Thursday, June 19, 2014

मशीनी मानव

पारम्‍परिक तरीके से विचलित दुनिया में आधुनिक सुविधाएं और सुरक्षा बहुत बड़ी बात है। कोई कितना भी बड़ा त्‍यागी हो, उसे भी किसी न किसी रूप में अपने शरीर की रक्षा के लिए आधुनिकता का थोड़ा बहुत सहारा तो चाहिए ही। संवेदना के स्‍तर पर यह आकलन हो सकता है कि आज की अधिकांश मानवीय जीवन स्थितियां जिन कारणों से परेशानी में फंसीं, उनका निर्माण परम्‍परा एवं प्रकृति को नष्‍टकर बनाए गए भौतिक आवरण ने ही किया है।
 हिंसा के बाद जीवित चेहरों
 पर ऐसे ही प्रश्‍नचिन्‍ह होंगे
     पुरातन काल में आदमी उन वस्‍तुओं या सुविधाओं पर आश्रित रहा, जो प्रकृति में विद्यमान थीं। लोगों ने शरीर पर वनस्‍पतियां लपेटकर जीवनयापन किया। भूख लगी तो प्राकृतिक रूप से उपलब्‍ध खाद्य पदार्थों की पहचान करी और उनसे भूख को तृप्‍त किया। कई मानव पीढ़ियां तो इसी स्थिति में पूरा जीवन गुजार गईं। तब से लेकर आज तक मानवीय इच्‍छाओं के कारण अनगिनत जीवनोपयोगी वस्‍तुओं का अविष्‍कार हुआ। साथ ही जितनी ज्‍यादा जीवनोपयोगी वस्‍तुओं का अविष्‍कार होता रहा, मानव की इच्‍छाएं भी उसी गति से बढ़ती रहीं। आज हम वस्‍तुओं, सामग्रियों तथा सुविधाओं के शिखर पर बैठे हुए हैं। ध्‍यान से सोचकर पता चलता है कि सुविधाओं के ताने-बाने ने मानवीयता की नैसर्गिक प्रवृत्ति को बहुत ज्‍यादा कमजोर किया है। जबकि इसकी मानवीय जीवन के लिए अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। सुविधाओं को जुटाने के प्रयास जब व्‍यापार में बदल जाएं, व्‍यापार में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा से मूलभूत सामग्रियों में जानलेवा मिलावट हो रही हो, प्रकृति प्रदत्‍त मानवीय स्‍वास्‍थ्‍य आधुनिक व्‍यवस्‍थाओं के नाम पर रोगग्रस्‍तता ग्रहण करता जाए और यह सब क्रियाकलाप पूरी दुनिया में इतने गड्डमड्ड हो जाएं कि कोई भी शासन प्रणाली इसे बदलकर ठीक न कर पाए तो फिर आखिर में क्‍या उपाय बचता है, जिसे अपनाकर जीवन की इन सबसे बड़ी चुनौतियों से निपटा जा सके।
     यह प्रश्‍न वैसे तो देश-दुनिया की प्रतिदिन की दुर्घटनाओं के बाद हर समय मन-मस्तिष्‍क में कौंधता रहता है, पर आज (१९ जून, २०१४) के एक समाचार ने इस पर गहराई से सोचने के लिए विवश कर दिया। समाचार के अनुसार एक सुविधासम्‍पन्‍न व्‍यक्ति ने अपनी पत्‍नी, साले और श्‍वसुर की हत्‍या कर दी। आमतौर पर हिंसा, अपराध आदि के लिए वही व्‍यक्ति दुष्‍प्रेरित होता है जो अभाव में हो। गरीबी में दिन काट रहा व्‍यक्ति यदि कोई चीज पाने के लिए ऐसे अपराध करता हो तो बात समझ में आती है, पर घर-गाड़ी-रोजगार-गृहस्‍थ सम्‍पन्‍न कोई व्‍यक्ति किसी सनक में अपने ससुराल जाकर अपनी पत्‍नी सहित साले और श्‍वसुर को जान से मारकर खुद को भी जान से मार दे तो इसे किस रूप में परिभाषित किया जाएगा।
सुविधाओं के शिखर पर विराजमान मानव की नैसर्गिक मानवीयता का ह्रास इसी रूप में हो रहा है। अगर खुद सहित तीन लोगों को मारनेवाला यह व्‍यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं की कमियों से नहीं जूझ रहा था तो उसका यह आत्‍मघात आखिर समाज को क्‍या संदेश देता है? अगर वह अपनी पत्‍नी से किसी प्रकार से असन्‍तुष्‍ट था या अपने ससुरालियों की किसी बात से सहमत नहीं था या अपने पूरे परिवार और सम्‍बन्धियों के किसी निर्णय से आहत था तो इसका हल मौत के अलावा क्‍या किसी और रूप में नहीं निकल सकता था? ऐसे व्‍यक्ति को सामग्री और सुविधा से लादनेवाला तन्‍त्र क्‍या उसे जीवन सम्‍यक दृष्टिकोण अपनाने की को‍ई शिक्षा नहीं दे सकता था? क्‍या उसे मानवता के सरोकारों से अभिसिंचित नहीं कर सकता था? यदि ऐसा नहीं हो सकता और मनुष्‍य की दौड़ तमाम वस्‍तुओं को प्राप्‍त करने के बाद भी जारी रहती है तो निश्चित है मनुष्‍य को मशीन बनने से कोई नहीं रोक सकता और मशीन से यह आशा करना कि वह हमसे प्रेम करेगी, व्‍यर्थ है। पल-पल मशीनी होते मानव से हिंसा के अतिरिक्‍त और किसी प्रतिक्रिया की उम्‍मीद की भी नहीं जा सकती।

Saturday, June 14, 2014

विनाश की बरसी


न् २०१३ का आषाड़। यानि १६, १७, १८ जून। इन तारीखों में घटे विनाश को कुछ ऐसे (मृतकों की बेकद्री) लिखा था मैंने। आगामी १६,१७,१८ जून को विनाश की बरसी है। केदारनाथ मन्दिर सोलह तारीख को लोगों से क्‍या कह गया, अब तक यह समझने का प्रयास ही नहीं किया गया। सरकार सब भूलकर मन्दिर के कपाट खोल चुकी है। नए तीर्थयात्री एक साल को यूं ही भूल गए हैं। उन्‍हें अपने पूर्ववर्ती तीर्थयात्रियों की मौतें एक साल बाद बहुत सामान्‍य बात लगती है। उनके दिमाग में विकास का सूत्रवाक्‍य गूंज रहा है कि जीवन में पीछे नहीं आगे की ओर ताकना है। आगे ही आगे बढ़ना है। यह आगे बढ़ने का मन्‍त्र पता नहीं कब शक्तिविहीन होगा! इसकी परिधि में ना चाहते हुए भी लोग घुस ही जाते हैं, जिसमें उन्‍हें अपने हठ के अलावा कुछ नहीं सूझता।
केदारनाथ ने जो जलप्रलय मचाई उसका संकेत साफ था कि मुझे खोखली भक्ति नहीं चाहिए। मुझे मेरे सिद्धान्‍तों के विरुद्ध जाकर पूजने की जरूरत नहीं है। मेरी चौखट पर आस्‍था का जो नाटक हो रहा है, जैसा प्रदर्शन हो रहा है उससे मैं बिलकुल भी प्रसन्‍न नहीं हूं। बड़े पूंजीपति अपने कारखानों में श्रमिकों का खून चूसकर अर्जित धनदान करने मेरे परिसर में आ रहे हैं। क्‍या मैं ऐसे खूनी दान को स्‍वीकार कर सकता हूं? सरकार अपने मूल कर्तव्‍यों का निर्वाह न करते हुए मुझ तक पहुंचने के लिए प्रकृति को बिगाड़ने पर तुली हुई है। प्रकृति को बिगाड़कर बनाए गए कृत्रिम मार्गों के रास्‍ते मुझ तक पहुंचनेवाले अगर इतने ही प्रभुप्रेमी हैं तो अपने आसपास फैली सामाजिक गन्‍दगी को साफ क्‍यों नहीं करते? मेरा सिद्धान्‍त तो सब मानवों का कल्‍याण है और धनवान मानव अगर निर्धनों को सताकर पापभाव का अनुभव करे और उससे मुक्ति के लिए मेरे पास आए तो मैं क्‍या मूर्ख हूं, जो उसे क्षमा कर दूंगा। मेरे पास आने के लिए मानव के मन में कोई पाप-पुण्‍य की इच्‍छा नहीं होनी चाहिए। कोई मनुष्‍य यदि इस अभाव में मेरे पास आए तो मैं उसका ध्‍यान करूंगा। मेरे बनाए गए मानवीय सिद्धान्‍तों का उल्‍लंघन करने के बाद मुझे प्रणाम करके और मेरी चरण वन्‍दना करके कोई भी धूर्त मनुष्‍य मेरे दण्‍ड से बच नहीं सकता।
इस बात को तीर्थयात्री, सरकार, तीर्थस्‍थल के व्‍यवसायी बिलकुल नहीं समझ पा रहे हैं। सब को अपने नितान्‍त हित की चिन्‍ता है। इस स्‍वार्थ लिप्‍सा में वे धर्म का अपमान कर रहे हैं। नकली धार्मिकता अंगीकार कर रहे हैं। झूठा प्रभु चिन्‍तन और स्‍मरण करके क्‍या वे प्रभु को मूर्ख बना सकते हैं? शायद उन्‍हें लगता है कि वे ऐसा कर पा रहे हैं। तभी तो उनकी धृष्‍टता उनकी धार्मिकता पर हावी है। वे जानते हैं, समझते हैं कि उनके हाथों समाज, परिवार, सम्‍बन्‍धों सबका तिरस्‍कार हो रहा है। वे लोगों को भी अपने पापमार्गों पर चलने को दुष्‍प्रेरित कर रहे हैं। लोग भी विवशता से उन मार्गों पर चले रहे हैं।
केदारनाथ की इस वर्ष की यात्रा पूरी कर चुके लोग इस बात को एक भ्रान्ति मान सकते हैं कि नाथ वास्‍तव में क्‍या चाहते हैं। वे यह सलाह भी विद्वेष भावना से भुला देंगे कि उनका वहां न जाना ही धार्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक दृष्टि से श्रेष्‍ठ होगा। मन्दिर के पुजारी, सरकार, पर्यटन व्‍यवसायी और लोग केदारनाथ की सलाह को तब तक अनसुनी करते रहेंगे जब तक पिछले वर्ष की प्रलय की पुनरावृत्ति नहीं होती। विनाश की बरसी मनाने के बजाय लोग विनाश के मूर्ख व धूर्त कारक न बनने की शपथ लें तो ठीक होगा।

Friday, June 6, 2014

अच्‍छे दिनों का आम आदमी को अहसास तो हो

किसी भी किस्‍म के चुनाव में जीत ही बड़ी बात नहीं होती। जीतकर सत्‍तारूढ़ होनेवाले राजनीतिक दल अगर बड़े-बड़े काम करें तो कुछ समझ आता है। चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार के लिए राजनीतिक दलों ने अप्रैल-मई की गर्मी में जितना देशव्‍यापी भ्रमण किया है, क्‍या वैसी ही यात्राएं नेतागणों को अब काम के सिलसिले में नहीं करनी चाहिए? महात्‍मा गांधी सहित अनेक दिवंगत पुरुषों के स्‍मृतिस्‍थल पर जाकर अतिविनम्रता का जो व्‍यवहार मन्‍त्रीजन कर रहे हैं, क्‍या उसके लिए भारत जैसे देश में मन्त्रियों को समय मिल जाना चाहिए?
देश की अधिकांश जनसंख्‍या जीवन की आधारभूत जरूरतों के लिए प्रतिदिन बहुत जटिल तन्‍त्र से उलझती है। खाद्य पदार्थों तक आसान पहुंच बनाना हो या बच्‍चों का विद्यालय में प्रवेश या फिर बीमार होने पर सरकारी चिकित्‍सालयों में इलाज करवाना, सब कुछ बहुत ज्‍यादा मुश्किल है इस देश में। शायद ही कोई साधनहीन व्‍यक्ति हो, जो ऐसी परिस्थितियों में अपने गरीब परिवार सहित आत्‍महत्‍या का विचार न करता हो।
 ऐसे में हमारे नेताओं को अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर विकास दर की प्रतिस्‍पर्धा में बने रहने की चिन्‍ता छोड़ देनी चाहिए। उनका ध्यान उस गरीबी को पाटने पर होना चाहिए, जिसे मुद्दा बनाकर उन्‍होंने चुनाव में जीत पाई। राष्‍ट्र नायकों को मरणोपरान्‍त सम्‍मान, उनकी प्रतिमाओं पर माल्‍यार्पण जैसे कार्यक्रम उसी देश में ठीक लगते हैं, जिसके वर्तमान जीवित नागरिकों की मूलभूत जीवन आवश्‍यकताएं सुगमता से पूरी हो रही हों।
कुछ यूरोपियन राष्‍ट्र सम्‍मान-स्‍मृति समारोहों का आयोजन करते हैं। लेकिन वहां यह संस्‍कृति तब अपनाई गई जब वे अपने नागरिकों की सभी जीवन सम्‍यक जरूरतें पूरी करने के कई दशक गुजार चुके। खाद्य व जलापूर्ति तक अपने लोगों को सही से उपलब्‍ध नहीं कर सकनेवाले देश की सामूहिक प्राथमिकताएं क्‍या हों, इस पर नए राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व को क्रान्तिकारी तरीके से विचार करना होगा। एक सामान्‍य आदमी अगर अपनी बुनियादी जरूरतों के अनुरूप बदलाव महसूस करता है, तो शासन व्‍यवस्‍था के प्रति लोकतान्त्रिक भरोसा जगेगा।
सामाजिक और शासकीय अपेक्षा आधुनिक व्‍यवस्‍था में हरेक आदमी को योग्‍य बनाने की नहीं बल्कि उसे मूलभूत अधिकारसम्‍पन्‍न बनाने की हो। लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अनुरूप योग्‍य व्‍यक्ति तो शासन-प्रशासन में मौजूद हैं ही। उनका कर्तव्‍य है कि अब वे अपनी योग्‍यता से देश के सबसे कमजोर आदमी को एक भारतीय नागरिक की सच्‍ची हैसियत प्रदान करें।
प्रधानमन्‍त्री नरेन्‍द्र मोदी की दूरदृष्टि के अनुसार तो देश को इस कार्य में सफलता मिल सकती है। लेकिन प्रश्‍न है कि मोदी ही अकेले कब तक लोककल्‍याण की महत्‍वाकांक्षा में जिएंगे। उनके मन्त्रिमण्‍डल और राजनीतिक समूह राजग के प्रत्‍येक सदस्‍य व कार्यकर्ता को भी ऐसी भावना से संचित होना होगा। राजग नेतृत्‍व को यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि आम आदमी के पास गरीबी में जीने और इससे उबरने के लिए केवल एक ही जीवन है। देश का आम आदमी विकट संघर्ष कर रहा है। उसे राहत देने की नीतियां बनाने और उनके त्‍वरित क्रियान्‍वयन में नई सरकार ज्‍यादा विचार-विमर्श करने के बजाय ज्‍यादा काम करे। कोई भी नीति बने तो उसके केन्‍द्र में समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग का ध्‍यान अवश्‍य रहे। उसे लगना तो चाहिए कि अच्‍छे दिन कैसे होते हैं।

Sunday, June 1, 2014

मोदी जैसे व्‍यक्तित्‍व के प्रतिरूप गढ़ने की आवश्‍यकता

पने मन्त्रिमण्‍डल के सदस्‍यों को सौ दिन के कार्यों की रूपरेखा बनाने के लिए कहना, मन्त्रिमण्‍डल एवं अनेक मंत्रालयों के प्रमुखों को अपने किसी सम्‍बन्‍धी को कार्यालयी कर्मचारी-वर्ग में नहीं रखने का आदेश देना, संयुक्‍त प्रगतिशील गठबन्‍धन के शासन में गठित कई उच्‍चाधिकार प्राप्‍त मन्त्रिसमूहों और अन्‍य मन्त्रिसमूहों को हटाना, अनेक मंत्रालयों और उनके विभागों को अपने मंत्रालयों-विभागों से सम्‍बन्धित कार्यों के निर्णय स्‍वयं लेने के लिए प्रेरित करना एवं किसी कठिनाई की स्थिति में प्रधानमन्‍त्री कार्यालय व मन्त्रिमण्‍डल सचिवालय से नि:संकोच सम्‍पर्क करने की अनेक स्‍वच्‍छ-पारदर्शी-सर्वस्‍वीकार्य जैसी प्राथमिकताएं नरेन्‍द्र मोदी जैसा व्‍यक्ति ही तय कर सकता है।
जो व्‍यक्ति अपने सामान्‍य संभाषण में भी कई गहन और शोधपरक बातें धाराप्रवाह हिन्‍दी में बोल सकता है, वह भारतीय शासन को सर्वश्रेष्‍ठ तरीके से संचालित करने के लिए कितनी अन्‍यान्‍य दूरदर्शी नीतियां बना रहा होगा, इसकी कल्‍पना एक सामान्‍य कुण्ठित भारतीय कभी नहीं कर सकता। यदि सत्‍ता के सर्वोच्‍च पद पर बैठा व्‍यक्ति अंशमात्र का पदाभिमान नहीं करे तो उसमें उस सामूहिक कर्तव्‍य के प्रति दृढ़ता बनी रहती है, जिसके लिए उसका लोकतान्त्रिक चयन हुआ है।
गुजरे छह दशकों में भारतीयों ने नरेन्‍द्र मोदी जैसे व्‍यक्ति को लोकता‍न्त्रिक बहुमत से शासन में लाने की इच्‍छा पाली होती तो आज भारतीय भूभाग की स्थिति हर प्रकार से अच्‍छी होती। एक संसाधन का दो अलग व्‍यक्ति अलग-अलग प्रयोग करते हैं। एक उसका सुरक्षित प्रयोग करता है। दूसरा उसका अतिक्रमित प्रयोग करता है। मोदी पहले प्रयोग की पक्षधरता करते हैं। उनके पास किसी कार्य योजना को लागू करने से पहले उसके सही-गलत प्रभावों के बारे में विचार करने की शक्ति है। विचारों को कार्यरूप में बदलने का शासकीय कौशल है। उनमें शासन करने का सर्वथा एक नया अवलोकन है। एक आम भारतीय नागरिक देश में अपनी स्थिति के बारे में क्‍या सोचता है और क्‍या पाना चाहता है, इस बिन्‍दु पर सोचने की दूरदर्शिता है। मुख्‍यमन्‍त्री रहते हुए अपने कार्यक्रमों का जिस नि:स्‍वार्थ सेवाभाव से उन्‍होंने क्रियान्‍वयन किया, वह अन्‍य राजनीतिज्ञों के लिए अनुकरणीय, देशी-विदेशी शोधार्थियों के लिए शोधनीय और विचारकों के लिए विचारणीय अवश्‍य होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो समझ लेना चाहिए कि मोदी केन्द्रित राजनीति के अलावा बाकी राजनीति राष्‍ट्रीय संचालन के लिए बहुत ज्‍यादा नौसिखिया है। शोधार्थी यदि उनसे वैरभाव पाले हुए हैं तो यह उनके मानवपक्षीय शोध लक्ष्‍य पर बड़ा प्रश्‍नचिन्‍ह लगाता है। अधिकांश विचारक यदि उन्‍हें अभी भी नहीं समझ पाए हैं तो यह उनकी वैचारिकता के खोखलेपन को दर्शाता है।
प्राय: एक व्‍यक्ति का अपने जीवन में अनेक घटनाओं के प्रति अपना जो रूढ़ रवैया होता है, वह राष्‍ट्रीय या सामूहिक हितों के बारे में विचार करते समय कहीं खो जाना चाहिए। विशेषकर ऐसे व्‍यक्ति यदि शासन-प्रशासन में हों तो तब यह रवैया अतिशीघ्र पृष्‍ठभूमि में पहुंच जाना चाहिए। लेकिन देखा यह गया है कि राष्‍ट्रीय व सामूहिक हितों के बाबत निर्णय करते समय व्‍यक्तिवादी मूढ़ता राजनीतिज्ञों-अधिकारियों पर हावी रही है। मोदी ऐसे प्रपंच से भारतीय मानसिकता को निकालने के लिए एक अग्र राजदूत बनकर सामने आए हैं।
एक व्‍यक्ति जीवित रहते हुए ही अपनी विचारधारा का प्रभावी प्रसार कर सकता है। नरेन्‍द्र मोदी जब तक हैं निसन्‍देह वे ऐसा करेंगे लेकिन यह प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से उभरता है कि उनकी अनुपस्थिति में कहीं उन जैसे व्‍यक्तियों का अभाव न हो जाए। इस दिशा में भारतीय जनमानस को आत्‍मप्रेरणा से विचार करना चाहिए कि मोदी जैसे व्‍यक्तित्‍व के प्रतिरूप गढ़ने में अभी से लगने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है।