Thursday, April 23, 2015

भूमि अधिग्रहण का विरोध बनता जानलेवा

भूमि अधिग्रहण कानून में संसार के वर्तमान अर्थतंत्र के अनुसार संशोधन करना भाजपा की एक व्‍यापक विकास योजना है। इसे ढंग से नहीं समझनेवाले भूमि अधिग्रहण कानून को कृषक विरोधी मान रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के बारे में आकाशवाणी से प्रसारित प्रधानमंत्री के सम्‍बोधन में उनके द्वारा लिए जानेवाले व्‍यावहारिक कृषि निर्णयों की झलक थी। इन्‍हें नहीं समझना, इनके बारे में समुचित आकलन नहीं करके केवल वर्तमान केन्‍द्र सरकार को गलत ठहराना, यह लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी तरह अपनी उपस्थिति बनाए रखने की क्षुद्र लालसा के अलावा कुछ नहीं है। पूर्ववर्त्‍ती कांग्रेसनीत सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर उसे आधुनिक अन्‍न, धन व संसाधन के अनुरूप बदलना बड़ी राजनीतिक सोच है। केंद्र सरकार के अधिग्रहण संशोधनों को केवल विरोध की दृष्टि से देखने से विकास के काम कभी नहीं हो सकते।
          विभिन्‍न राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोग भारतीय लोकतंत्र का ही हिस्‍सा हैं। आज अमीर से लेकर गरीब आदमी और नेता से लेकर किसान तक सभी अपने बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा देकर उनका भविष्‍य संवारना चाहते हैं। मोदी सरकार के विरोध में विभिन्‍न राजनीतिक दलों के प्रदर्शनों में शामिल लोगों के बच्‍चे बड़ी-बड़ी कंपनियों, उद्योग-धन्‍धों में नौकरी कर रहे हैं। कृषि आधारित कार्यों के उद्योग भी रोजगार सृजित करते हैं। इनमें भी अमीर व गरीब दोनों स्‍तर के लोग नौकरी करते हैं। आज के युग में अनगिनत उत्‍पादों का निर्माण हो रहा है। विभिन्‍न उत्‍पादों के निर्माण में उत्‍पाद-विशेष का कौशल रखनेवाले लोग रोजगाररत हैं। इस समय का मानव जीवन केवल उदर पूर्ति की जरूरत पर निर्भर नहीं है। जीवन-उत्‍कृष्‍टता बढ़ानेवाले अनेक उत्‍पाद भी मानव जीवन से जुड़ चुके हैं। कार, मोबाइल, कंम्‍प्‍यूटर से लेकर रेल, हवा-पानी के जहाज और इनका निर्माण करनवाले कल-कारखाने भी तो समाज की विलास-आवश्‍यकता के लिए संचालित किए जाने हैं। और यदि केंद्र सरकार इस दिशा में पर्यावरणानुकूल नीति के आधार पर विचार कर कृषि को परंपरागत रखने की योजना बनाती है और इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करती है, तो इस पर सार्थक विश्‍लेषण व विचार करने की बजाय केवल अंधविरोध में उतरने से पहले लोगों को और लोगों को भड़कानेवाली राजनीतिक पार्टियों को आत्‍ममंथन करने की जरूरत है।
          दिल्‍ली की सत्‍ता में आसीन पार्टी की एक रैली में एक राजस्‍थानी किसान की आत्‍महत्‍या का कारण जानने की कोशिश बेकार ही होगी। अतिवृष्टि के कारण परिश्रम से तैयार की गई रबी की फसल बर्बाद होने पर ह्रदयाघात लग सकता है। परिणामस्‍वरूप संवेदनशील किसान की असमय मृत्‍यु भी हो सकती है। यह बात गहन चिंता की है। इस बारे में केंद्र व राज्‍य सरकारों को पीड़ित-व्‍यतीत किसानों और उनके परिवार के भविष्‍य के बारे में अवश्‍य सोचना चाहिए। लेकिन अपना लाभ देखनेवाले राजनीतिक दलों द्वारा संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून के अच्‍छे-बुरे पक्ष के बारे में अपूर्ण जानकारी दिए जाने और उस कारण विरोधाभासी विचारों से ग्रसित हो किसानों द्वारा आत्‍महत्‍या करने जैसी दुर्घटनाओं के लिए केवल केंद्र सरकार को जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।
यह दुर्घटनाएं और अनावश्‍यक विरोध-प्रदर्शनों का आयोजन दर्शाता है कि इस राष्‍ट्र के अधिकांश लोगों को अभी भी जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों के बारे में बहुत ज्‍यादा शिक्षित होना है। अभी लोगों का ज्ञान अधूरा है। वे राष्‍ट्रनीतियों के बारे में अपने विवेक से विश्‍लेषण करने की क्षमता नहीं रखते। जीवन को संभालने वाले कृषि और उद्योग क्षेत्र के कार्यक्रम के बारे में समुचित जानकारी के अभाव में ही सारी दिक्‍कत है। इसी कारण भूमि अधिग्रहण कानून में किए गए संशोधन का विरोध हो रहा है।
          माना कि किसान या किसी आदमी के पास अपनी भूमि है। लेकिन यदि वह उस पर बीजारोपण नहीं करता या उसका औद्योगिक प्रयोग नहीं करता है, तो उसका मूल्‍य कैसे तय होगा। ऐसी भूमि का मूल्‍यांकन शासन की कृषि व उद्योग नीति के अनुसार ही हो सकता है। विशाल जनसंख्‍या की उदर-पूर्ति व उसके आधुनिक जीवन-स्‍तर को बनाने के लिए ईमानदार सरकार को कृषि और औद्योगिक विकास की अवधारणा बनानी पड़ती है। इसके लिए पर्यावरण पक्ष का भी बड़ा ध्‍यान रखना पड़ता है। विकास के नाम पर अंधानुकरण न हो इसके लिए प्राकृतिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण भी अपनाना पड़ता है। और इन सबके लिए अगर भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ संशोधन किए जाते हैं तो गलत क्‍या है।
          भूमि अधिग्रहण के बहाने सरकार को कॉर्पोरेट और बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए काम करनेवाली सरकार बतानेवालों को सोचना चाहिए कि उनके बच्‍चे भी रोजगार व जीविका के लिए कॉर्पोरेट व बड़ी-बड़ी कंपनियों से जुड़े हुए हैं। पूंजी का संचालन कृषि व उद्योग के आधार पर होता है। अर्थशास्‍त्र के कार्यक्रम को आम आदमी आसानी से नहीं समझ सकता। आज की केंद्र सरकार से पहले की सरकारों ने अर्थशास्‍त्र की इसी जटिलता को भ्रष्‍टाचार व दलाली के रूप में भुनाया। उन्‍होंने राष्‍ट्रीय कार्यक्रम से निर्धारित संसाधनों के अनुसार परिश्रम करनेवालों के पूंजीगत अधिकारों का हमेशा हनन किया। इसीलिए दशकों पुराने कानूनों को नई जनांकिकी के जीवन हेतु अपेक्षित संसाधनों के अनुसार बदलने का कोई प्रयास उनके स्‍तर पर कभी नहीं हुआ।
मानवीयता के पतन का कारक बने राजनीतिक दलों से बदलाव की उम्‍मीद भी नहीं की जा सकती थी। और अब, जब एक व्‍यक्ति एक नई योजना से राष्‍ट्र की उन्‍नति के लिए संकल्‍पबद्ध है और वह इसके लिए हर जरूरी कार्यक्रम निर्धारित कर रहा है, तो उसे मात्र राजनीति में बने रहने के लिए गलत ठहराना एकदम अनुचित है। यह बात आम आदमी और किसानों को अवश्‍य समझनी चाहिए।

4 comments:

  1. आज की राजनीति मुद्दों की राजनीति कहाँ रही है. मुख्य मुद्दे को भूल कर केवल विरोध के लिए जनता को भ्रमित करना प्रत्येक पार्टियों का उद्देश्य रह गया है. बहुत विस्तृत और सटीक विवेचन..

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  2. अरे आलेख तो पढ़ने मिल ही नहीं रहा विकेश जी .

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  3. आप्लेख मुझे भी नहीं दिखा ब्लॉग पर ...

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