Tuesday, June 23, 2015

छह दशक पुरानी शासकीय विसंगति एक वर्ष में कैसे दूर हो सकती है

भारत में यह आम व्‍यवहार है कि पस्‍त गृहस्‍थ होकर भी आदमी राजनीति में गहन रुचि रखता है। रुचि होनी स्‍वाभाविक है क्‍योंकि इस युग में आम आदमी का गृहस्‍थ जीवन राजनीति से निर्धारित होनीवाली जीवन गतिविधियों पर जो निर्भर है। राजनीति कई प्रकार की हो सकती है। लेकिन भारत में लोकतांत्रिक शासन पद्धति में आम जनता का राजनीतिक दर्शन, जीवनचर्या हेतु सर्वश्रेष्‍ठ किन्‍हीं मानदंडों के अनुरूप नहीं है। यहां का राजनीतिक दर्शन विभिन्‍न राष्‍ट्रीय, क्षेत्रीय स्‍तर के राजनीतिक दलों और स्‍वयं की हितसाधक उनकी स्‍वार्थी मानसिकता के हिसाब से बनता-बिगड़ता है। आम आदमी कभी भी ऐसी राजनीतिक विचारधारा का व्‍यक्तिगत आकलन नहीं कर पाता। वह ऐसी राजनीति का विश्‍लेषण सामूहिक दृष्टिकोण से ही कर पाता है। वास्‍तव में ऐसी राजनीति की कोई वैचारिक प्रगति होती भी नहीं है, जो इससे जुड़े लोगों में लोक व्‍यवहार और लोक संस्‍कार डाल सके।
            स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारत में कांग्रेस नामक राजनीतिक दल उभरा। यह इसलिए भी हुआ कि भारत जिन-जिन देशों का उपनिवेश रहा या जो भी साम्राज्‍यवादी शक्तियां भारत पर शासन करके यहां से गईं, उनके अपने देशों में कांग्रेस शब्‍द और इसके पीछे की राजनीतिक अवधारणा का गुणगान उपनिवेशवाद* और साम्राज्‍यवाद** के दौरान खूब प्रसारित किया गया। परिणामस्‍वरूप औपनिवेशिक भारत के समय, जो भारतीय विदेशी शासकों के निकट रहे, उनका विदेशी जीवन-व्‍यवहार के संपर्क में आना स्‍वाभाविक था। फि‍र ऐसा होता भी क्‍यों नहीं, क्‍योंकि जिन शक्तियों के कब्‍जे में भारत की संपूर्ण व्‍यवस्‍था थी, वे विज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बलबूते दुनिया को बुरी तरह प्रभावित करने की स्थिति में जो थे।
            इस प्रकार स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के अलग-अलग राज्‍यों या रजवाड़ों या साम्राज्‍यों से मिलकर एक राष्‍ट्र निर्मित हुआ और इसे चलाने के लिए संविधान और संसद अस्तित्‍व में आए। किसी भी विशाल देशस्थान में यह कैसे संभव है कि वहां का जो संविधान या संवैधानिक परिभाषाएं किन्‍हीं विचारकों द्वारा बना दी गई हों, उनके अनुरूप ही उस देश के प्रत्‍येक नागरिक की विचारधारा बन जाएगी। यह समझना सरल है कि किसी एक विषय पर किसी राष्‍ट्र में उसके अपने नागरिकों के मतभेद मिट नहीं सकते--जिस प्रकार चार-पांच सदस्‍यों का कोई परिवार भी किसी बात पर सहमत नहीं हो पाता, उसी धारा में यदि देश के अरबों लोगों के विचारों को देखा जाए और प्रयास हो कि वे किसी एक विषय पर एकमत हों, तो यह किस आधार पर होगा! निस्‍संदेह किसी आधार पर नहीं हो सकता।  
          इन्‍हीं परिस्थितियों में कांग्रेस के अपने मतभेद उभरे। फलस्‍वरूप नए राजनीतिक दल अस्तित्‍व में आए। एक नहीं अनेक राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय दल पिछले साठ साल में देश के कई-कई लोगों को अपने राजनीतिक समूह और विचारधारा से जोड़ चुके हैं। कितने ही राजनीतिक दल इस परिदृश्‍य में उभरे हों या उनके कितने ही समर्थक उन्‍हें समर्थन करते रहे हों, पर जोड़-तोड़ करने में सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस से वे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर राज करने की प्रतियोगिता कभी नहीं कर पाए। अस्‍सी के दशक के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो सन् 1948 से पिछले वर्ष तक कांग्रेस ने ही पूरे साठ साल की केन्‍द्रीय राजनीतिक यात्रा की।
          इस प्रकार सदैव ही संविधान की कार्यपालिका में कांग्रेसी नेताओं की बहुतायत रही। विधायिका में भी कांग्रेसी नेताओं का बहुमत था। स्‍पष्‍ट था कि न्‍यायपालिका में बैठे न्‍यायाधीशों के न्‍याय-विचार पर भी इनकी राष्‍ट्रीय नीतियों और निर्णयों का प्रभाव जाता। इन तीनों लोकतांत्रिक स्‍तंभों को संभालने के लिए जो शासन-प्रशासन तंत्र तैयार हुआ, उसकी व्‍यक्तिगत और नागरिक मानसिकता अलग कैसे हो सकती थी। जो कुछ राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संदेश लोकतांत्रिक पटल की तीन पालिकों के माध्‍यम से शासन-प्रशासन तक फैला, उसी के अनुरूप देश के जन-जीवन की मानसिकता और प्रवृत्ति तय हुई। दुर्भाग्‍य से यह संदेश बहुत ही नकारात्‍मक रहा। सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्‍थानों, प्रतिष्‍ठानों, विभागों और उप-विभागों के माध्‍यम से पंचायत और ग्राम प्रधान जैसी ग्रामीण लोकतांत्रिक इकाइयों तक देशी बाबूगीरी फैली। सरकार की तरफ से प्रस्‍तावित कोई भी काम अपनी परिणति तक पहुंचने से पहले कई लोगों और अनेक सरकारी व्‍यवस्‍थाओं को भ्रष्‍ट करता चला गया।
          सन् 1950 में जो सरकारी नौकर नियुक्‍त हुआ होगा, उसका कार्यकाल उसके जीवित होने और 60 वर्ष की सेवावधि पूर्ण किए जाने की स्थिति में सन् 2010 था। कहने का तात्‍पर्य यह है कि इस देश की पूरी की पूरी नौकरशाही (उन सरकारी नौकरों से क्षमा मांगना चाहूंगा जो जीवनभर भ्रष्‍ट नहीं थे), जिसे भ्रष्‍ट और दुष्‍ट कहा जाता है, उसकी उत्‍पत्ति भी उसी कांग्रेसी राज से हुई थी, जिसकी काली छाया इस देश पर छह दशक तक रही। आज यदि कोई कहे कि भाजपा नेतृत्‍व वाले राजग ने सरकारी कर्मचारियों या विभागों की कार्यप्रणाली को चुस्‍त-दुरुस्‍त नहीं किया है, तो क्‍या सरकारी कर्मचारियों या विभागों के चाक-चौबंद हो जाने में केवल भाजपा सरकार की ईमानदारी ही सहायक होगी? क्‍या इस विफलता में कांग्रेस द्वारा उत्‍पन्‍न पिछले साठ सालों के सरकारी कर्मचारियों की भूमिका पर प्रश्‍न नहीं उठाए जाने चाहिए? जिन कर्मचारियों को साठ साल से भ्रष्‍टाचार में बुरी तरह संलिप्‍त होने की कभी न छूटनेवाली बीमारी लगी हो, वे नवगठित केन्‍द्रीय शासन के स्‍वच्‍छ व पारदर्शी प्रशासन देने के संकल्‍प के साथ आसानी से कैसे जुड़ सकते हैं?
          केन्‍द्र सरकार के सामने प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के नेताओं की ईमानदारी या उनके ढंग से काम करने की चिंता इतनी नहीं है, जितनी दशकों के कांग्रेसी शासन में पथभ्रष्‍ट हुए प्रशासनिक तंत्र को ठीक करने की चुनौती है। जो पूरे साठ साल तक भ्रष्‍टाचार में सने रहे, उन्‍हें एक या दो साल में, कम से कम लोकतांत्रिक तरीके से तो सीधा, सच्‍चा, सज्‍जन बिलकुल नहीं बनाया जा सकता। हां, सरकारी सेवाओं में आज नियुक्‍त होनेवाले कर्मचारी कर्मठ, कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ, उत्‍तरदायी केन्‍द्रीय शासन से प्रेरणा लेकर अवश्‍य ही भ्रष्‍टमुक्‍त प्रशासनिक तंत्र बनाने की दिशा में उन्‍मुख हो सकते हैं।
*   उपनिवेश शब्‍द अट्ठारहवीं और उन्‍नीसवीं सहस्राब्दि में अस्तित्‍व में आया। व्‍यापारिक अनुसंधान के लिए एक देश के शासकों ने दूसरे देश की यात्रा की। उन्‍होंने वहां शासकीय तथा सामाजिक रूप से अपने देश का समानांतर तंत्र स्‍थापित कर दिया। वर्षों तक ऐसी स्थिति बनी रही। इसे ही उपनिवेशवाद कहा गया।
** साम्राज्‍य शब्‍द से तात्‍पर्य किसी एक व्‍यक्ति के एकाधिकार में एक बड़े क्षेत्र के होने से है। ऐसे क्षेत्र की पूरी व्‍यवस्‍था उस व्‍यक्ति के विवेक से निर्धारित होती है। राजाओं के जमाने और पिछली बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक यही स्थिति दुनिया के ज्‍यादातर देशों में बनी रही। आज भी कई देशों में इस तरह की शासन-प्रणाली है।
विकेश कुमार बडोला

6 comments:

  1. गहरा और सटीक विश्लेषण ... कांग्रेसी व्यवस्था देश में इतनी मजबूत है की इसको ठीक करते करते १०-२० वर्ष जरूर लगने वाले हैं पर देश के लोगों का धैर्य रहेगा ... नरेंद्र मोदी जी जैसे लोग लम्बे समय तक रह पायेंगे .... इसमें विश्वास नहीं होता ... जनता भूल जाती है .... और ये बात विदेशों के कंट्रोल वाला मीडिया बाखूबी जानता है ...

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  2. केन्‍द्र सरकार के सामने प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के नेताओं की ईमानदारी या उनके ढंग से काम करने की चिंता इतनी नहीं है, जितनी दशकों के कांग्रेसी शासन में पथभ्रष्‍ट हुए प्रशासनिक तंत्र को ठीक करने की चुनौती है। जो पूरे साठ साल तक भ्रष्‍टाचार में सने रहे, उन्‍हें एक या दो साल में, कम से कम लोकतांत्रिक तरीके से तो सीधा, सच्‍चा, सज्‍जन बिलकुल नहीं बनाया जा सकता। हां, सरकारी सेवाओं में आज नियुक्‍त होनेवाले कर्मचारी कर्मठ, कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ, उत्‍तरदायी केन्‍द्रीय शासन से प्रेरणा लेकर अवश्‍य ही भ्रष्‍टमुक्‍त प्रशासनिक तंत्र बनाने की दिशा में उन्‍मुख हो सकते हैं।

    केन्‍द्र सरकार के सामने प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के नेताओं की ईमानदारी या उनके ढंग से काम करने की चिंता इतनी नहीं है, जितनी दशकों के कांग्रेसी शासन में पथभ्रष्‍ट हुए प्रशासनिक तंत्र को ठीक करने की चुनौती है। जो पूरे साठ साल तक भ्रष्‍टाचार में सने रहे, उन्‍हें एक या दो साल में, कम से कम लोकतांत्रिक तरीके से तो सीधा, सच्‍चा, सज्‍जन बिलकुल नहीं बनाया जा सकता। हां, सरकारी सेवाओं में आज नियुक्‍त होनेवाले कर्मचारी कर्मठ, कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ, उत्‍तरदायी केन्‍द्रीय शासन से प्रेरणा लेकर अवश्‍य ही भ्रष्‍टमुक्‍त प्रशासनिक तंत्र बनाने की दिशा में उन्‍मुख हो सकते हैं।

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन चालीस वर्ष बाद भी आपातकाल की छाया में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. कांग्रेस ने देश का जिस तरह बंटाधार कर दिया उसके बारे में आपने विस्तार से लिखा है और मुझे उससे पूर्ण सहमति है. लेकिन मैं ये सोचता हूँ कि गलती तो हमारी ही है जिसने उसी कांग्रेस को बार-बार चुन-चुन कर भेजा. ना ही विपक्ष में कभी ऐसी ताकत रही? क्या विपक्ष की विचाधारा में कोई कमजोरी रही? मैं आज तक यह बात नहीं समझ पाया कि वाजपेयी जी के इतने अच्छे शासन के बावजूद वो क्यों सत्ता में नहीं लौट पाए? राज्यों या केंद्र में कांग्रेस के विकल्प के रूप में जो भी सरकारें आयी, सबमे भ्रष्टाचार हुआ, सबमे वही तौर तरीके रहे जो कांग्रेस के राज में रहा.
    अपने देश की व्यवस्था में जिन दो चीजें को तुरंत बदलने की ज़रुरत है वो है भ्रष्टाचार से पूर्ण मुक्ति और पुलिस को अपना काम करने की स्वतंत्रता देना. इन दो चीजों को बदले बिना बस सरकारें बदलेंगी और गरीबों को कल्याण कभी नहीं हो सकेगा. ऐसा मेरा मानना है.

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  5. यह लेख बहुत अच्छा लगा क्योंकि इसमें आप ने कई उन प्रश्नों के उत्तर दे दिए हैं जिन्हें वर्ग विशेष के लोग वर्तमान केंद्र सरकार के विरोध में जब तब उठा दिया करते हैं.काश भारत की पूरी जनता का सहयोग इन्हें मिल पाए!
    शेष समय बताएगा देश के भाग्य में क्या ..

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