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रविवार, 22 मार्च 2015

भ्रमित सामूहिक-जीवन


जीवन में कई बातें हैं। बहुत से कार्य एवं व्‍यवहार हैं। पृथ्‍वी और इसके जैविक चाल-चलन अपने अद्यतन रूप में आने से पूर्व अनेकों घटन-विघटन से होकर निकले होंगे, ध्‍यान से यह बात समझ में आ जाती है। इस आधार पर वर्तमान मानवीय समस्‍याओं तथा सामाजिक विसंगतियों का अध्‍ययन कर, उनका निराकरण भी ढूंढा जा सकता है।
आज मनुष्‍य जीवन भोग-विलास में उलझा हुआ है। तत्‍काल आनन्‍द प्राप्‍त करने तथा येन-केन-प्रकारेण मनोरन्‍जन करने की प्रवृत्ति से मानव का विवेक नहीं रहा। समाज के बहुसंख्‍यक लोग भौतिक, आधुनिक तथा वैज्ञानिक आकांक्षाओं के अनुरूप अपना जीवन व्‍यतीत करने को बाध्‍य हैं। आवश्‍यक नहीं कि इसके लिए लोगों की इच्‍छा मचलती हो। यह सब इसलिए है ताकि वर्तमान जीवन-व्‍यवस्‍थाओं (चाहे वे प्राकृतिक रूप से व्‍यक्ति अनुकूल हों या नहीं) के अनुसार जीने में पिछड़ न जाएं।
लेकिन संवेदनशील मानव एकान्‍त में यह अवश्‍य अनुभव करता है कि जैसे वह जी रहा है, वास्‍तव में जीवन का तात्‍पर्य वह नहीं है। इस विचार बिन्‍दु पर मानव का स्‍वयं से एक अन्‍तर्संवाद नियमित चलता रहता है। विवशता में अंगीकृत आधुनिक जीवन तथा जैविक चेतना में इच्छित सादगीपरक व स्‍वाभाविक जीवन के दो परस्‍पर विचारों का संघर्षण व्‍यक्ति को आत्‍मघाती बना रहा है। वह इनमें से किसी एक जीवन के पक्ष में निर्णायक रूप में खड़ा नहीं हो पा रहा। परिणामस्‍वरूप मनोवांछित सादगी व स्वाभाविक जीवन की इच्‍छाएं, विवशता में अंगीकार किए गए आधुनिक व वैज्ञानिक जीवन-व्‍यवहार तले आजीवन दबी रहती हैं। इससे अधिकांश मनुष्‍यों का जीवन कुण्‍ठाओं, कुतर्कों से उबर नहीं पाता।
इस जीवन व्‍यवहार में पड़ा मानव तो जीवन व्‍यर्थ कर ही रहा है, वह भावी सं‍तति के लिए जीवन को स्‍वाभाविक, प्राकृतिक बना कर एकांगी करने का प्रयास भी नहीं कर पा रहा। वास्‍तव में वह इसके लिए योग्‍य ही नहीं रहा। इस दिशा में कुछ किया जा सकता है, तो उसके लिए सबसे पहले अपनी कुण्‍ठाओं, कुतर्कों तथा मतभेदों को भुलाना होगा।
बच्‍चों के लिए सोचकर हम बहुत सारे काम कर सकते हैं। सर्वप्रथम घर से शुरुआत करें। अपने व्‍यवहार को संयमित बनाएं। टेलीविजन, मोबाइल फोन आदि आधुनिक गैजेट के दुष्‍प्रभावों के बारे में बच्‍चों को ज्‍यादा से ज्‍यादा जानकारी प्रदान करें। उन्‍हें बताएं कि वे इनका यथोचित प्रयोग कर ही इनके लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं। टेलीविजन पर अधिक समय चलचित्रों को देखना आंखों के अलावा पूरे शरीर के लिए हानिकारक है। व्‍यवहार में जीवन कैसा है और कल्‍पनाओं-कहानियों के आधार पर टेलीविजन पर प्रस्‍तुत होनेवाले कार्यक्रमों की विषय-वस्‍तु वास्‍तविक जीवन या इसके व्‍यवहार से कितनी अलग है, ऐसी बातें विस्‍तारपूर्वक किशोरवय बच्‍चों को बताई जाएं। 
बच्‍चों को इस दिशा में जागरूक न कर प्रौढ़ व परिपक्‍व व्‍यक्ति आज बच्‍चों के सामने ही टेलीविजन के ऐसे कार्यक्रमों में गम्‍भीर अभिरुचि दिखाता है। उसके हाव-भाव किसी भी समय टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रति उपेक्षित नहीं होते। ऐसे में किशोरवय बच्‍चों को यह सोचने-विचारने या समझने का अवसर कैसे, किसकी प्रेरणा से मिलेगा कि वह जो कुछ भी टेलीविजन पर देख रहा है, उसका अच्‍छा-बुरा (अधिकांशत: बुरा) पक्ष क्‍या है। बच्‍चों की कम जीवन-समझ के अनुसार यदि टेलीविजन कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं, तो उनके अभिभावक तो उन्‍हें यह बता ही सकते हैं कि उनके लिए क्‍या देखना ठीक है और क्‍या गलत। 
व्‍यावसायिक मानसिकतावाले एवं अधिक धन-सम्‍पत्ति लाभ अर्जित करने का लोभ पालनेवाले लोग समाज, बच्‍चों के लिए कभी नहीं सोच सकते। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है कि लोकतांत्रिक शासन पद्धति के अन्‍तर्गत कई चरणों में बच्‍चों के लिए शिक्षा से लेकर मनोरंजन के कार्यक्रम बनाने व उनका क्रियान्‍वयन करने का दायित्‍व ऐसे ही व्‍यावसायिक मानसिकता रखनेवालों के हाथों में है। इसके दुष्‍परिणाम क्‍या हुए, हैं या होंगे, हम देख ही रहे हैं।  
प्रगति की बात होती है, तो इसका तात्‍पर्य क्‍या है। क्‍या यही कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति के पास भव्‍य घर, सुविधाओं से युक्‍त वाहन, धन-सम्‍पत्ति का संग्रह  आदि हो। लेकिन थोड़ा सा आज के मुख्‍यधारा के भौतिक विचार से अलग सोचकर देखें तो सर्वथा एक नया विचार उभरेगा। इसमें भौतिक सुख-सुविधाओं के अतिदोहन के दुष्‍परिणाम हमें कई  तरह से पीड़ा दे रहे हैं। आज लोग पहले कभी नहीं महसूस किए गए मनोरोग से पीड़ित हैं। कई बार लगता है कि हम मानवीय संरचना हैं या मशीनी। य‍दि यह वैचारिक लगन क्षण-क्षणांश बढ़ रही है और भौतिक संसाधनों की राक्षसी चाह में आगे भी इसके ऐसे ही बढ़ते रहने की आशंका है, तो तब हमारे पास बचेगा क्‍या। एक रिक्‍त और भावनाशून्‍य जीवन, जिसकी अपने एकान्‍त जीवन में हमें कभी अपेक्षा नहीं रहती, पर आज के भ्रमित सामूहिक-जीवन के कारण हमें भी इसे ही अंगीकार करना पड़ता है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक विचार

    इस भागमभाग में न घर के भीतर चैन है न बाहर सुकून | अच्छे और विचारणीय सुझाव हैं

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  2. आपके विचार प्रभावित करते हैं विकेश जी . काश इतनी गहनता और गम्भीरता से सभी लोग सोचें व अमल करें . सच तो यह है कि टीवी, इंटरनेट ऐसे जहर हैं जो हमें खत्म कर रहे हैं और हमें पता भी नहीं चल रहा . अब बेहद जरुरी है कि लोग इस तरफ सोचें और सोचें ही नहीं सार्थक कदम उठाएं .

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  3. अब सभी के जीवन का एक ही सार है -ज्यादा से ज्यादा पैसा हड़प लेना, बिना जरुरत के भी निरर्थक भोग-विलास की चीजों को जुटाकर घर को जंगल बना देना। बात के समझने तक वक़्त हाथ से फिसल जाता है। आपके सुझाव की मैं क़द्र करता हूँ और निश्चित तौर पर सभी को इस पर अमल करने की जरुरत है।

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  4. बहुत अच्छी प्रभावशाली, गंभीर चिंतन प्रस्तुति ...
    आभार!

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  5. जो संस्कारी जीवन के सूक्ष्मतम स्पंदनों को पहचानते हैं वे अवश्य ही भावी संतति को वही देते हैं चाहे उसकी जो कीमत देनी पड़े .

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  6. व्यावसायिक तो सभी हो गए हैं .. और सामाजिक ताना बना, तंत्र सभी इसकी तरफ प्रेरित भी करते हैं ... माँ बाप को भी अज की व्यावसायिकता यही सोचने को कहती है की अपने बुढापे का ख्याल पहले रखो ... बच्चों का पता नहीं बुढापे में देखेंगे या नहीं ... और आधुनिक समाज में ऐसा होता भी है की बच्चे माँ बाप की नहीं सोचते ... एक चक्रव्यूह या बदलाव की परिस्थिति ... पता नहीं ...

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  7. जीवन को दूषित करने के इतने रास्ते निकल आये हैं कि आदमी क्या क्या करे. बच्चे-बच्चे नहीं रहे "की-बोर्ड वारियर" बनते जा रहे. और एक हम है जिन्हें एक पल का समय नहीं है आत्म-अन्वेषण करने के लिए. अच्छा लगा आपका पोस्ट पढ़कर.

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  8. सच ही तो है। सब मात्र दिखावे से अधिक और कुछ भी नहीं है। विचारणीय आलेख।

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  9. तथाकथित प्रगति के नाम पर हम अपनी अगली पीढी को जो ज़हर परोस रहे हैं उससे हम जानकार भी अनजान बन रहे हैं...बहुत सारगर्भित आलेख..

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  10. सार्थक विचार ,प्रभावशाली, गंभीर चिंतन प्रस्तुति आभार!

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