महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, October 26, 2014

भोगोपभोग से मुक्ति की चाह

देश का सामूहिक जीवन बहुत अधिक कुंठित है। समझ-बूझ रखनेवाले लोग तब भी अपने-अपने सामाजिक परिवेश को आशा और विश्‍वास बनाए रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। मनुष्‍य या मनुष्‍यों का समूह एक समाज के रूप में सहजता से जीवनयापन कैसे कर सकता है, जब उसके पास परम्‍परा और आधुनिकता के साथ सामंजस्‍य बनाए रखते हुए जीवन जीने की बाध्‍यता हो। इस कारण परम्‍परागत सामाजिक धर्म, उत्‍सव, त्‍योहार, खेल, आदि जीवन संगतियां सामूहिक भाव-बहाव से संचालित न होकर व्‍यक्तिगत एकल भाव से परिचालित होने लगी हैं, जिसकी हानि अनेक सामाजिक विसंगतियों के रूप में हो रही है। जैसे, धर्म जो ऐकान्तिक अराधना थी, वह सड़क पर लाउडस्‍पीकर के द्वारा गाया-बजाया जानेवाला एक सामाजिक ध्‍वनि प्रदूषण बन गया है। त्‍योहार, जो सामाजिक संचेतना और ऊर्जा के वाहक थे, सबसे पहले व्‍यापारिक क्रियाओं के आधार बने और होते-होते आज अपव्‍यय, अव्‍यवस्‍था के सबसे बड़े कारक बन गए हैं। खेल व क्रीड़ाएं कभी तन-मन को स्‍वस्‍थ रखनेवाली गतिविधियां थीं, वे अब आज भारतीय स्‍वतन्‍त्रता के बाद से लेकर अब तक हुए अवैध धन के लेन-देन को राजकीय प्रबन्‍ध के सहारे गति दे रही हैं।
वर्तमान में मनुष्‍य जीवन के रंजन के लिए निर्धारित उसकी प्रत्‍येक पारम्‍परिक और सामाजिक संगति को व्‍यापार से जोड़ चलाया जा रहा है। व्‍यापार गलाकाट सामाजिक प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ा रहा है। व्‍यापार में उद्यमिता की कोई बात-विचार है ही नहीं। व्‍यापारिक भागदौड़ एक जनवर्ग द्वारा अत्‍यधिक लाभ अर्जित करने का माध्‍यम मात्र बन गई। उपभोक्‍ता और व्‍यापारी बन मनुष्‍य वस्‍तुओं के बजाय स्‍वयं का भोगोपभोग करने पर लगा हुआ है। उसकी आत्‍मरुचि समाप्‍त हो गई और उसमें उपभोक्‍तावाद के परिणामस्‍वरूप अनावश्‍यक महत्‍वाकांक्षाओं के विचार जड़ें जमाने लगे हैं। मनुष्‍य केवल दिमाग से ही किसी बात या विचार का विश्‍लेषण कर पा रहा है। इससे उसमें आत्‍मतनाव की अधिकता हो गई है। आत्‍मतनाव शुरु होने का मतलब है मनुष्‍य का मनुष्‍यता से तीव्र विचलन। ऐसा होने पर जनमनगण की कल्‍याण भावना कैसे बनेगी। इसी कारण सामाजिकता, उद्यमिता व जनकल्‍याण के कार्य मनुष्‍य की आत्‍मरुचि से संगठित नहीं हो पा रहे। इन सबसे जीवन बाहर से तो चमक रहा है, पर अन्‍दर से अन्‍धेरों में लिपटा हुआ है।
     जीवन यदि अन्‍धेरा है तो उसमें उजाला लाने के लिए हमें दूसरा जीवन नहीं मिलनेवाला। इसी तरह यदि जीवन आशान्वित है, तो भी आशाओं के फल यदि इस जीवन के बने-रहने के आखिरी भाव तक भी नहीं मिले, तब कैसा प्राकृतिक न्‍याय और कौन सी जीवन या जैविक मौलिकता! शायद भगवान के प्रति भी यहीं इसी विचार-बिन्‍दु से भ्रम-पोषित अविश्‍वास बढ़ने लगता है। भगवान के प्रति पूर्ण अविश्‍वास भी यह सोच कर नहीं होता कि हमें इतना तो मान-जान लेना ही चाहिए कि जीवन सदैव नहीं रहेगा। इस रहस्‍य को जानने-समझने की चाह सभी मनुष्‍यों में कभी न कभी तो होती ही है कि आखिर मौत के बाद का खेला है क्‍या! बेशक जीवन के प्रति बच्‍चों का आत्‍मविश्‍वास बढ़ाने के विचार से परिपक्‍व और प्रौढ़ जन उन्‍हें प्रसन्‍नतापूर्वक जीवन गुजारने की सलाह देते रहे हैं और अभी भी दे रहे हैं, और यह उनका व्‍यक्तिगत कर्तव्‍य भी होता है, जिसकी अनुभूति उन्‍हें आत्‍मप्रेरणा से स्‍वयं ही होती है, पर वे भी अपने नितान्‍त एकल जीवन-दर्शन में मृत्‍यु के विचार पर विचारहीन और भावविहीन होते हैं।
आज इस भाव से एकाकार होना सम्‍पूर्ण सामूहिक जीवन के लिए बहुत आवश्‍यक है। यही भावना वैश्विक उपभोक्‍तावादी दुष्‍प्रवृत्तियों पर चमत्‍कारिक नियन्‍त्रण कर सकती है। दुनिया के अतिसंवेदनशील विद्वानों, लोगों ने समय-समय पर सबकी खुशहाली के लिए यही मन्‍त्र तो फूंका है। यदि यह मन्‍त्र युवाओं की समझ में भी आ जाए तो संसार उपभोक्‍तावाद से बाहर निकल सकता है और यह हो गया, तो जीवन पहले कभी नहीं अनुभूत किए गए सबसे सुन्‍दर, सबसे अपेक्षित भावनाओं से सुसज्जित होगा।

Friday, October 10, 2014

मालगुडी डेज के नारायण

ज आर. के. नारायण का 108वां जन्‍म-दिवस है। दक्षिण भारतीय अंग्रेजी लेखक और उत्‍तर भारतीयों में मालगुडी डेज के लेखक के रूप में प्रसिद्ध नारायण अपने समय के बड़े उत्‍प्रेरक लेखक रहे। जिन्‍हें उनके अंग्रेजी उपन्‍यास वेंडर ऑफ स्‍वीट्स पढ़ने का अवसर मिला, वे नारायण की साहित्यिक उत्‍कृष्‍टता से भलीभांति परिचित हैं। उनके लेखन में पचास-साठ के दशक का दक्षिण भारतीय जीवन अपने मूलरूप में प्रकट होता है। उनकी रचनाएं अपने किसी भाग, अंश या खण्‍ड में यह अहसास ही नहीं होने देती कि इन्‍हें कोरी कल्‍पनाओं के आधार पर रचा गया है। आर. के. नारायण की मर्मस्‍पर्शी रचनाओं पर आधारित शंकर नाग के निर्देशन में बनाया गया मालगुडी डेज धारावाहिक जितनी बार भी देखा जाए उतनी बार जीवन के सम्‍बन्‍ध में एक नई संवेदना और सीख ही देता है। विशेषकर बच्‍चों के अपरिपक्‍व मन-मस्तिष्‍क पर मालगुडी डेज धारावाहिक का चलचित्रण सकारात्‍मक असर डालता है और जीवन के मूल को समझने और उसके अनुसार आचरण करने की प्रेरणा देता है।
वेंडर ऑफ स्‍वीट्स उपन्‍यास का हिन्‍दी रूपान्‍तरण मिठाईवाला भी निरुपम है। मिठाईवाला की भूमिका में अनंतनाग ने अत्‍यन्‍त प्रभावी अभिनय किया है। उपन्‍यास की कहानी, कथ्‍य और उद्देश्‍य को धारावाहिक में इतने मर्म से प्रस्‍तुत किया गया है कि दर्शक के अनन्‍य प्रबोध चक्षु स्‍वत: खुलने लगते हैं। इसमें उसे आर. के. नारायण, मालगुडी डेज, मिठाईवाला, शंकर नाग, अनंत नाग सहित धारावाहिक के सभी चरित्र चित्रण गुजरे कालखण्‍ड में अपने जीवन से जुड़े हुए लगते हैं। मालगुडी डेज के माध्‍यम से उत्‍तर भारतीयों के सामने आर. के. नारायण के लेखकीय कौशल को प्रस्‍तुत करने के लिए शंकर नाग निश्चित रूप से प्रंशसनीय हैं। लेकिन शंकर नाग ने भी तो आर. के. नारायण के उपन्‍यास से प्रभावित होकर ही धारावाहिक बनाने की प्रेरणा ली। इसलिए मालगुडी डेज के सम्‍पूर्ण वाड.मय का जो भी साहित्यिक या कलात्‍मक आकर्षण है उसके सबसे बड़े निर्माता तो आर. के. नारायण ही हैं।
हिन्‍दी में मनोहर श्‍याम जोशी ने मालगुडी डेज की पटकथाएं लिखीं। उन्‍होंने धारावाहिक के संवाद भी रचे। हिन्‍दी के अनेक जाने-माने कलाकारों, निर्देशकों और साहित्‍य-सेवकों ने भी मालगुडी डेज नामक अंग्रेजी साहित्‍य-श्रृंखला को हिन्‍दी में अनूदित और चलचित्रित कर बहुत बड़ा काम किया है। मालगुडी डेज के हिन्‍दी संस्‍करण से ही हिन्‍दीभाषी आर. के. नारायण की सत्‍साहित्यिक उत्‍कृष्‍टता को जान पाए। कला और साहित्‍य प्रेमियों का उनके प्रति जो भी समादर है, उसके आधारभूत तत्‍वों में खुद आर. के. नारायण तो हैं ही साथ ही मालगुडी डेज को हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करनेवाला कलाकार-दल भी इसके लिए बधाई व आदर का पात्र है।  
आर. के. नारायण साहब की साहित्यिक स्‍मृतियां इसलिए भी उज्‍ज्‍वल बनी हुई हैं क्‍योंकि दक्षिण भारत की राजनीति-शासन ने साहित्‍य को सम्‍मान देने का अपना अध्‍यवसाय कभी रुकने नहीं दिया। वहां के प्रशासनिक तन्‍त्र ने साहित्‍य के लिए अलग से विशेष योजनाएं चलाईं, जो आज तक यथावत हैं। इस साहित्‍यकार ने मद्रास के उपनगरीय क्षेत्र मालगुडी, कुम्‍भम को भी अपने साहित्‍य के द्वारा विश्‍व-पटल तक पहुंचाया। विश्‍व को इन क्षेत्रों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, आर्थिक पहचान से अवगत कराया। उनके इस योगदान को मालगुडी और कुम्‍भम का संवेदनशील व्‍यक्ति कभी नहीं भुला सकता।
यही कार्य साहित्‍य को देखते हुए पूरे देश में होने चाहिए ताकि आर. के. नारायण जैसे लेखकों की रचनाओं से जनमानस जीवन-प्रसाद ग्रहण करता रहे।
                                              --विकेश कुमार बडोला