमें किसी प्रकार की अड़चन आने की आशंका भी खत्‍म हो गई है। इनसे आदमी का जीवन ही सुरक्षित नहीं होगा, अपितु उसके माध्‍यम से राष्‍ट्रीय वित्‍त-पोषण का समुचित मूल्‍यांकन भी सुनिश्चित हो सकेगा।
पिछले एक साल में आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी कई महत्‍वपूर्ण कार्य हुए हैं। विद्युत पारेषण बढ़ा है। इसमें सुदृढ़ता आई है। केन्‍द्र सरकार की योजना के अनुसार सभी राज्‍यों ने सौर ऊर्जा विकल्‍प पर विचार किया है। केन्‍द्र के मार्गदर्शन से इसमें उन्‍हें सहयोग किया जा रहा है। विदेशों से व्‍यापार करने के लिए राज्‍यों की केन्‍द्र से स्‍वीकृति लेने की बाध्‍यता खत्‍म हुई है। नए वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक के अंतर्गत कराधान व्‍यवस्‍था को सुगम, पारदर्शी और जनानुकूल बनाया गया है। भूमि अधिग्रहण के संशोधित विधेयक को भी किसान और औद्योगिक लाभ के हिसाब से बनाया गया है। कोयला ब्‍लॉक एवं दूरसंचार सेवा आबंटन नई सरकार ने निश्चित प्रक्रिया के तहत नीलामी करके संपन्‍न किया। इससे, इन सेवाओं से लाखों करोड़ रुपए की आय अर्जित की गई। जबकि यही सेवाएं कांग्रेस सरकार के दौरान मनपसंद सेवा प्रदाताओं में बांट दी गईं थीं, जिससे कई लाख करोड़ रुपए का घोटाला हुआ। इस अवैध आबंटन से देश को कई लाख करोड़ रुपए की हानि हुई थी, जिसका आज तक कुछ पता नहीं है।  

6 comments:

  1. अच्छी बात को भी गलत रूप में प्रस्तुत करना ही अब विपक्ष-धर्म होगया है . मुझे हँसी आती है कि बिजली के कुछ देर के लिये जाते ही कुछ लोग कहते हैं--लो अच्छे दिन आगए . डीजल पर कुछ पैसे बढ़े कि लो अच्छे दिन आगए . उनसे पूछो कि कि क्या पहले बिजली नही जाती थी या कि पहले चीजों पर दाम नही बढ़ते थे . यह समय धैर्य रखकर देखने का है कि क्या होता है . सालों की व्यवस्था एक साल में तो नही न सँवर सकेगी .

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  2. प्रधानमंत्री के द्वारा शुरू की गयी तीनो योजनायें प्रशंसा के योग्य है. कभी-कभी सोचता हूँ कि स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद के बाद के जो पंद्रह साल थे वो देश के दशकों पीड़ित जनमानस के साथ कितना बड़ा छलावा लेकर आये होंगे. किसी भी नेता को आज अच्छे दिन की बात ही नहीं करनी होती अगर हमारे 'गुलाबी जननायक' ने वह संस्कृति ही नहीं स्थापित की होती जिसका परिणाम हम आज भोग रहे हैं.

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  3. मोदी जी अच्छे से काम कर रहे हैं .. एक साल की उपलब्धियां पिछले ६० सालों से कहीं ज्यादा लगती हैं मुझे तो ... इन सभी योजनाओं को जमीन पे आने तक का समय जरूर देना चाहिए ... इंसान की इमानदारी देखनी चाहिए ... ललक देखनी चाहिए ... आशा है देश की जनता भी ये सब देखेगी इमानदारी से ...

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  4. जिस तरह का मंथन आपने किया है इसी तरह व्यक्ति को बिना किसी की बातों में आकर स्वयं से ही सरकार के कामकाज पर स्वतंत्रता से विचार करना चाहिये। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वो महज कहीसुनी आलोचनाओं में आकर सरकार की निंदा-प्रशंसा न करे बल्कि स्वयं उन पर चिंतन-मंथन कर अपना दृष्टिकोण बनाये। सुंदर प्रस्तुति।

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  5. बहुत ही बढ़िया , जागरूक नागरिक इन बदलावों को समझ रहे हैं ।
    बाकितो राजनीतिक खेल में कमियां निकालना ही काम होता है

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  6. अच्‍छे दिनों से अाशय यह है कि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, यह दिन हमें कभी देखने को न मिलेंगें।

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