Wednesday, September 17, 2014

एक अकेला जीवन

प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने सामान्‍य जीवन के अलावा भी एक दैनिक परिकल्पित जीवन से जुड़ा रहता है। ऐसा जीवन अकेला होता है। एक प्रकार से यह व्‍यक्तिगत व्‍यथाओं का संसार है। व्‍यक्ति के मन में उमड़ती-घुमड़ती ये व्‍यथाएं दैनिक जीवन की उन समस्‍याओं की भावनात्‍मक टूटन हैं, जिनसे मुक्ति के लिए न व्‍यक्ति-प्रयास सफल होता है और ना ही उसे इसमें किसी की सहायता मिलती है। घनिष्‍ट मित्र अगर ऐसी समस्‍याओं से परिचित रहते भी हैं, पर उनका भी अपना व्‍यक्तिगत पक्ष सुखद नहीं होता। उनके सामने भी अपनी व मित्रों की समस्‍याओं में से सबसे बड़ी समस्‍या चुनकर उसके लिए जीतोड़ शारीरिक-मानसिक-आर्थिक-सामाजिक संघर्ष करने की विवशता होती है। इस कारण व्‍यक्ति-व्‍यक्ति से मिलकर बने जनसमूह में परस्‍पर सहायता-सहभाव-सद्भाव-सम्‍भाव की भावना जम नहीं पाती। अपनी-अपनी मुसीबतों के भ्रमजाल में फंसकर सभी रोबोट बन हुए हैं। अपने अधिकारी के आदेश पर मशीन की तरह चलने के लिए विवश।
अकेला जीवन अनुभूतियों से भरा होता है। अनुभूतियां मानव से बहुत कुछ करवाती हैं। कविता, कहानी, उपन्‍यास, संस्‍मरण लिखवाती हैं। संगीत से जुड़ने और चित्रकला, पाककला, शिल्‍पकारी, समाज-सेवा के लिए उत्‍प्रेरित करती हैं। अकेले जीवन के अन्‍तर्मन से ''बारम्‍बार गूंजनेवाला'' एक संगीत गुंथा रहता है। संगीत की यह धुन अनचाहे ही अकेले जीवन में लहराने लगती है। अकेला जीवन किसी से इस धुन के बारे में वह सब कुछ परिभाषित नहीं कर सकता, जो अनुभव के स्‍तर पर वह प्राप्‍त करता है। कहीं कोई भी इच्छित संगीतमय आवाज गूंजती है, तो बहुत सुहाने तरीके से, अन्‍तर्मन से गुंथा हुआ संगीत ही याद आता है, उसका प्रसन्‍न आभास होता है। जीवन की यह घड़ी शान्तिदायक होती है।
व्‍यक्ति की एक नितान्‍त व्‍यक्तिगत रुचि होती है। वह आनेवाले कल को इसी रुचि के अनुरूप देखना चाहता है। व्‍यक्ति में एक व्‍यक्तिगत विश्‍वास होता है। इसमें पूरी दुनिया सिमटी रहती है। वह स्‍वयं और उसका परिवार, सम्‍बन्‍धी, मित्र सभी उसके लिए जीवन का बड़ा सहारा होते हैं। आधे से अधिक जीवन किसी की सहायता के बिना गुजार चुका व्‍यक्ति भी रिश्‍तों के सहारे की आस से हमेशा बंधा रहता है। अपने अकेले जीवन में उसकी यह आकांक्षा सदैव बनी रहती है। गुजरते जीवन में अधिकांश लोगों को धूर्त बता चुकी अकेले जीवन की नजरें फिर भी हमेशा आशावान रहती हैं कि उसे कोई तो समदृष्‍ट मिलेगा कभी न कभी।
व्‍यक्ति दिखने में तो धरती-आकाश के नजरिए से बहुत छोटा है, पर उसके मन की भावनाओं का विस्‍तार दुनिया के विस्‍तार से भी ज्‍यादा होता है। व्‍यक्ति यदि दूसरे व्‍यक्ति को साधारण दृष्टि से देखता है तो दूसरे व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व नगण्‍य हो जाता है, लेकिन दृष्टिकोण में सकारात्‍मक बदलाव आते ही दूसरा व्‍यक्ति विशिष्‍ट बन जाता है। दूसरे के जीवन को उसी नजरिए से देखने की अन्‍तर्दृष्टि मिल जाती है, जैसे दूसरा व्‍यक्ति खुद अपने जीवन को देखता है। यह दृष्टिकोण मानवीय समाज में तेजी से बढ़ना चाहिए। इसी से मानव आपस में चमत्‍कार की हद तक प्‍यार करने लगेंगे।
अपनी नजर में एक परिपक्‍व आदमी बहुत मूल्‍यवान होता है। यही नजर अगर उसे देखनेवाले अन्‍य व्‍यक्तियों में भी आ जाए तो मानवीय जीवन आनन्‍द से भर जाए। व्‍यक्ति शारीरिक रूप से सीमित है, पर भाविक स्‍तर पर वह बहुत बड़ा है।
एक दिन एक आदमी दुनिया में नहीं रहता। यह बात सामान्‍यत: बहुत छोटी है, पर आदमी के नहीं रहने पर बहुत कुछ ढह जाता है। उसकी कल्‍पनाएं, इच्‍छाएं, आकांक्षाएं सब मर जाती हैं। संसार को देखने की उसकी सौन्‍दर्यपरक दृष्टि का दुखान्‍त हो जाता है। अपनी नजर में संसार को गले लगाकर जीनेवाला व्‍यक्ति जब अचानक मृत्‍यु में स्थिर होता है तो उसके बाद का जीवित मानवीय जीवन-समूह उसे भूलकर अपने काम-धन्‍धों में लग जाता है। जीवन में मौजूद लोगों को मरे हुए की जीवन-स्‍मृतियों में विचरण का मौका भी बड़े स्‍मृतिश्रम से मिल पाता है।
और शेष बचे हुए मानवीय जीवन की व्‍यस्‍तता की प्रस्थिति ऐसी है कि उसके एक परिवार का पिता अपने बच्‍चे को प्राइवेट स्‍कूल के गेट तक छोड़ने जाता है। स्‍कूल की विसंगतियों, नासमझी के डर से पिता अपने बच्‍चे की सुरक्षा, अधिकार की वेदना से अन्‍दर तक हिल जाता है। बच्‍चे के मासूमियत भरे चेहरे को देखकर उसका मन भारी हो जाता है। वह बड़ी इच्‍छा से सोचता है, काश मैं अपने बच्‍चे को अपनी शारीरिक सक्षमता रहने तक केवल अपनी छाती से ही चिपकाए रहता!”
पिता बच्‍चे को विद्यालय छोड़कर वापस घर आता है। घर पहुंचते ही अन्‍य समस्‍याओं की मानसिक उलझन उसे अपने बच्‍चे के साथ भावनात्‍मक रूप से निरन्‍तर नहीं जोड़े रखती। वह अन्‍य समस्‍याओं में फंसते-फंसते अपने बच्‍चे के लिए मोहित अपने मन को अलविदा कहता है। इस तरह से पुन: एक अकेला जीवन अकेलेपन की कैद में चला जाता है।
                                             विकेश कुमार बडोला

6 comments:

  1. हमारा जीवन ऐसे ही नजरिए, अंतर्दृष्टि व आत्मिक-दुनियावी तथ्यों से भरा हुआ है. हम सब रोज कुछ कुछ गुम हो रहे हैं. आपके इस पीस को पढ़कर मेरे ह्रदय को बहुत तसल्ली हुई. उम्मीद है आगे इसी तरह का कुछ पढ़ने को मिलेगा।।

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  2. कम कम से कम अपने यहाँ पितृपक्ष के बहाने ही सही...पूर्वजों का स्मरण हो जाता है. हालाँकि वो भी कितने लोग कर पाते हैं. आर्थिंक उन्नति की होड़ ने जीवन में व्यस्तता और अकेलेपन दोनों को बढ़ा दिया है. यहाँ तो उसके कुपरिणाम आसानी ने दृष्टिगत हो जाते हैं.

    अकेलेपन प्रयोग रचनात्मक कार्यों के लिए हो वही सबसे अच्छा है. सुन्दर पोस्ट.

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  3. मर्मस्पर्शी .... कितना कुछ है विचारणीय, हमारे अपने ही परिवेश में

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  4. जीवन के भीतर भी एक जीवन होता है, उसे समझना पड़ता है,
    जीवन के मर्म को उकेरता भावुक आलेख ----
    आप तो लिखते हैं ही कमाल का---
    सादर

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  5. कई बार मुझे लगता है प्राकृति ने जानबूझ कर हमें ऐसा बनाया है ... उलझा दिया है उसने सभी को अंतर्मन की उथल पुथल में, फिर समय ने भी रही सही कसर पूरी कर दी है ...

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  6. मनुष्य की सृजनात्मकता की बहुत बड़ी वजह का ज़िक्र कर दिया आपने इस लेख में...बहुत सुंदर…

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