Monday, June 1, 2015

साहित्यिक-सांस्‍कृतिक आयोजन की जरूरत


ई दिल्‍ली स्थित विज्ञान भवन में २२ मई को राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृतियों 'संस्‍कृति के चार अध्‍याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' का स्‍वर्ण जयंती समारोह मनाया गया। समारोह के मुख्‍य अतिथि के रूप में प्रधानमंत्री का संबोधन हिन्‍दी और हिन्‍दी साहित्‍य के उत्‍थान की आशा जगाता प्रतीत हुआ। उल्‍लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने जिस प्रकार से दिनकर के साहित्यिक जीवन पर व्‍यक्तिगत रुचि लेकर और स्‍वप्रेरणा से अपना भाषण दिया, वह आम जनता को हिन्‍दी साहित्‍य को पढ़ने और समझने के लिए एक व्‍यापक दृष्टि प्रदान करेगा।
'संस्‍कृति के चार अध्‍याय' नामक पुस्‍तक कार्यालय के पुस्‍तकालय से एक हफ्ते के लिए मिली थी। एक हफ्ते में इसके आठ-दस पृष्‍ठ भी ढंग से नहीं पढ़ पाया। पुस्‍तक की भूमिका जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। भूमिका पढ़कर इसका जो मंतव्‍य समझ में आया, उससे स्‍पष्‍ट था कि कांग्रेस के नेतृत्‍व में भारतीय हिंदुत्‍व का मानस, दर्शन और अध्‍यात्‍म लोकस्‍मृति की पृष्‍ठभूमि में पहुंचनेवाला है, जो कालांतर में और इस समय तक पहुंचा भी। रामधारी सिंह दिनकर ने धर्म, संस्‍कृति, हिन्‍दू विधि-विधान के संदर्भ में उक्‍त पुस्‍तक में अत्‍यंत गहन विश्‍लेषण किया है। अंतश्‍चेतना में सदैव यह इच्‍छा रहती है कि उपरोक्‍त पुस्‍तक जैसी अन्‍य पुस्‍तकें खरीद कर पढ़ी व संभाल कर रखी जाएं।
'परशुराम की प्रतीक्षा' नामक पुस्‍तक देखी भी नहीं है, पढ़ना तो दूर है। इस का दुख है। अभी यह इच्‍छा है कि इस तरह की पुस्‍तकें तुरंत मिल जाएं। इधर हिन्‍दू धर्म ग्रंथों और वेद-पुराणों की भाव-भूमिका को लेकर पिछले साठ सालों में अप्रत्‍यक्ष रूप से बहुत ज्‍यादा विष उगला गया। और यह काम उन्‍होंने किया, जिनका पारिवारिक इतिहास किसी भी धर्म में आस्‍था रखने के बजाय विसंगत विकासवाद के नारे के साथ नैतिक-मौलिक-चारित्रिक हनन को उचित ठहराने की पताका लेकर घूमने का रहा। निस्‍संदेह यही लोग रामधारी सिंह दिनकर जैसे लेखकों के साहित्‍य को मुझ जैसे आम लोगों तक पहुंचाने में बाधा रहे हों। लेकिन इनकी गुप्‍त योजना कितनी कारगर रही कि बाहर से तो ये संस्‍कृति के अध्‍यायों की प्रशंसा करते रहे, पर मन से ये उस अध्‍याय की सांस्‍कृतिक-धार्मिक सीख से लोगों को वंचित रखे हुए थे।
लेकिन अब आशा बंधी है। कोई कुछ भी कहे। कांग्रेस या कांग्रेसी शासन में मंत्रियों की सिफारिशों से मीडिया में बैठे लोग या कांग्रेस के आर्थिक सहयोग से चलनेवाले जनसंचार संस्‍थान भाजपा के नेतृत्‍व वाले राजग को कितना ही कमतर आंके या उसके एक साल के शासन काल का बुरे दिनों के रूप में कितना भी प्रचार करें, जनता का एक बड़ा वर्ग अब सरकार और मीडिया के बारे में अस्‍पष्‍टता या अज्ञानता में नहीं है। उसे सब पता है। उसे ज्ञात है कि राजग सरकार के राष्‍ट्रीय कार्यों की योजना के केंद्र में गरीब या गरीबी की अवधारणा नहीं, अपितु गरीबों की गरीबी मिटाने की नीति है। कांग्रेसी पक्ष समर्थन करनेवाला मीडिया अब अपनी चालाकी से लोगों को भ्रमित नहीं कर सकता।
राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृतियों के समारोह के आसरे अब उम्‍मीद है कि सरकार अन्‍य प्रमुख और प्रतिष्ठित लेखकों के जीवन व उनके रचना-कर्म से परिचित कराने के साहित्यिक-सांस्‍कृतिक आयोजन करती रहेगी। किसी भी देश को भौतिक-आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने का कार्य शासन-प्रशासन का होता है। लेकिन अगर देश के युवाओं को केवल विकास के उपभोग तक ही सीमित रखकर, उनकी साहित्यिक-सांस्‍कृतिक रुचियों से मुंह मोड़ दिया जाएगा, तो जल्‍द ही समाज पतन की ओर भी उन्‍मुख हो जाता है। समाज को आत्मिक रूप से स्‍वस्‍थ रखने के लिए उनमें अपने धर्म-संस्‍कृति के प्रति भी रुझान जगाना होगा। और इसकी शुरुआत शायद दिनकर की कालजयी कृतियों के स्‍वर्ण जयंती समारोह मनाने से हो गई है।
विकेश कुमार बडोला
--------------------------------------------------------------------------------------------
25 जून 2015 को दैनिक नेशनल दुनिया में 

15 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, देश का सच्चा नागरिक ... शराबी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  2. आशा करनी ही चाहिये ।

    ReplyDelete
  3. दिनकर को याद कर और उनके साहित्य से सीख लेकर वर्तमान सामजिक स्थिति को सुधारने के लिए प्रधानमंत्री जी का आह्वान निश्चय की स्वागत योग्य है. अगर दिनकर की लिखी बातों का कुछ अंश भी आत्मसात कर लिया तो निस्संदेह जीवन में सुख की वृद्धि की सकती है. संस्कृति के चार अध्याय को पढ़कर न सिर्फ भारत से सम्यक परिचय होता है बल्कि दिनकर के समृद्ध गद्य-पक्ष से भी परिचय होता है.

    दिनकर की कई किताबें अब आसानी से उपलब्ध नहीं है. हालांकि जहाँ तक मुझे याद है, एक-दो वर्ष पूर्व मुझे दरियागंज में राजकमल प्रकाशन वाले ने कहा था कि 'दिनकर रचनावली' में दिनकर की समस्त रचनायें संकलित है. शायद उसमे परशुराम की प्रतीक्षा भी हो . पुराने ज़माने में दिनकर की अधिकांश रचनाएँ उदयाचल प्रकाशन, पटना से छपती थी. 'परशुराम की प्रतीक्षा' भी वहीँ से मूल रूप से प्रकाशित हुई थी. मेरे पास 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' दोनों ही पुस्तकें पीडीएफ के रूप में है. मैं आपको ईमेल से भेज देता हूँ.

    ReplyDelete
  4. समाज की उन्नति हो इसके लिए सतत प्रयास और उन सभी हुतात्माओं को न सिर्फ याद बल्कि जीवित भी रखना होगा समाज में जो आदर्श हैं ... दिनकर भी उन्ही विभूतियों में से एक हैं ...

    ReplyDelete
  5. मुझे भी ये एक सकारात्मक शुरुआत लगी । ऐसे आयोजन ज़रूरी है ।

    ReplyDelete
  6. विडोला भाई बधाई एक मौज़ू विषय को विमर्श के केंद्र में लाने के सफल दखल के लिए। देश को सम्प्रदायों के आधार पर बाँट कर भरमाने वालों के अब बुरे दिन चल रहे हैं। एक ख़ास किस्म की बौखलाहट इन घोटाला धीशों को घेरे हुए हैं।

    मोदी जी अपना सब काम मेहनत से करते हैं। दिल से करते हैं। सबके हैं मोदी सब सम्प्रदायों के भारत धर्मी समाज इस तथ्य को जितना जल्दी समझ ले उतना बेहतर। कांग्रेसी प्रतीक पुरुष नेहरू महात्मा गांधी के कन्धों पर चढ़ प्रधान मंत्री बने थे। भारतीय फौजें अच्छी बढ़त बना चुकीं थीं कबाइलियों को खदेड़ कर। योरोप जादे कश्मीर मामले को अपनी आलमी छवि चमकाने की फिराक में युएनओ में घसीट कर ले गए नतीज़न कश्मीर आज भी भारत के लिए नासूर बना हुआ है जहां आतंकी राजनीति के पोषक आये दिन पाकिस्तान का परचम फहराने की फिराक में रहते हैं।

    गौ मांस छाती पीट पीट कर खाने वाले संस्कृति को क्या जाने ?एक अच्छे विमर्श के लिए आपने आमंत्रण दिया है। ये मुंबई भट्ट संकर नस्ल के भांड हैं।

    ReplyDelete
  7. विडोला भाई बधाई एक मौज़ू विषय को विमर्श के केंद्र में लाने के सफल दखल के लिए। देश को सम्प्रदायों के आधार पर बाँट कर भरमाने वालों के अब बुरे दिन चल रहे हैं। एक ख़ास किस्म की बौखलाहट इन घोटाला धीशों को घेरे हुए हैं।

    मोदी जी अपना सब काम मेहनत से करते हैं। दिल से करते हैं। सबके हैं मोदी सब सम्प्रदायों के भारत धर्मी समाज इस तथ्य को जितना जल्दी समझ ले उतना बेहतर। कांग्रेसी प्रतीक पुरुष नेहरू महात्मा गांधी के कन्धों पर चढ़ प्रधान मंत्री बने थे। भारतीय फौजें अच्छी बढ़त बना चुकीं थीं कबाइलियों को खदेड़ कर। योरोप जादे कश्मीर मामले को अपनी आलमी छवि चमकाने की फिराक में युएनओ में घसीट कर ले गए नतीज़न कश्मीर आज भी भारत के लिए नासूर बना हुआ है जहां आतंकी राजनीति के पोषक आये दिन पाकिस्तान का परचम फहराने की फिराक में रहते हैं।

    गौ मांस छाती पीट पीट कर खाने वाले संस्कृति को क्या जाने ?एक अच्छे विमर्श के लिए आपने आमंत्रण दिया है। ये मुंबई भट्ट संकर नस्ल के भांड हैं।

    ReplyDelete
  8. दिनकर जी जैसी विभूतियों के कृतित्व से एक बार फिर से परिचित होने की आवश्यकता है. दिनकर जी की कालजयी रचनाओं के स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है. बहुत सारगर्भित आलेख..

    ReplyDelete
  9. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
  10. इस तरह के आयोजन नयी पीढ़ी को कालजयी रचनाओं से परिचित करायेंगे साथ ही साहित्य और संस्क्रती में इनकी रूचि भी बढायेंगे ---
    सार्थक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  11. बहुत बढ़िया सकारात्मक प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

    ReplyDelete
  12. सुंदर और सकारात्मक लेख । मेरी ब्लॉग परआप का स्वागत है ।

    ReplyDelete
  13. बहुत सुन्दर आलेख। इस तरह के आयोजन हर स्तर पर निरन्तर होने से समाप्त में साहित्यिक चेतना का अवश्य संचार होगा।

    ReplyDelete
  14. इस तरह के आयोजन आपसी समझ और जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं जिससे सृजनात्मक भावनाओं का जन्म होता है
    आज के साहित्यिक माहौल पर विचार करता सुंदर आलेख ---

    सादर

    ReplyDelete
  15. साहित्यिक रचनाएं भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं, इन्हें सहेजना हमारा नैतिक कर्तव्य होना चाहिए।
    प्रेरणात्मक आलेख !

    ReplyDelete