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गुरुवार, 14 अगस्त 2014

लड़खड़ाती स्‍वतन्‍त्रता

ड़खड़ाती स्‍वतन्‍त्रता कभी भी किसी के पकड़े पकड़ में ही नहीं ती
 चुपके से एक दिन का अहसास दे तीनसौ चौंसठ दिन बेगानी हो जाती

18 टिप्‍पणियां:

  1. इसके लिए सचमुच अपने हृदय पर हाथ रखकर खुद से कुछ सवाल करने होंगे और खुद को ही कुछ ईमानदारी से जवाब देने होंगे. सोचिये हमने अपनी जन्मभूमि को माता का स्थान दिया है. यह देश सदियों से नारीत्व को सम्मान देने वाली गरिमामयी संस्कृति के लिए जाना जाता है अगर इस देश में नारी का किसी भी रूप में अपमान होता हैं, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, स्त्री के मानमर्दन जैसी शर्मनाक घटनाएँ होती हैं. तो कैसे कह सकते है हम देशभक्त हैं? आपकी यह दिखावे की देशभक्ति देश के किस काम की? आपका राष्ट्रप्रेम किस काम का? जब तक भारत का नन्हा बचपन तिरंगा बेचने को मज़बूर रहेगा, तब तक हम नही कह सकेंगे कि भारत सही मायनों में आज़ाद हो गया है.

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  2. कम शब्दों मे व्यक्त परिपूर्ण कटु सत्यार्थ...!

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  3. सही कहा लेकिन स्वतन्त्रता की अनुभूति , महत्त्व और उस अनुभूति को बनाए रखने की कुछ जिम्मेदारी हमारी भी है । यह सच है कि कई स्तरों पर हमें परतन्त्रता व निराशा का सामना करना होता है फिर भी स्वतन्त्रता में कहीं दरार हैं तो उसका उत्तरदायी हर वह व्यक्ति है जिसके पास कुछ करने का अवसर है ।

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  4. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

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  5. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

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  6. वाकई दूसरे दिन से ही आजादी का अहसास हवा में उड़ जाता है
    काम शब्दों में गहरी बात कह दी ---
    बहुत खूब

    आग्रह है --
    आजादी ------ ???

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  7. मैं सहमत नहीं :-) स्वतंत्रता पकड़ में है मगर चंद चोर, लुच्चे लफंगे और देश द्रोहियों के !

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  8. उसी दिन की प्रतीक्षा है जिस दिन यह अपने अर्थ के अनुरूप हमारे जीवन में होगी.

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  9. बहुत सुन्दर कटु यथार्थ भरी सामयिक चिंतन प्रस्तुति ..
    जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें!

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  10. शुक्रिया आपकी टिप्पणियों के लिए। बहुत सुन्दर बात कही है सारगर्भित भी।

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  11. शुक्रिया आपकी टिप्पणियों के लिए। बहुत सुन्दर बात कही है सारगर्भित भी।

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  12. कठोर सत्य ... पर दोष किसका ... खुद का, समाज की दिशा का या .... पथ-हीन मार्गदर्शकों का ...

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  13. सबके लिए विचारणीय प्रस्तुति !!

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