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Tuesday, June 30, 2015

पुरानी वस्‍तुओं की याद, भाग २

च्‍चों को जीवन की कड़वी सच्‍चाई ज्ञात नहीं होती। उन्‍हें जीवन की हर चीज और हर अनुभव बहुत आकर्षिक करते हैं। वे अपनी बढ़ती आयु के साथ अपने परिवेश, बाजार और घर-परिवार में जो भी वस्‍तुएं देखते हैं उनके प्रति उत्‍सुक होते हैं। वस्‍तुओं को अपने हाथों से पकड़ कर उन्‍हें इधर-उधर, चारों तरफ से देखने की जिज्ञासा उनमें बहुत गहरी होती है। इसीलिए तो उन्‍हें निश्‍छल, निष्‍कलंक और मन-के-सच्‍चे कहा जाता है। उनके जीवन में जो कुछ भी घटित होता है या उन्‍हें जो भी नई वस्‍तु कहीं दिखाई देती है, वे उसके प्रति कोई वैचारिक पूर्वाग्रह, कुण्‍ठा, क्रोध या भावना नहीं बनाते। वे उस वस्‍तु को अपने हाथों में लेकर बाल-सुलभ उत्‍सुकता से उसका निरीक्षण करते हैं। और जब किसी वस्‍तु से उनका मन भर जाता है या वे उससे ऊब जाते हैं, तो वे उसे बाल्‍य झुंझलाहट में एक किनारे पटक शीघ्र भूल भी जाते हैं।
किशोरावस्‍था तक पहुंचने पर बच्‍चे बातों, चीजों की स्‍मृतियां संभालने लगते हैं। चाहे-अनचाहे उन्‍हें वह बात या वस्‍तु याद रहती है, जिसके प्रति उनकी भावना बलवान हो। विगत संस्‍मरण में आज से पन्‍द्रह वर्ष पूर्व की उन वस्‍तुओं का वर्णन था, जिनसे आज के पन्‍द्रह वर्षीय किशोर प्रत्‍यक्ष रूप से अपरिचित होंगे।
आज ''पुरानी वस्‍तुओं की यादें'' श्रृंखला के अन्‍तर्गत याद करते हैं बीस वर्ष पहले का जीवन, उस समय की वस्‍तुएं और उनके प्रति तब के बच्‍चों की उत्‍सुकता। बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध यानि कि नब्‍बे का दशक यानि कि सन् 1990। तब की भारतीय सरकार ने देश में एक नीति लागू की-नवउदारीकरण। अधिकांश भारत यहां तक कि महानगरों में भी परंपरागत जीवन व्‍यतीत हो रहा था। रोटी, कपड़े की आवश्‍यकता तक सिमटे भारतीय जीवन में अचानक वित्‍तीय सहायता के नाम पर बैंकों से खूब ॠण (उधार) मिलने लगा।
इससे पहले उद्योगपति अपना उद्योग-व्‍यापार चलाने के लिए ॠण लिया करते थे। लेकिन नवउदारवाद ने आम लोगों के लिए भी ॠण लेकर आधुनिक सुविधाएं जुटाने की व्‍यवस्‍था कर दी। यूरोपीय देशों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन भारत में भी लागू हो गया। चार-पांच वर्ष तक नवउदारवाद के नकारात्‍मक प्रभाव सीधे उजागर नहीं हुए। लेकिन उसके बाद इसके प्रत्‍यक्ष दुष्‍परिणाम दिखने लगे। बैंकों से ॠण लेनेवाले अधिकांश लोगों ने ॠण का पैसा विलासिता में उड़ा दिया। उन्‍होंने ऊंची ब्‍याज दरों पर लिए ॠण का प्रतिभुगतान करने के लिए अपना कोई उद्यम नहीं किया। इस प्रकार बैंक ॠण वसूल नहीं कर पाए और हानि की स्थिति में पहुंच गए। इस आर्थिक मंदी का असर भारत पर आज तक है। किशोरावस्‍था से युवावस्‍था की ओर अग्रसर मैं और मेरे जैसे अधिकांश युवक उस समय इधर-उधर से नवउदारवाद के बारे में पढ़ते-सुनते तो थे, पर वह है क्‍या, इसकी सटीक जानकारी हमें न थी।
उस समय भी अनेक वस्‍तुओं के प्रति बच्‍चों की जिज्ञासा रहती। इनमें कुछ वस्‍तुएं देशी यानि कि पारंपरिक थीं तो कुछ विदेशी यानि कि आधुनिक व इलेक्‍ट्रानिक। ग्रामीण जीवन पूरी तरह परंपरागत वस्‍तुओं के उपभोग पर आधारित था। चूल्‍हा-चौका से लेकर खेती-बाड़ी के सभी कार्य पुराने ग्रामीण यंत्रों की सहायता से पूरे होते। पत्‍थर-मिट्टी से निर्मित चूल्‍हे में सूखी लकड़ियां ईंधन के रूप में प्रयोग की जातीं।
समाज के धनी लोगों के घरों में ''स्‍टोव'' नामक यंत्र प्रवेश कर चुका था। इसमें मिट्टी का तेल डालकर इसे जलाया जाता। हालांकि इसकी अग्नि ज्‍वालाएं एलपीजी गैस जैसी ही होतीं पर यह घर..घर..की ध्‍वनि बहुत करता था। मुझे तो इससे बेहतर चूल्‍हे पर लकड़ियां जला भोजन पकाना अधिक सुगम लगता। यदि किसी को उचित प्रकार से लकड़ियां जलाने का सऊर हो तो धुंआ बहुत कम होता था। स्‍टोव एक हाथ लंबा यंत्र था। तीन एकसमान ऊंचाईवाली धातु की डंडियों के सहारे अटकी इसके सबसे नीचे एक टंकी होती थी। और सबसे ऊपर डंडियों पर मध्‍य में आग की लपटों के खुले स्‍थान के चारों ओर भोजन पकाने के बर्तन को अटकाने की धात्विक पटि्टका होती। स्‍टोव की टंकी पीतल धातु की होती। टंकी पर स्‍टोव को खोलने और बंद करने का घुमावदार बटन लगा होता था। टंकी में मिट्टी का तेल होता। टंकी पर ही अंगूठे से दबानेवाला एक पंप लगा होता। इसके सहारे पंपिंग करके टंकी से तेल की बारीक धार नीचे तेलटंकी से लगी एक नली के सहारे नली के ही ऊपरी खुले हिस्‍से तक पहुंचती। इस पर अग्नि प्रज्‍वलित करके फि‍र से तेज-तेज पंपिंग की जाती और घुर..घुर..घुर.. की ध्‍वनि के साथ स्‍टोव जल उठता।
चूल्‍हे में खाना बनाने के दौरान लकड़ी के धुंए से परेशानी महसूस करनेवाले लोग उस समय स्‍टोव के प्रयोग को ही प्राथमिकता देते थे। भोजन पकाने के लिए चूल्‍हे के विकल्‍प के रूप में स्‍टोव के आगमन के साथ ही प्रेशर कूकर का भी प्रचलन समाज में बढ़ने लगा। जबकि प्रेशर कूकर से पहले लोग ढेकची, पतीले का प्रयोग करते थे। और उससे भी पहले मिट्टी की हाड़ी में ही दाल-चावल, खीर, आदि पकवान बनाए जाते थे। सब्‍जी-तरकारी, हलवा आदि बनाने और पूरी-पकौड़ी तलने के लिए प्राय: कढ़ाई का प्रयोग होता था, जिसका विकल्‍प आज तक भी तैयार नहीं हो सका है। यानि कि आज भी कढ़ाई का प्रयोग पहले की तरह ही जस का तस है। स्‍टोव से पहले कोयले की अंगीठी भी भोजन पकाने के लिए एक अग्नि विकल्‍प हुआ करती थी। लेकिन कोयले से निकलनेवाली खतरनाक और प्राणघातक गैस के डर से लोगों ने रसोई में इसके प्रयोग को अधिक बढ़ावा नहीं दिया। अंगीठी का प्रयोग रसोई से बाहर आंगन में होता था।
खेती-बाड़ी के काम भी पारंपरिक उपकरणों और व्‍यवस्‍था के सहारे पूरे किए जाते थे। हल-बैल से खेत जोते जाते थे। ट्रैक्‍टर से खेत जोतना महंगा था। इसके लिए महंगे डीजल की आवश्‍यकता होती थी। धनी किसानों के पास हालांकि ट्रैक्‍टर भी होते थे पर अधिकांश किसान हल-बैल के सहारे ही खेती किया करते थे। खाद्यान बीज, खाद, बुवाई, जुताई, निराई, गुड़ाई आदि सभी खेती आधारित व्‍यवस्‍थाएं पारंपरिक पद्वति से की जाती थीं। परिणामस्‍वरूप जो खाद्यान खेतों में उपजता था, उसमें पौष्टिकता होती थी। फसलों को कीटों और कीड़ों से सुरक्षित रखने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव नहीं होता था। इससे अन्‍न में प्राकृतिक शक्ति होती। लोग शुद्ध अन्‍न खाते थे और तन-मन से स्‍वस्‍थ रहते थे।

7 comments:

  1. SAMAY KISI NAA KISI TARAH AAGE HI BADHTA HAI .. CHAAHE AARTHIK BADLAAV HO YA RAJNITIK YA AUR KUCHH ... KAI BAAR WE BADLAAV SUKHAD NAHIN BHI LAGTE HAIN PAR UNSE MUNH NAHI FER SAKTE ... WAISE BACHPAN YAAD DILA DIYAA

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  2. रोचक यात्रा ...
    नूतन स्टोव भी साथ ही आ गए थे जिनमें बत्तियाँ होती थीं वे पीतल वाले स्टोव से कम खतरनाक होते थे..गैस आने के बावजूद भी स्टोव का प्रयोग कई सैलून जारी देखा गया क्योंकि राशन में मिटटी का तेल भी मिला करता था..जो गैस से सस्ता होता था..

    ..सफ़र जारी रहे...

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  3. वर्तनी त्रुटि सुधार ...__'सैलून' नहीं 'सालों' पढ़ा जाए..

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  4. कढ़ाई और नान स्टिकी त्वा एक साथ आज भी रसोई में सामंजस्य बनाये हुए हैं। नवउदारवाद ने अमरीका के तो घुटने ही टिका दिए थे ऐसी भगदड़ मची लोग गराज में आ गए। भारत की तो फिर बिसात ही क्या थी मन्मोहनिया अर्थशाश्त्र ने इसे इसकी औकात बटला दी।

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  5. कितना कुछ बदल गया समय के साथ. जीवन में सुख सुविधाओं में अवश्य वृद्धि हुई लेकिन बहुत कुछ पीछे छूट गया. चूल्हे पर बना खाना तो अब केवल एक स्वप्न मात्र है...यादों को ताज़ा करती बहुत रोचक श्रंखला...

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  6. समय के साथ कितना कुछ बदल गया अहि ... एक पल ठिठक के सोचो तो लगता है १८० डिग्री कब घूमे पता ही नहीं चला ...

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  7. फ्लैशबैक सा होता रहा आपके इस पोस्ट को पढ़कर. वस्तुओं के साथ सामजिक ढंग-ढाँचे और व्यहवार परिवर्तन पर आपके नज़रिये को पढ़ने की उत्सुकता रहेगी.

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