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Monday, June 22, 2015

अर्थशास्‍त्र द्वारा सरकारी आकलन

नुष्‍य जीवन की प्रमुख आवश्‍यकता है भोजन, वस्‍त्र और घर। वस्‍त्र और घर न हो और भूख लगने पर केवल भोजन मिलता रहे तब भी जीवन ठीक से गुजर सकता है। रोग हमें तब घेरते हैं जब हमारे जीवन का निर्धारित चाल-चलन बिगड़ जाता है। इसके बाद हमें दवाई और चिकित्‍सा की आवश्‍यकता भी होती है। यहां तक भी ठीक है। इतनी आवश्‍यकताएं लोगों को उपलब्‍ध कराई जा सकती हैं।
          लेकिन जब प्रमुख जीवन आवश्‍यकताओं के अलावा भी अन्‍य आवश्‍यकताएं प्रतिदिन बढ़ रही हों और लोभ, लालच और भौतिक महत्‍वाकांक्षाओं से मानव का मन-मस्तिष्‍क भरता जा रहा हो, तब हमारे जीवन की स्थिति कैसी होगी, इसकी कल्‍पना की ही नहीं जा सकती। जिस कालखंड से भी जीवन में प्रमुख आवश्‍यकताओं के इतर आवश्‍यकताएं उभरीं, तब ही से संसार में अनेक वस्‍तुओं का उत्‍पादन शुरू हुआ। धीरे-धीरे इन वस्‍तुओं को बेचकर समाज में अधिक लाभ कमाने की इच्‍छा उभरी। छोटी से लेकर बड़ी वस्‍तु के उत्‍पादन, विज्ञापन, विपणन की सदियों पुरानी प्रक्रिया अनेक परिवर्तनों, विरोधाभासों और विसंगतियों से होते हुए इस समय तक पहुंची है। आज संसार के सभी देश धनार्जन करने और पूंजीगत लाभ बढ़ाने के लिए अपने कल-कारखानों में निर्मित उत्‍पाद दूसरे देशों को बेचते हैं। वे अलग-अलग देशों के लोगों की जीवन-रुचियों का ध्‍यान रखकर उत्‍पादन करने और बेचने के कारोबार में शामिल हैं।
          अलग-अलग देशों की यह निर्माण, उत्‍पादन व्‍यवस्‍थाएं पूंजीगत लाभार्जन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हो गई हैं और इस प्रकार पूंजीगत गणना के लिए सम्‍पूर्ण विश्‍व के परस्‍पर जुड़े उत्‍पादन कारोबार एक नई अर्थव्‍यवस्‍था में बदल गए। जिस देश के उत्‍पादन की गुणवत्‍ता जितनी अधिक होगी, उसका लाभांस उतना ज्‍यादा तय होगा, धीरे-धीरे यह धारणा भी बन गई। गुणवत्‍ता का आकलन और लाभांस का निर्धारण कैसे हो, इस हेतु सम्‍पूर्ण विश्‍व के वस्‍तु-उत्‍पादन के क्रय-विक्रय के बाद लाभांस वितरण की श्रेणियां निर्धारित की गईं। जो देश सबसे अधिक लाभांस अर्जित करेगा, उसकी मुद्रा का मूल्‍यांकन सबसे अधिक होगा। इस प्रकार मुद्रा अस्तित्‍व में आती है। इसके बाद मुद्रास्‍फीति और मुद्रा संकुचन की श्रेणियां तय करने की आवश्‍यकता हुई। इसके लिए उत्‍पादन के बराबर मुद्रा की उपलब्‍धता सुनिश्चित हो, यह मानक रखा गया। और इस मानक पर योग्‍य घोषित देश की अर्थव्‍यवस्‍था मुद्रास्‍फीति से बच जाती है। उत्‍पादन से कम मुद्रा की उपलब्‍धता, तरलता अर्थव्‍यवस्‍था में न हो तो मुद्रा संकुचन की स्थितियां बनती हैं। इसके लिए भी पर्याप्‍त उपाय करने की कोशिश की जाती है। उत्‍पादन के बराबर मुद्रा की तरलता निश्चित की जाती है। यानि कि उत्‍पादन के रूप में मौजूद वस्‍तुओं की क्रयशक्ति समाज की है या नहीं, इसी आधार पर मुद्रा संकुचन की परिभाषा तय होती है।
          औद्योगिक विकास, सकल घरेलू उत्‍पादन, मुद्रा के रूप में रूपए का मूल्‍यांकन यह सब कुछ संसार की अर्थव्‍यवस्‍था को आधार मानकर निर्धारित होता है। आज अर्थव्‍यवस्‍था को अर्थशास्‍त्र की निर्धारित वैश्विक मान्‍यताओं के अनुसार ठीक से समझना अर्थ विशेषज्ञों के लिए भी मुश्किल है। कारण, अवैध औद्योगिक उत्‍पादन के अनुसार एक अलग अर्थव्‍यवस्‍था का अस्तित्‍व में आना और अप्रत्‍यक्ष रूप से वैध वैश्विक आर्थिक सूचकांक में शामिल होना है।
          इन सब आर्थिक स्थितियों से देश-दुनिया सालों से गुजर रहे हैं। और अगर कोई सरकार इस भेढ़चाल से अलग कुछ नया, विकासोन्‍मुखी कदम उठाती है, तो उससे यह उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि सालों की अव्‍यवस्‍था साल-दो साल में व्‍यवस्थित हो जाए। 
          सरकार को पिछले एक वर्ष के कार्यकाल में कुछ नहीं करने के लिए लताड़ने वाले क्‍या अर्थव्‍यवस्‍था की गहन जानकारी रखते हैं? यदि नहीं, तो वे किस ज्ञान के आधार पर सरकार के आर्थिक कामकाज का आकलन कर रहे हैं। विपक्ष यदि यह कहता है कि औद्योगिक उत्‍पादन घटा है, आर्थिक स्थिति डगमगाई है और रूपए की कीमत अस्थिर और कम हुई है, तो फिर वह भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन के लिए किसानों और आम भारतीय को क्‍यों गलत संदेश दे रहे हैं कि यह विकास के नाम पर कृषि और किसानों को बर्बाद कर देगा। अगर आप कृषि और किसानों के पक्ष में खड़े होकर भूमि अधिग्रहण के उपयुक्‍त संशोधन का विरोध करते हैं, तो आप औद्योगिक उत्‍पादन में कमी के साथ आर्थिक अस्थिरता और रूपए के अवमूल्‍यन की बात कैसे कह सकते हो। यह तो ऐसा ही है कि कुत्‍ते से बचने के लिए बिल्‍ली का पक्ष लेते हैं और कुत्‍ता बिल्‍ली को मार नहीं पा रहा है, सुस्‍त है, क्‍यों नहीं मार पा रहा है, इस बात पर भी अड़े रहते हैं। यह वैचारिक विरोधाभास केवल राजनीति चमकाने के लिए है। जनता को इसे समझना चाहिए। किसी भी तंत्र में विपक्ष का कार्य उन बातों, योजनाओं और नीतियों के बारे में सत्‍ता पक्ष से विमर्श करना होना चाहिए, जो विषय-विशेष की अज्ञानता के कारण सत्‍तापक्ष से छूट जाती हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सत्‍ता पक्ष के सही कार्यों में टांग अड़ा कर केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश और लोगों का नुकसान करना चाहिए। सरकार का पक्षसमर्थन सही सिद्ध करने के लिए यह कम है कि केन्‍द्रीय कोषागार से एक रुपए की अवैध निकासी नहीं हो पाई है। और जब खुद प्रधानमंत्री ईमानदार हो तो विपक्ष और विरोधियों को देश के विकास की चिंता छोड़ देनी चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, नारी शक्ति - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सत्य कहा आपने

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  3. बहुत सुन्दर ,मन को छूते शब्द ,शुभकामनायें और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  4. बिगड़े हुए तंत्र को सही करने में समय लगता है...अव्यवस्थित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में समय लगेगा और सरकार को कुछ समय देना ही होगा...बहुत सार्थक चिंतन...

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  5. विरोध के नाम पर विरोध यही कांग्रेस का मूल मन्त्र है जो वो अपने और खरीदे हुए मीडिया के जरिये बाखूबी करती है ... झूठ सौ बार बोल कर सच ठहराने की कला जानती है वो ...

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  6. अर्थव्यवस्था में सुधार का आंकलन ३-४ वर्षों से पूर्व नहीं किया जा सकता. जो अभी परिवर्तन की बात सोचते हैं उन्हें निश्चय ही उन्हें अर्थव्यवस्था की पूरी जानकारी नहीं है.

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